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अजित सिंह जिन्होंने देश की स्वतंत्रता के लिए जन्म लिया था – अनिल जोशी


( शहीदी दिवस के उपलक्ष्य में विशेष)

भारत   को आजादी दिलाने के लिए लाखों लोगों ने संघर्ष किए। अपनी जान कुर्बान की। अपने जीवन का एक-एक क्षण देश के लिए समर्पित कर दिया। ऐसे ही स्वतंत्रता सेनानियों में से एक हैं अजीत सिंह। जी हां, वही अजीत सिंह जो भगतसिंह की प्रेरणा थे जिनके साथ जाकर भगतसिंह खेत में खिलौना पिस्तौल बोकर बंदूकें उगाने के सपने देखते थे। भगतसिंह के क्रांतिकारी जीवन की नींव अजीतसिंह जो उनके चाचा थे के हाथ से पड़ी। हाल में ही भगतसिंह की भतीजी श्रीमती वीरेन्द्र अरोड़ा भारत आई हुई थीं। इधर युरोप में ज्वालामुखी फूटने के कारण उनकी उड़ान रद्द हो गई तो उनके परिवार के बारे में बात करने का मौका मिला। सरदार   अजीतसिंह अपनी जवानी में ही भारत की आजादी के लिए अलख जगाने के लिए विदेश चले गए थे। विदेश में भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन को संगठित करने में उनका महत्वपूर्ण योगदान है। उनके द्वारा बताया गया सरदार अजीतसिंह जीवन का घटनाक्रम उत्साह और प्रेरणादायक है।

सरदार अजीत सिंह के परिवार की अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष की लंबी कहानी है। इनके दादा अंग्रेजों के खिलाफ रणजीत सिंह की तरफ से लड़े। अंग्रेजो ने इनकी जमीन-जायदाद जब्त कर ली। परंतु 1857 में सहायता की एवज में वापस करने का वादा किया। इनके दादा ने अंग्रेजों की पेशकश ठुकरा दी। पिता ने आर्यसमाज आंदोलन को पंजाब में फैलाने में काफी मदद की। उसी परंपरा में सरदार अजित सिंह, स्वर्ण सिंह, किशन सिंह भगतसिंह के पिता थे। सरदार अजित सिंह ने सबसे पहले भारतीय समाज और उसकी समस्याओं से अपने को जोड़ा। उस समय देश मे अकाल था। वे बरेली, मध्य प्रदेश, गुजरात गए और अकाल राहत के कार्यों में अपने को झोंक दिया।

इसी संदर्भ में एक अकाल पीड़ित परिवार की महिला से उन्होंने जाति जैसी मान्यताओं को धता बताते हुए विवाह किया। पहला बड़ा आंदोलन जिसे उन्होंने खड़ा किया वह था पगड़ी संभाल जट्टा। लायलपुर के किसानों को उन्होंने संगठित किया और अंग्रेजों के किसान विरोधी चरित्र का पर्दाफाश कर दिया। आंदोलन की चिंगारी ज्वाला बन गयी और पंजाब विद्रोह की आग में जलने लगा। तत्कालीन भारत मंत्री में अंग्रजों ने सरदार अजीत सिंह और लाला लाजपत राय को मांडले जेल में भेज दिया। परंतु जनआक्रोश के सामने उन्हें छोड़ना पड़ा। वापस भारत आकर फिर से वे स्वतंत्रता आंदोलन को संगठित करने लगे। और जब अंग्रेजों द्वारा उन्हें गिरफ्तार किए जाने के षडयंत्र की जानकारी मिली तो वे कराची से समुद्र के रास्ते विदेश चले गए।

वहां से वे ईरान पहुंचे और ईरान में अंग्रेजों के खिलाफ चल रहे संघर्ष से जुड़ गए। वहां से वे युरोप गए और निरंतर अंग्रेजों के खिलाफ संघर्ष को संगठित करते रहे। कनाडा में कामागाटामारू और गदर पार्टी के आंदोलनों में उनका विशेष हाथ रहा। द्वितीय विश्व युद्ध   में इटली के खिलाफ लड़ रहे 10000 भारतीय सिपाहियों को उन्होंने आजाद हिंद फौज में जोड़ लिया। द्वितीय विश्व युद्ध  के बाद अंग्रेजों ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया और सख्त कारावास दिया। वीरेन जी बताती हैं कि जवाहरलाल नेहरू जब भगतसिंह को जेल में मिले थे तो भगतसिंह ने इच्छा व्यक्त की थी कि वे अपने चाचा अजीत सिंह से मिलना चाहते थे। 1946 में भारत की अंतरिम सरकार बन चुकी थी। नेहरू जी को भगतसिंह की वह बात स्मरण थी। उन्होंने अजीतसिंह की रिहाई सुनश्चित की। वीरेन जी भावुक होकर बताती हैं कि वे उस समय 6 वर्ष की थी जब अजीतसिंह लाहौर रिहाई के बाद आए थे। इतना ऐतिहासिक जुलूस-40 साल के संघर्ष के बाद भारत मां का लाडला आया था। यहां यह स्मरण रहे कि अजीतसिहं द्वारा 1907 में जिस संस्था की स्थापना की गई थी उसका नाम भारतमाता सोसायटी था और प्रकाशन भारत माता प्रकाशन था। पर विभाजन की बातों ने उनका सारा उल्लास समाप्त कर दिया। उनका स्वास्थ्य लगातार खराब हो रहा था। वे डलहौजी चले गए। 15 अगस्त 1947 की रात उन्होंने जवाहरलाल नेहरू का भाषण सुना, भारत के आजाद होने की घोषणा और उसी रात उनका देहान्त हो गया।

जैसे एक मिशन के लिए उनका जन्म हुआ था और मिशन पूरा होते ही उन्होंने प्राण त्याग दिए। वीरेन जी के पास ऐसी ढेरों बाते हैं। मैं उनसे आग्रह करता हूं कि वे लिखें, बताएं। मुझे डर है कि भारत के स्वतंत्रता सेनानियों का यह प्रथम परिवार और उनके संस्मरण उनके साथ ही बिना लिखे पढ़े दफन ना हो जाएं।

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अनिल जोशी

anilhindi@gmail.com

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