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उपनिषद् में वर्णित एक कथ्य का काव्य रुपान्तरण


परिकल्पना

कामख्या पहाड़ के ऊपरी सिरे पर खड़े होकर

एक विस्तार जागता है

प्रकृति प्रदत्त

देव प्रदत्त

संचरित सुगंधा पवन

 

आकाश की गोलाई में तना सूक्ष्म नील बिम्ब

दूर उसके कोड़ में सिमटी नदी की रेख

बृह्मपुत्र

 

अनेकानेक बस्तियॉ

लोक – अलोक सरीखे

यहॉ – वहॉ  बिखरे हुए

 

विस्तार वहॉ ठिठककर

स्वयं को विस्तृत होने देता है

अपने कुहरे ढंके दृगों को पूर्ण उन्मीलित

देव निवास के निकट

विस्तार स्वयं की विस्तृतता के परे दृष्टि डालता है

उत्पात्ति के पूर्व स्थित

अकार्याभिमुख जगत् की परिकल्पना एकबारगी आकार लेती है

 

नामरुपों की अभिव्यक्ति के पूर्व

जब सारा कुछ स्पन्दन रहित स्तब्ध सा था

उस समय

अचानक कौंध की नाई  ‘सत्’ जागा

कार्याभिमुख सत् की उपस्थिति से जागा स्पन्दन

ततपश्चात्  नामरुप की अभिव्यक्ति

अंकुरित होते हुए बीज की तरह नामरुप की अभिव्यक्ति के

पहले चरण को पार कर

जल

और जल से वह आण्ड रुप में परिणत हुआ

समय बीता

आण्ड अपनी परिपक्वता के प्रथम स्थल पर पहुंच

विभाजित हुआ दो खण्डों में

 

रजत रुप और सुवर्ण रुप के दो खण्ड

हमारी यह महिमामयी पृथ्वी

वही रजतखंड

और  

द्यलोक वही सुवर्ण  खण्ड!

जन्म पृथ्वी का सत् से

द्यलोक उसका सहजन्म

 

साक्षात् सत् से

ब्रहम् से जन्मी  यह पृथ्वी, वह द्यलोक !

हम सब अंश उस विराट के

अजन्मा से आकारित

 

विराट द्वारा उस आण्ड के स्थूल गर्भवेष्ठन के फलस्वरुप जन्में

पर्वत

और

सूक्ष्म गर्भवेष्ठन ने किया आकारित मेघों सहित कोहरे को

धमनियॉ बनी नदियॉ

वस्तिगत जल सागर हुआ

 

और तब उत्पन्न हुआ आदित्य!!

आदित्य का जन्म विराट के सच्चे उत्तरवर्ती का जन्म था

 

उत्पन्न होते ही आदित्य के

उपस्थित हुए उरुरव

सुदूरव्यापी घोष वाले शब्द आ उपस्थित हुए

महाकाश के किसी छोर से शुरु होकर दीर्घ शब्द युक्त घोष

चले आए

भौतिक आकाश तक

उस ब्रह्रम रुप आदित्य के जन्म ने ही श्रृखंला रची

समस्त प्राणीवर्ग और भोगों की

 

आज भी

सूर्यदेव के उदय और प्रत्यस्तगमन के वक्त

दीर्घ शब्द युक्त घोषों की झंकार

बार-बार

हर बार

ब्रह्रमवंदन !

 

हर कण का

कण-कण में क्षण-क्षण

हर दिवस !

(इला कुमार)

(ilakumar2002@yahoo.co.in)


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