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भ्रष्टाचार क्यों और किस तरह नहीं


भ्रष्टाचार क्यों होता है व कैसे होता है यह विषय नया नहीं हैं। लोकतंत्र में स्वतंत्रता, बराबरी और भाईचारा का नारा एक मूल मंत्र हैं।

 

किसी को निर्णय लेने का अधिकार मिलता है तो वह एक या दूसरे पक्ष में निर्णय ले सकता है। यह उसका विवेकाधिकार है और एक सफल लोकतंत्र का लक्षण भी है। परंतु जब यह विवेकाधिकार वस्तुपरक न होकर दूसरे कारणों के आधार पर इस्तेमाल किया जाता है तब यह भ्रष्टाचार की श्रेणी में आ जाता है अथवा इसे करने वाला व्यक्ति भ्रष्ट कहलाता है। किसी निर्णय को जब कोई शासकीय अधिकारी धन पर अथवा अन्य किसी लालच के कारण करता है तो वह भ्रष्टाचार कहलाता है। भ्रष्टाचार के संबंध में हाल ही के वर्षों में जागरूकता बहुत बढ़ी है। भ्रष्टाचार, विरोध अधिनियम 1988, सिटीजन चार्टर, सूचना का अधिकार अधिनियम 2005, कमीशन ऑफ इन्क्वायरी एक्ट, आदि।

उच्च पदस्थ अधिकारियों का उच्चतर नैतिक दायित्व:- ब्रिटिश शासन काल से ही भारत में आल इंडिया सर्विसेस तथा आई.सी.एस. (आई.ए.एस), आई.पी.एस. तथा विदेश सेवा, एवं भारतीय वन सेवा का गठन हुआ था। इन अधिकारियों पर यह दारोमदार है कि वे स्वयं तो ईमानदारी से कार्य करें ही, अपने मंत्री की भी किसी अनुचित राय के विषय में अपना दखल रखें।

ब्रिटिश शासन काल ने इन सेवाओं में बढ़े ही उच्च आदर्श रखे और वर्तमान भारत की दृढ़ आधारशीला स्थापित की। इस प्रयास में उन्हें दो चीजों से सहायता मिली- एक तो उनके वेतन का स्तर बहुत ऊंचा था, और दूसरे उनको काम करने देने में कोई अड़चनें (इंटरपियरेंस) नहीं आती थीं। किसी महत्वपूर्ण कार्य के लिए वे लंबी अवधि तक अपने पद पर बने रहते थे। इसके उदाहरण स्वरूप सर अलफ्रेंड लायन ने इतना अच्छा काम किया कि पाकिस्तान के एक जिले लायरपुर का नाम भी उनके नाम पर पड़ गया। श्री हेनरी रेमेजे ने कमिश्नर कुमाऊं (म.प्र.) के रूप में रहकर 28 वर्ष तक सृजनात्मक कार्य कराए। अपने कार्यकाल में वे हर सुदूर और दुर्गम गांव में गए यहां तक कि लोग उन्हें प्यार से रामजी साहब कहने लगे।

भ्रष्टाचार बढ़ रहा है: किंतु आज इन्हीं सेवाओं में काफी गिरावट आई है। वर्ष 2008 में दी गई ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल की रिपोर्ट ने बताया है कि भारत में लगभग 20 करोड़ की रिश्वत अलग-अलग लोकसेवकों को (जिसमें न्यायिक सेवा के लोग भी शामिल हैं) दी जाती है। उन्हीं का यह निष्कर्ष है कि भारत में पुलिस और कर एकत्र करने वाले विभागों में सबसे ज्यादा भ्रष्टाचार है। आज यह कटु सत्य है कि किसी भी शहर में नगर निगम में पैसा दिए बगैर कोई मकान बनाने की अनुमति नहीं मिलती। इसी प्रकार सामान्य व्यक्ति भी यह मानता चलता है कि किसी भी सरकारी महकमे में पैसा दिए बगैर गाड़ी नहीं चलती।

