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मौन जीवन की बहुत बड़ी संपति है – इन्द्रा (धीर) वडेरा



( लेखिका , विचारक और चिंतक इन्द्रा जी व्यावहारिक आध्यात्म की विशेषज्ञ हैं। भारतीय वाड्मय की अध्येता और पाश्चत्य साहित्य का गहन अध्य्यन करने वाली इन्द्रा जी प्रश्नोत्तर के माध्यम से व्यक्तित्व विकास मे विशेष रूचि लेती है। निस्तब्ध उपस्थति नामक काव्य संग्रह की लेखिका ने मौन के संबंध में  पूछे गए प्रश्न के उत्तर से आप भी लाभान्वित हो सकते हैं-

 विषय :             साधना, मौन क्षण अनुभव

परामर्श :           चिंता, मनरुपीसंपदा का अपव्यय है !

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प्रश्न  :    चिंता करने की आदत सी पड़ गई है ! जीवन में कोई भारी समस्या भी नहीं फिर भी बिखरी-बिखरी सी रहती हूँ ! छोटी सी बात लेकर सोचती रहती हूँ ! कभी वह बुरा है, उसने मेरे साथ ऐसा बुरा क्यों किया ? सच पूछो तो “लगता है कि बाल की खाल उतारती रहती हूँ !” जो सोचना भी नहीं चाहिए उसका व्यर्थ चिंतन स्वभाव में कुछ ऐसे बस गया है कि अब नींद ही नहीं आती ! मेरी उम्र केवल 28 वर्ष की है !लोग कहते हैं साधना सीखो !मौन हो आँखें बँद कर के बैठ जाने में मुझे तो कुछ सार नहीं लगता !साधना शिविर मेरे लिए नहीं !आप ही इस विषय में मुझे परामर्श दें !

–अंजली गुप्ता

उत्तर :   अपने आप में गुम, अपनी समस्याओं में गुम, भटकन में क्षीण होता हुआ आपका अधीर मन घर लौटने को उत्सुक है ! इसे मौन-क्षण अनुभव की, चेतन में ठहर जाने की, आत्मिक सुख में स्थिर हो जाने की चाहत है और आपके विचार आपको अपने ही आनंदस्रोत तक पहुँचने नहीं देते इसलिए आपको नींद नहीं आती! अंजली जी, आपके प्रश्न से यह तो स्पष्ट है कि निरर्थक चिंतन के प्रति तो आप सचेत हैं; लेकिन, आपके अन्दर क्या चल रहा है उसे आप रोक नहीं पा रही हैं  !

इस दुविधा का समाधान करने से पहले मैं आपका ध्यान संत एकनाथ द्वारा कही गई एक पौराणिक कथा की ओर ले जाना चाहती हूँ !मनोबल के विषय में सचेत कराते हुए उन्होंने  कहा :

एक थका‌-मांदा राही धूप की गर्मी से बचने के लिए एक वृक्ष की छाँव के नीचे आ बैठा ! उस वृक्ष की छाँव ऐसी संतोष-जनक थी कि सोचने लगा पीने को जल मिल जाए तो प्यास भी बुझ जाएगी !भगवत्‌ कृपा ऐसी बनी कि जल भी उसे मिल गया, जल पाकर संतुष्ट हो उसे भूख की याद आई, और सोचने लगा अगर भोजन भी मिल जाए तो संतोष होगा !भोजन भी मिल गया  ! कुछ देर पर्यंत रात हो गई और उसे नींद सताने लगी !उसने सोचा अगर नींद का सुख मिल जाए तो सुबह तरोताजा महसूस करूँगा !अब नींद के सुख के लिए एक खाट भी उपस्थित हुई और वह पूरी रात खर्राटे लेता हुआ सुख की गहरी नींद सोया और सुबह उठा तो तरोताजा !

सब सुख पाकर राही अतीव प्रसन्न हुआ और सोचने लगा यह तो अचंभे की बात है कि जो कुछ चाह रहा हूँ वही पा रहा हूँ ! यह सोच जब मन में घर कर गई तो सोचने लगा :यह तो कोई माया नगरी है…किसी मायावी का जाल है…शायद कोई मायावी मुझे खा लेने का जाल रचा रहा है..! ऐसा सोचा ही था कि कोई मायावीआयाऔर उसका भक्षण कर गया !संत एकनाथ ने कहानी सुनाते हुए अपने श्रोतागणों से कहा कि वह राही एक कल्प-वृक्ष के नीचे बैठा था ! कल्प-वृक्ष का ऐसा प्रभाव है कि उसके नीचे बैठ जो भी कामना करो वह सब कामना पूर्ण कर देता है ! कहानी का तथ्य समझाते हुए संत एकनाथ कहने लगे मनुष्य का चिंतन एवं मनोबल एक प्रकार से कल्प वृक्ष ही है 

अंजलीजी,बहुत दम है हमारे चिंतन के प्रवाह में ! हमारी सोच हमें सुख-चैन की ओर ले जा सकती है और हमारे भय से उपजी हुई हमारे दुष्चिंतन की सेंक कुरेद-कुरेद कर हमें खोखला भी कर सकती है !

