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कविताओं के संदर्भ में अज्ञेय – इला कुमार


सात मार्च 1911 को गोरखपुर के कुशीनगर में जन्मे हीरानंद, सच्चिदानंद वास्त्सायन ‘अज्ञेय’ की जन्मशती के अवसर पर उन्हें बार-बार साहित्य  प्रेमियों के द्वारा कई सम्मेलनों, गोष्ठियां आदि में श्रद्वापूर्वक याद किया जा रहा है। उनकी  रचनाओं के पुनर्पाठ किए गए।

सच तो यह है कि इन  औपचारिक कार्यक्रमों के बीच निस्संदेह साहित्यिक मनीषियों को हम आदरपूर्वक श्रद्वांजलि अर्पित करते हैं लेकिन कविता- प्रेमियों के मन  अनौपचारिक रूप से हमेशा अज्ञेय की पंक्तियों से बंधे रहा करते हैं। जो भी मन अज्ञेय की कविताओं से गहराई तक जुड़ा हुआ है, वह कहीं भी जाए,  अज्ञेय की पंक्तियां संग संग चलती है और ऐसे में कविताओं के संदर्भ मे अज्ञेय की कविताओं के प्रति विचारणा के क्रम में पढ़ी गई सभी पंक्तियों के  बीच स्थित समय-खंड मानों अचानक एक साथ निकट आ जाता है।

“कौन द्वारी

कौन आगारी, न जाने

पर द्वार के प्रतिहारी को

भीतर के देवता ने

किया बार-बार पालागन”

कई बार ऐसा भी होता है कि जब कभी किसी संवेगित क्षण में मन भारी हो आया और अतीत को हमने परे हटाना चाहा, अज्ञेय की पंक्तियां करीब आ जाती हैं

‘‘कहा तो सहज लौट पीछे देखेंगे न

पर नकारों के सहारे कब चला जीवन

स्मरण को पाथेय बनने दो

कभी-तो स्मृति उमड़ेगी

प्लवन का सांद्र घन भी बन‘‘

जहां तक लेखन का सवाल है तो अज्ञेय ने साहित्य की लगभग हर विधा में लिखा-कविता, कहानी, उपन्यास, यात्रावृतांत, आलोचना, निबंध एवं डायरी। और  आश्चर्यजनक यह है कि हर विधा में उनके लेखन को विज्ञ पाठकों के बीच सराहा गया। उनकी इतनी सारी विधाओं में किए गए लेखन ने उन्हें अलग तरह की ऊचाईयां दीं योंकि उनके शत-प्रतिशत लेखन को अपार सराहना मिली। अज्ञेय 1987 में पंचभूत विलीन हुए। लेकिन उनकी कविताओं के बारे में कहा जाता है कि वे ‘‘चिरजीवी‘‘ है  और उनके अंदर ऐसा कुछ है जो वर्णनातीत है। अज्ञेय की कविताओं की पंक्तियां, अंश, अंशों के अंदर पैठे शब्द और शब्दों की प्रतिध्वनियों के भीतर जो संवेदना, जो अर्थ  स्थित रहा करता है उनके बारे में लिख पाना शायद इस कारण असंभव है, क्योंकि वहां अमूर्तन का ऐसा सलोना, अदृष्य जाल फैला रहा करता है, जो कई अलग भावों के  बीच बिंबित-प्रतिबिंबित होता चलता है। बावरे अहेरी की मुद्राओं की तर्ज पर…

बावरे अहेरी रे

कुछ भी अवध्य नहीं तुझे सब आखेट हैः

एक बस मेरे मन-विवर की दुबकी कलौंस को दुबकी ही छोड़कर क्या तू चला जाएगा

ले, मैं खोल देता हूँ कपाट सारे

मेरे इस खंडहर की षिरा-षिरा छेड़ दे आलोक की अनी से अपनी,

गढ़ सारा ढाह कर ढूह भर कर देः

विफल दिनों की कलौंस पर मांज जा

मेरी आंखें आंज जा

कि तुझे देखूँ

देखूँ, और मन में कृतज्ञता उमड़ आये पहनूं सिरोपे से ये कनक तार तेरे

बावरे अहेरी!

-इला कुमार

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