रतन टाटा को ब्रिटेन की महारानी ने किया सम्मानित सहारा समूह का नया प्रस्ताव सुप्रीम कोर्ट ने किया खारिज केजी बेसिन विवाद: ऑस्ट्रेलियाई मध्यस्थकार का नाम वापस भारत में अतिरिक्त निवेश की आवश्यकता: आईएमएफ पीएम बनने पर मोदी को मिलेंगे राजनयिक विशेषाधिकार: रिपोर्ट
भारतीय मूल की महिला ने किया नस्लीय भेदभाव का मुकदमा भाजपा का घोषणापत्र, टिप्पणी करने से अमेरिका का इनकार कांग्रेस के नरेंद्र मोदी विरोधी प्रस्ताव के अब 51 सह-प्रायोजक अमेरिका में प्रस्ताव पारित कर सिखों को बैसाखी की बधाई सउदी में दो साल से पड़ा है भारतीय का शव

स्त्री मनोविज्ञान, अलगाववाद और विभाजन की त्रासदी को चित्रित करती कहानी पर चर्चा


प्रवासी दुनिया के तत्वावधान में अक्षरम द्वारा ब्रिटेन के प्रसिद्ध हिन्दी रचनाकार महेन्द्र दवेसर की कमलेश्वर पुरस्कार प्राप्त कहानी ‘ दो पाटन के बीच में’  का पाठ एवं उनकी कहानियों पर चर्चा का आयोजन साहित्य अकादेमी में 22 फरवरी को किया गया।  कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रसिद्ध व्यंग्यकार डॉ. हरीश नवल ने की और प्रसिद्ध लेखिका श्रीमती अलका सिन्हा द्वारा कहानी का पाठ किया गया। कार्यक्रम का संचालन युवा कथाकार विवेक मिश्रा ने किया। 

कार्यक्रम का शुभारम्भ महेन्द्र दवेसर जी को पुष्प गुच्छ भेंट करके किया गया। इसके उपरांत विवेक मिश्रा जी ने लेखक का परिचय अपने खास अंदाज में एक बहुत हीं सुन्दर कविता के साथ दिया। अलका सिन्हा के द्वारा कहानी पाठ को गोष्ठी ने बड़े हीं मग्न होकर सुना तथा उन्हे सुन्दर पाठ के लिए बधाई दी। 

कहानी पाट के अपरांत उपस्थित अतिथियों ने अपनी-अपनी टिप्पणियों से कार्यक्रम को आगे बढ़ाया। डॉ. नारायण कुमार ने कहा कि कहानी में अनुभूति की गहराई भी है और अभिव्यक्ति की सच्चाई भी है। रंगकर्मी रामजी बाली ने कहानी पर एक रंगमंच पर प्रस्तुत करने लायक बताया। अलका सिन्हा ने कहा कि पुरुष द्वारा स्त्री मनोविज्ञान पर यह एक बहुत  अच्छी कहानी है और इस कहानी की एक और खूबी यह है कि इसने बड़ी सहजता से दर्शाया कि हर आदमी एक गलत आईडेंटिटि में जी रहा है। अनिल जोशी जी ने कहानी को विभाजन का एक महत्वपूर्ण दस्तावेज बताया।

कार्यक्रम के संचालक श्री विवेक मिश्रा जी ने कहा कि कहानी यह बखूबी से बताती है कि लेखक को प्रवासी होने का दुख नही है पर वह प्रवासी होने पर अपनी कठिनाईयों से अनभिज्ञ भी नहीं है। विवेक जी ने अलका जी की बात का समर्थन करते हुए कहा कि कहानीकार को नारी जीवन में रुचि है और इसी वजह से मनोस्थिति का चित्रण करने में वो सफल रहा है।

कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे डॉ. हरीश नवल जी ने कहानी की तुलना नई कहानी के उस दौर से की जब कहानी में अलगाववाद प्रधान होता था। साथ हीं साथ उन्होंने यह भी कहा कि कहानी कई जगहो पर खत्म होती नजर आती है पर लेखक उसे सामग्री और कथन की बहुलता की वजह से आगे बढ़ाता है। उन्होंने महेन्द्र जी से कहानी पर आधारित एक उपन्यास लिखने की मांग की ताकि महेन्द्र जी अपने अनुभवो को विस्तृत रुप में साझा कर पायें।

गोष्ठी ने समग्रता से इस बात को स्वीकारा कि कहानी वाकई में एक महत्वपूर्ण असर छोड़ती है और पाठक को सोचने पर मजबूर करती है जिसका परिणाम है कि श्रोताओं के दिलो दिमाग में अनगिनत चित्र उभर आयें हैं।

लेखक महेन्द्र दवेसर जी ने गोष्ठी के सामने अपने विचार और प्रतिक्रिया रखते हुए कहा कि मेरी कहानियां भावना प्रधान होती हैं और हर लेखक की तरह वो भी अपने एक खास अंदाज में लिखना पसंद करते हैं। उन्होंने कहा कि वो सम्पूर्णता से महरुम होकर भी अपनी भावनाओं को पाठकों के समक्ष लाने के लिए प्रयासरत रहते हैं।

कार्यक्रम में दिल्ली के कई प्रमुख साहित्यकारों ने भाग लिया, जिसमें प्रमुख है नरेश शांडिल्य, डॉ. गिल,सत्या जी इत्यादि।

कार्यक्रम के अंत में डॉ. नारायण कुमार जी ने धन्यवाद ज्ञापन दिया तथा लेखक को पुरस्कार के लिए बधाई दी।

हिन्दी में राष्ट्रीय - अंतरराष्ट्रीय समाचार, लेख, भाषा - साहित्य एवं प्रवासी दुनिया से नि:शुल्क जुड़ाव के लिए
अपना ईमेल यहाँ भरें :

Leave a Reply