काम कैसे करें: प्रशासकों को यह बार-बार सिखाया जाता है, कि वे हर बार स्वयं स्पष्ट आदेश (स्पीकिंग आर्डर) दें ताकि जिन आधारों पर निर्णय लिया जा रहा है उनकी झलक सर्व संबंधितों को मिल सके। साथ ही अधिकारों के प्रत्यायोजन की व्यवस्था के बरक्स एक श्रृंखला किसी भी आदेश की समीक्षा के लिए भी बनी होती है। जैसे- उपसचिव का आदेश उचित आधार पर संयुक्त सचिव बदल सकता है, संयुक्त सचिव का सचिव, सचिव का मंत्री, मंत्री का मंत्रिमण्डल, और मंत्रिमंडल का विधानसभा, लोक लेखा समिति। विधानसभा के आदेश की समीक्षा उच्च न्यायालय भी कर सकता है, उच्च न्यायालय की सर्वोच्च न्यायालय व उसकी पीठें कर सकती हैं। इसी को शक्ति संतुलन अथवा बैलेंस ऑफ पावर्स कहा जाता है। किंतु इन सभी श्रृंखलाओं में अनैतिक दबाव कार्य न कर रहे हों इसके लिए कोई व्यक्ति अथवा दबाव दल होना चाहिए, जो निर्भीक होकर गलत निर्णय के पीछे पड़कर उसे दुरूस्त कराएं। अब तक का अनुभव यही बताता है कि किसी भी गलत निर्णय को सही कराने की खातिर विशुध्द मानव प्रेम ही पर्याप्त नहीं है। लेकिन फिर भी यदा कदा ऐसे मामले आ जाते हैं जिनसे पूरे समाज को बहुत लाभ होता है, उदाहरण के लिए दिल्ली में सड़क के किनारे होर्डिंग लगाना बंद करने से अथवा सभी ऑटो गाड़ियों को सी.एन.जी. चालित इंजिन लगाने की बाध्यता।

भ्रष्टाचार पिछड़ेपन का घोतक है: भ्रष्टाचार का बोलबाला यह दर्शाता है कि जिसे जो करना है वह कुछ दे-दिवाकर अपना काम चला लेता है, और लोगों को कानों-कान खबर नहीं होती। होती भी है तो हर व्यक्ति खरीदे जाने के लिए तैयार है। गवाहों का उलट जाना, जांचों का अनंतकाल तक चलते रहना, सत्य को सामने न आने देना, ये सब एक पिछडे समाज के अति दुखदायी पहलू हैं।

एक जानकार बताते हैं कि एक फर्जी बैंक की जब वे जांच कर रहे थे, तब उसमें फंसे लोगों ने उन्हें ही 50-60 लाख रुपए की रिश्वत देने का प्रयास किया ताकि सारा मामला ढांप दिया जा सके।

इस भ्रष्टाचार का कोई पारावार नहीं। यह उस कागज और स्याही को भी लील सकता है। जिससे ये शब्द लिखे जा रहे हैं। अगर कागज पर स्याही फैलने लगे तो हमारी भाषा और भाव किसी काम के नहीं रह जाएंगे। हम तो अपने प्रथम उसूल ‘सत्यमेव जयते’ पर गर्व करते हैं। कहां है हमारा वह गौरवशाली आचरण?

मजेदार पहलू: जब हम इस गंभीर विषय पर बात कर रहे हैं तो इसके मजेदार पहलू पर भी गौर फरमाया जाए। पहले काम के बदले अनाज जैसी योजनाएं चलती थीं। हमने पाया कि एक काम को दो की बजाय चार लोगों में बांटकर कराया जा रहा था। चूंकि काम मांगने वाले इतने अधिक थे कि उसी काम को कराते हुए दुगुने लोगों को संतुष्टि मिल रही थी। इस हेराफेरी पर कोई हंस ही सकता था। कहते हैं रिश्वत लेते हुए पकड़े गए तो रिश्वत देकर छूट गए। ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल के अध्ययन के सदंर्भ में देखना है कि अब पुलिस को कौन पकड़े? कर लेने वाले विभाग की जांच कौन करें? रेलवे में यह आम दृश्य है कि लोग टी.टी. की जेब में नोट ठूंसते जा रहे हैं कि सीट दिला दो। इसका सीधा सरल हल एक गंभीर चुनौती है, लेकिन है हल इसका सीधा और सरल ही कि रिश्वत न लो, न दो। एक बार एक टेंडर बुलाया गया- किसी कार्यालय की सफाई के ठेके का। जिसका सबसे कम रेट आया उसकी फर्म का टेंडर स्वीकृत हो गया। अब टेंडर देने वाला भौंचक्का रह गया, कि कहां से उसका टेंडर बिना किसी दौड़-धूप के स्वीकार हो गया? ऐसा कैसे संभव हो पाया? लेकिन है तो बात यही। या तो आप सही-सही काम करें जो सबसे सरल और सबसे तेज हैं या बनावटी बातों से खुद किसी दलदल में जा गिरें और अपने ऊपर नीचे वालों की भी मिट्टीपलीत करें।

