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सरकार की टोपी अदालत के सिर – डॉ. वेदप्रताप वैदिक


भारत सरकार ने अपनी टोपी अब राष्ट्रपति और उच्चतम न्यायालय के सिर पर रख दी है। 2जी मामले में उच्चतम न्यायालय ने जो 122 लायसेंस रद्द किए थे,  उनके बारे में सरकार अपना दिमाग नहीं खपाना चाहती है। उसे खुद पर से विश्वाश उठ गया है। वह चाहती है कि उच्चतम न्यायालय धारा 143 के तहत कई मुद्दों पर अपनी राय उसे देने की कृपा करे। जैसे 2जी के बारे में बनाई गई ‘पहले आओ, पहले पाओ’ की नीति की जगह अब कौन सी नीति बनाई जाए ? नए लायसेंस – वितरण का आधार क्या हो?  क्या 1994 और 2001 के लायसेंस भी रद्द कर दिए जाएँ ? मौजूदा लायसेंस के स्पेक्ट्रम वापिस ले लिए जाएँ याने उनसे अलग आधार पर पैसे वसूल किए जाएँ ? लायसेंसधारी कंपनियों में लगा निवेषकों का पैसा कैसे सुरक्षित रखा जाए ? इस तरह के कई सवाल सरकार अब अदालत से हल करने को कहेगी। परीक्षार्थी परीक्षक से कह रहा है कि प्रष्न-पत्र आपने बनाया है तो अब इसका उत्तर भी आप ही दे दीजिए।

स्रकार की इस अदा पर कौन फिदा नहीं हो जाएगा ? कहीं यह अदालत को फुसलाने की तिकड़म तो नहीं है ? अदालत अपनी राय तैयार करे,  इस बीच कई साफ और छिपे तरीकों से सरकार इसारे करती रह सकती है। 2जी के मामले में वह जो-जो चाहती है, वह खुले-आम भी बोलते रह सकती है। वह चाहेगी कि अदालत वही राय दे दे, जो वह चाहती है। लेकिन भारत का उच्चतम न्यायालय और महालेखा-परीक्षक – ये दो संस्थाएँ ऐसी हैं, जिनकी स्वायत्तता संदेह से परे है। धारा 143 के तहत दी गई अदालत की राय बंधनकारी नहीं है लेकिन वह ऐसी जरूर होगी, जो नेताओं को शिकंजे में कस देगी। अरबों रूपये की धांधली करनेवाली सरकारों पर अब जनता,  मीडिया और अदालतों की भी कड़ी नज़र है। बेहतर तो यह है कि सरकार अपना काम अदालत के मत्थे मढ़ने की बजाय खुद करे। वह अपनी टोपी दूसरे के सिर पर क्यों रखे ?

डॉ0 वेदप्रताप वैदिक
(लेखक भारतीय विदेश नीति परिषद के अध्यक्ष हैं)

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