पक्षी हमारे सिर पर आ बैठे, इसमें हमारा कोई दोष भले ना भी हो; लेकिन, यदि पक्षी ने हमारे सिर पर घौंसला ही बना लिया है तो उसमें हमारी सम्मति आवश्य होगी !चिंता का भाव किसी के मन में भी आ सकता है लेकिन आपका तो अपना जीवन-रस ही चिंता के छिद्र से बहने लगा है !अकारण चिंतन मन रुपी संपदा का अपव्यय है और जो मन संपत्ति हमारे आत्मिक-सुख का साधन होती है उसी संपदा की फिजूलखर्ची हुए जा रही है और आप उस आत्मिक सुख-संपदा से रिक्त हुए जा रही हैं,  इस लिए आपको नींद भी नहीं आती ! प्रश्न यह है कि इस व्यर्थ खर्च हो रही मन-संपत्ति को कैसे रोका जाए ताकि आप मानसिक शाँति अनुभव कर पाएँ ?

इस विषय में आपको कोई भी परामर्श देने से पहले मैं आपके लिए एक पाश्चात्य कथा का अनुवाद हिंदी में करती हूँ :

एक दादा ने अपने पोते से बात करते हुए उसे “दो भेड़ियों” की कथा सुनाई :

” मेरे अन्दर एक घमासान युद्ध चलता रहता है ! ” दादाजी बोले !

” यह भयंकर लड़ाई दो भेड़ियों के बीच की है !

एक भेड़िया जो देखने में बदसूरत है, वह तो बड़ा दुष्ट है !वह तो क्रोध, ईर्षा, लालच, दुःख, झूठ, अहं, स्वार्थ, निर्दय, घमंड, कृतघ्न, और मित्रहीन यह सब कुछ है !

दूसरा देखने में सुंदर और नेक भी है !वहमित्र, हितैषी, शांत, प्रेमी, आशावादी, शालीन, नम्र, परोपकारी, दयालु, न्यायपूर्ण, शिष्ट, उदार, सत्यवक्ता, कृतज्ञ, दूरदर्शी यह सब है !

यह युद्ध जो मेरे अन्दर चल रहा है, वह तुम्हारे अन्दर भी चल रहा है और दूसरों के अन्दर भी यही युद्ध चल रहा है ! “

बालक कुछ क्षणों के लिए चुप-चाप चिंतन करता रहा और फिर बोला, ” तो दादाजी, कौन सा भेड़िया जीतेगा ?”

वृद्ध सज्जन अब गंभीर मुद्रा में बोले, “जिसे तुम पुष्ट बनाओगे !”

अंजलीजीनिकृष्ट विचारों और उत्कृष्ट चिंतन की परस्पर लड़ाई हमारे अन्तर्जगत का देवासुर संग्राम है ! इस देवासुर संग्राम से आप अकेली ही नहीं बल्कि हम सब प्राणी लड़ रहे हैं !आपका मुख्य प्रश्न यह है कि इस संग्राम से मुक्ति कैसे पाई जाए ? अपने अन्दर शुभ विचारों का सृजन कैसे हो ?अपने विचारों को निकृष्ट चिंतन से कैसे बचायाजाए ?साधना करने से आपको किसी प्रकार का लाभ होगा या नहीं ?

 

अंजली जी,  आपके अंतःकरण में शान्ति के अनुभव की कमी है, यह शान्ति का अनुभव हमारे अंतःकरण का आहार है  और आपका अंतःकरण इस आहार से वंचित रहता है ! मेरी परामर्शअनुसार अपने आपको इस संकट से बचाने के लिए आपको अपने चिंतन में शान्ति और सद्भाव कीश्रेष्टता लानी होगी !

सुझाव #1          आप अपने जीवन को ही उपयोगी दिशा की ओर ले जाएँ, दूसरों को सुख देकर अपने अन्त:करण में सुख का अनुभव कर अपने जीवनरुपी वृक्ष में रस बहने दें !

सुझाव #2          आप साधना का आश्रय लें !रही बातमौन हो आँखें बँद कर के बैठ जाने में आपको तो कुछ सार नहीं लगता !”

जागरूकता का क्षण साधना है ! साधना एकाग्रता, विचार संयम और मनोनिग्रह के लिए की जाती है !साधना विवेक जागृत करने और चिंतन में श्रेष्टता लाने के लिए की जाती है !

अंजली जी,  मौन-क्षण-सुख शब्दों में व्यक्त करने का विषय नहीं; फिर भी उस सुख और शान्ति की छाया तले हम अपने ही दोषों को अपनी ही दृष्टि से परख लेते हैं ! इन दोषों को जान लेना साधना करने का एक बहुत बड़ा हिस्सा है !सत्य तो यह है कि साधना का प्रभाव भी जानने की बात नहीं यह भी अनुभव का क्षेत्र है !फिरभी साधना समय क्या घटित होता है उसे संक्षेप से शब्दो में उतारने का प्रयत्न करती हूँ !

