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ज़रदारी की यात्रा के गहरे अर्थ – डॉ0 वेदप्रताप वैदिक


 यह प्रश्न सभी पूछ रहे हैं कि आसिफ ज़रदारी की भारत-यात्रा से निकला क्या? कई पाकिस्तानी नेताओं और अखबारों ने तो यह तक कह डाला कि इस निजी-यात्रा पर इतना पैसा खर्च करने की जरूरत क्या थी? इतने मंत्रियों और अफसरों को साथ ले जाने का मकसद क्या था?
ये सवाल बिल्कुल गलत हैं, ऐसा नहीं कहा जा सकता लेकिन जरा सोचें कि क्या पाकिस्तानी राष्ट्रपति किसी औपचारिक राजकीय-यात्रा पर इस समय भारत आ सकते थे? दोनों देशों के बीच कौनसी ऐसी चमत्कारी घटना हुई है कि जिसके आधार पर ज़रदारी या प्रधानमंत्री युसुफ रज़ा गिलानी को भारत आने का निमंत्रण दिया जा सकता था? वे खुद निमंत्रण मांगते, यह संभव ही नहीं था। इसे पाकिस्तान की बेइज्जती माना जाता। ज़रदारी के पास इससे बेहतर बहाना क्या था कि उन्हें अज़मेर-शरीफ के गरीबनवाज़ ने खुद बुलाया है। यह बहाना इतना हसीन है कि इस पर ज़रदारी के दुश्मन भी उंगली नहीं उठा सकते थे। इसके अलावा भारत की सूफी दरगाह पर मत्था टेकने और चादर चढ़ाने का संदेश सीधा हाफिज सईद जैसे आतंकवादियों के खिलाफ भी जाता है।

यह ठीक है कि ज़रदारी अकेले भी आ सकते थे लेकिन अपने मंत्रियों, अफसरों और नेताओं को साथ लाकर उन्होंने उन सबको उस सद्भावना की लहर का हिस्सा बनाया, जो इस यात्रा से उठी है। भारत के प्रधानमंत्री चाहते तो ज़रदारी की अजमेर-यात्रा हो जाने देते और हाथ पर धरे बैठे रहते। यह ज़रदारी ही नहीं, पाकिस्तान का भी अपमान होता। डॉ. मनमोहन सिंह ने पाकिस्तान के राष्ट्रपति का भाव-भीना स्वागत करके पाकिस्तान की जनता का सम्मान किया है। सबसे अच्छी बात तो यह हुई कि ज़रदारी अपने साथ अपने बेटे और सत्तारूढ़ दल के अध्यक्ष बिलावल भुट्टो ज़रदारी को भी अपने साथ लाए। मैं तो यह समझता हूं कि उनकी भारत-यात्रा का मुख्य लक्ष्य यही था कि वे अपने उत्तराधिकारी का भारत के नेताओं से परिचय करवा दें। हो सकता है कि उन्होंने अजमेर में बिलावल के लिए ही मन्नत मांगी हो। यह असंभव नहीं कि पाकिस्तान का अगला चुनाव ‘पीपल्स पार्टी’ बिलावल के नेतृत्व में ही लड़े। इस संपूर्ण यात्रा में बिलावल पर जितना ध्यान गया, उतना अन्य किसी नेता पर नहीं गया। कौन जाने कि बिलावल कहीं पाकिस्तान के अखिलेष यादव न सिद्ध हो जाए।

यह ठीक है कि 40 मिनिट की बातचीत में दर्जन भर मुद्दों पर क्या बात हो सकती थी? दोनों नेताओं ने अपने-अपने मुद्दे एक-दूसरे के सामने दोहरा दिए ताकि वे अपनी-अपनी जनता और संसद को मुंह दिखाने लायक रह सकें। कोई मनमोहन सिंह को यह दोष नहीं दे सकता कि उन्होंने हाफिज सईद का मुद्दा नहीं उठाया और कोई जरदारी को यह दोष नहीं दे सकता कि उन्होंने कश्मीर, सियाचिन और सर क्रीक का मुद्दा नहीं उठाया। सच्चाई तो यह है कि दोनों ने अपनी-अपनी खानापूरी कर दी। इससे ज्यादा वे अभी क्या कर सकते थे? जहां तक ज़रदारी का सवाल है, सबको पता है कि वे कितने मजबूत हैं? पाकिस्तान की फौज और अदालत दोनों से उनकी गुत्थमगुत्था चल रही है। वे लाख चाहें, फिर भी वे भारत के साथ अपनी मनमर्जी का रिश्ता नहीं बना सकते। उनसे थोड़ा बेहतर हाल हमारे प्रधानमंत्री का है। उन पर फौज का दबदबा नहीं है लेकिन वे इंदिरा गांधी या अटलबिहारी वाजपेयी की तरह लोकप्रिय नेता नहीं हैं। जैसे ज़रदारी अपनी कुर्सी में शहीद बेनज़ीर की वजह से हैं, मनमोहन सिंह सोनिया गांधी की वजह से हैं। दोनों नेता नहीं हैं। दोनों को लोग शिष्टतावश नेता कहते हैं। दोनों से आप किसी अत्यंत चमत्कारी पहल की आशा नहीं कर सकते, जिसका असर दोनों देशों पर एक साथ पड़ सके। ऐसे में अगर दोनों एक-दूसरे के प्रति सद्भाव दिखा रहे हैं तो दोनों देशों में उसका स्वागत होना चाहिए।