एक कार्यालय महिला व विकास के ऋण देता था। ऋण लेने वाली संस्थाएं भौंचक्की रह जाती थी कि ऋण राशि का चेक इतनी जल्दी कैसे उन तक पहुंच गया लेकिन वहां संस्था ऋण की वापस अदायगी समय पर न होने पर स्वयं संस्था में जाकर ऋण ग्रहिताओं से चर्चा हेतु अनुरोध करके संस्था पदाधिकारियों को आश्चर्य में डाल देती थी। इसलिए उसकी ऋणों की वापसी अदायगी कभी 94 प्रतिशत से कम नहीं हुई।

प्रशासन ने इन विषम परिस्थिति के लिए तरीके निकाले रखे हैं, लेकिन फिर अपने को अधिक चतुर समझते आदमी ने ही उन तरीकों की काट भी निकाल रखी है। लेकिन यह सब क्यों? बेकन ने लिखा है कि चालाक लोग जानते हैं कि किस रास्ते से घुसना और निकलना है, लेकिन यह नहीं जानते कि वे यह सब कर क्यों रहे हैं? इससे उनका अभीष्ट क्या है? एक सरकार से संस्थाओं को चेक से अनुदान मिलता था। लेकिन संस्था प्रमुख अनुदान दाता कार्यालय को उनकी मांग पर 30 प्रतिशत नगद दे जाते थे और चेक ले जाते थे। ये सब कमजोर, कामचोर और नामुराद लोगों के किस्से हैं जिन्हें बताते हुए भी शर्मसार होना पड़ता है। परंतु कहने का तात्पर्य यही है कि ताली दोनों हाथ से बजती है।

भ्रष्टाचार एक प्रकार की बेवफाई है। एक ने बेवफाई की तो दूसरे को भी बेवफाई करने का कारण मिल जाता है। दूसरे, भ्रष्टाचार अनुपातहीन रूप से बढ़ता जा रहा है, अत: इसे समूल नष्ट करने के लिए कठोर कदम उठाने होंगे।

अब यह स्थिति नहीं है कि शासकीय अधिकारियों की तनख्वाहें कोई कम हैं, चूंकि ये तनख्वाहें बहुत बढ़ गई हैं। भारत सरकार के एक पूर्व सचिव, कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग का कहना है कि उच्चतर सिविल सेवाओं में भ्रष्टाचार दूर करने के लिए निम्नलिखित उपाय किए जाएं:-

1. भ्रष्टाचार के रंगे हाथों पकड़े जाने पर अथवा अनुपातहीन ऐसी संपत्ति के होने पर, जिसका कोई ज्ञात स्रोत न हो तब ऐसे अधिकारी का मुअत्तिल (डिसमिस) कर देना चाहिए। बाद में जांच के उपरांत, यदि उसे पात्रता आती हो तो उसके पूर्व के स्वत्वों का भुगतान किया जा सकता है। मेनका गांधी विरूध्द यूनियन ऑफ इंडिया (ए.आई.आर 1978 एससी 597) में सर्वोच्च न्यायालय ने यह स्पष्ट कर दिया है कि समुचित मामलों में ऐसा निर्णय लेने के बाद की गई जांच भी आत्मरक्षा के लिए अवसर दिए जाने की श्रेणी में आता है।

2. किसी अधीनस्थ को जब डिसमिस किया जाए तो उसके उच्चस्थ (रिपोर्टिंग ऑफिसर) को भी उचित अनुवीक्षण न करने के अपराध में दंडित किया जाना चाहिए। उसकी पदोन्नति रोकनी चाहिए।

3. उस विभाग के मंत्री को भी, उसके पास अनुपातहीन संपत्ति होने पर, एवं ऐसी ही परिस्थिति होने पर मुख्यमंत्री को भी हटाबदल देना चाहिए।

ये सारे उपाय कठोर हैं लेकिन वर्तमान समय में भ्रष्टाचार अपनी कई सीमाएं लांघ चुका है और कठोर कदम उठाए बिना कुछ भी हासिल नहीं होने वाला।साथ ही उच्चस्थ अधिकारियों को कार्यदक्षता में भी सिध्दहस्तता और तत्परता बढ़ाते हुए तेजी से अपने लक्ष्य प्राप्त करने का ठोस आश्वासन देना चािहए।इस सशक्त कदमों से ही हम सुधरेंगे। पटवारी, रेवेन्यू इंस्पेक्टर और क्लर्कों को डिसमिस करने से काम नहीं बनेगा। अगर आप सोचें कि करौंदे की झाड़ियों पर पानी छिड़कने से जंगल की आग बुझ जाएगी, तो यहां आप गलती पर हैं।

 

-इंदिरा मिश्र

(साभार- देशबंदु)

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