साधना समय विशेषतःदो चीजें घटित होती हैं !

  1. मनोनिग्रह( विचारों से सम्बन्ध विच्छेद ) : विचारों से सम्बन्ध विच्छेद अपने चिंतन में श्रेष्टता लाने का एक सर्वोपरि उत्तम साधन है !
  • मौन क्षणों में विराम ले हम मन स्थिर कर लेते हैं !मन स्थिर हो जाने पर आतंरिक शान्ति का अनुभव होने लगता है !
  • साधना करते करते हमारा अपने ही विचारों, भावनाओं, इच्छाओं इत्यादि से सम्बन्धविच्छेद होने लगता है !अतः हम यह भी अन्वेषण कर लेते हैं कि हमनें किन विचारों को सींचना है और किनको उखाड़ फेंकना है !
  • किसी भी भाव की मन अन्दर प्रवेश मना ही तो आसानी से नहीं हो पाती, यहाँ इरादों का बल शायद काम ना करे !लेकिन साधना समय मन की शान्ति इतनी गहन होती है कि किन विचारों को आपनें पुष्ट करना है और किनको उखाड़ फैंकना है, यहाँ आपके इरादे ही प्रधानहोंगे !इस तरह से साधना समय इस बात की अवहेलना ना करते हुए हम आसानी से ही मन की एक-एक लहर को उपयोगी  दिशा की ओर ले जाते हैं !

ऋषी मुनियों का कहना है कि विचारों का अन्धड़ वेग विवेकशक्ति का हरण कर, ना जाने किस भंवर में ले डूबे !इसलिए मानव को चाहिए कि वह अपने विचारों से सम्बंधविच्छेद कर उन्हें एक दृष्टा की भांति निहारे !इस छोटी सी युक्ति में मानव जीवन का कल्याण छुपा है !

2)   मन का ठहराव :

  • साधना के मौन क्षणों में, जब मन स्थिर हो जाता है तो विचारोंऔर भवनाओं का वेग धीमा पड़ जाता है ;अतः मनरुपी संपदा का अपव्यय कम हो जाता है जिसके परिणामस्वरूप हम मनोबलरुपी संपत्ति सुरक्षित कर पाते हैं !
  • मौन क्षण अनुभव बुद्धि निर्मल कर देता है !
  • निश्चल मन, निर्मल बुद्धि, शांत हृदय, अंतःकरण में एक वरिष्ठ सुख का स्पंदन प्रदान करता है !
  • मौन क्षण संपूर्ण अनुभव प्रदत्त है, इसलिए इसका एहसास हमारे अंतःकरण की विशुद्ध एवं वरिष्ठ संपत्ति भी है  !
  • इस उत्कृष्ट आनंद का अनुभव-पूर्ण एहसास हमारे जीवनरुपी वृक्ष की सृजनात्मक अनुभूति है !

मौन की समर्थ के संबंध में एक ऐतिहासिक प्रसंग जानने योग्य है :

सनातनधर्म कामहाभारतग्रंथसमाप्त हुआ, इस ग्रंथ का विवरण महर्षि व्यास करते रहे और गणेशजी तन्मयता से उसे लिखने का काम करते रहे, जब सूतजी ने  इस रचना का सविस्तार सर्वोत्तम उल्लेख देखा तो वह इससे बहुत प्रभावित हुए, उन्होंने गणेश जी से ग्रंथ की श्लाघा करते हुएपूछा : “गणेशजी, आपने यह अद्विती ग्रंथ का उल्लेख किस दैवीशक्ति के सहारे किया ?” तो गणेशजी का यह उत्तर था : “मौन की समर्थ ही विशिष्ट है सूतजी !”

जीवन जीते हुए मैंने यह अनुभव किया है और जाना भी है कि मौनक्षणसुख अनुभवपूर्ण विशिष्ट अन्तराल है जिसका विवरण देना कठिन है लेकिन यह जीवन संपदा पूरक सृजनात्मक अनुभव हमारे जीवन को एक अलग सी मोड़ देने की समर्थ रखता है !

चुप हो, जब भी अपने लंबे जीवन पर दृष्टि डालती हूँ और अपने मौन क्षणों की स्मृति को निहारती हुँ तो अपने हृदय पर यही संदेश लिखा पाती हूँमौनक्षणसुख अनुभव के आगे दुनियाँ भर की संपत्ति फीकी है!

संक्षेप में मैं यह कहना चाहुँगी कि मेरा अपना अनुभव भी इसी बात की गवाही देता है कि जिस व्यक्ति नें अपने विचारों से संबन्धविच्छेद करने की कला नहीं जानी और जिस व्यक्ति का जीवन मौन क्षण अनुभव से वंचित रहा है उनका जीवनवृक्ष आत्मिक आनंद की सुगंध से वंचित रहा है और संभव है कि वह एक विषैले वृक्ष सा जीवन ही जी पाया हो !!!

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