यह सद्भाव और यह स्वागत बेकार नहीं जाएगा। जिन-जिन मुद्दों पर आपसी सहमति है, उन पर हम आगे बढ़ते चले जाएं। जैसे आपसी व्यापार का मामला! यदि ईरान और तुर्कमेनिस्तान से पाइप लाइनें  भारत आ सके और भारत का माल पाकिस्तान होकर ईरान, अफगानिस्तान तथा मध्य व पश्चिम एशिया आ-जा सके तो पाकिस्तान निहाल हो जाएगा। वह बैठे-बैठे चांदी काटेगा और इन सब देशों की नस उसके अंगूठे के नीचे होगी। अब से लगभग बीस साल पहले जब यह बात मैंने राष्ट्रपति फारूक लघारी और प्रधानमंत्री बेनज़ीर को सुझाई तो उन्होंने कहा कि दोनों मुल्कों के बीच इतनी राजनीतिक आग बरस रही है। ऐसे में ‘तआव्वुन’ (सहयोग) का यह सब्जबाग कैसे पनपेगा? मुझे खुशी है कि उसी बात को ज़रदारी ने इस्लामाबाद पहुंचते ही दोहरा दिया। मैंने कहा था कि जैसे भारत और चीन ने अपने विवादों पर बातचीत लगातार जारी रखी है, हम भी रखें लेकिन आपसी सहमति के मुद्दों पर हम आगे बढ़ते चले जाएं। अभी भी भारत-चीन सीमा का सवाल अधर में लटका हुआ है, लेकिन दोनों देशों का व्यापार 70 अरब डॉलर तक पहुंच गया है। यदि ज़रदारी की यह भारत-यात्रा दोनों देशों को इसी पटरी पर लाने की हवा बना सके तो क्या उसके परिणाम बहुत गहरे और दूरगामी नहीं होंगे ? अगर भारत-पाक रेल इसी पटरी पर चलती रहे तो अफगानिस्तान हमारे आपसी दंगल का अखाड़ा नहीं बनेगा बल्कि मैत्री का संधि-स्थल बन जाएगा।  बिलावल ने ट्वीट पर जो संदेश भेजे हैं, क्या दोनों देशों की जनता उनका अर्थ नहीं समझेगी?

ज़रदारी ने मनमोहन सिंह को न्यौता दिया, अच्छा किया। वरना, उन्हें भी ननकाना साहब जाने का बहाना ढूंढना पड़ता। यदि मनमोहनसिंह पाकिस्तान जाएंगे तो वहां की लोकतांत्रिक शक्तियों को मजबूती मिलेगी। पाकिस्तानी फौज को आजकल अमेरिका और चीन दोनों आड़े हाथों ले रहे हैं। फौज का बोलबाला तो है लेकिन वह ज़िया या मुशर्रफ जैसा दुस्साहस करने की स्थिति में नहीं है। उसामा की हत्या ने भी उसकी लू उतार रखी है। ऐसे में भारत का कर्तव्य है कि पाकिस्तान की लोकतांत्रिक शक्तियों का डटकर समर्थन करे। यदि वह पाकिस्तान की जनता, फौज और आईएसआई से भी सीधे संवाद के रास्ते ढूंढ सके और उनके मन से भारत का डर निकाल सके तो भारत और पाकिस्तान जुड़वॉं भाइयों की तहर रह सकेंगे और पूरे दक्षिण एशिया का ही नक्शा बदल सकेंगे।

डॉ0 वेदप्रताप वैदिक
(लेखक भारतीय विदेश नीति परिषद के अध्यक्ष हैं)

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