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अमर शहीद भगत सिंह की भतीजी एवं क्रान्तिकारी साहित्य लेखिका – वीरेंद्र सिन्धु


प्रारंभिक जीवन: जन्म २७ जून १९४०, लायलपुर, पंजाब । स्वतंत्रता सेनानी पिता सरदार कुलतार र्सिंह उस समय लाहौर जेल में थे।  नन्हीं बालिका की अपने पिता के साथ प्रथम भेंट वहीँ हुई ।

१९४७ में भारत विभाजन के बाद अपने पुश्तैनी गांव खटकड़ कलां और बाद में सहारनपुर में निवास और वहीँ शिक्षा ग्रहण करते हुए आगरा विश्वविद्यालय से राजनीति शास्त्र में एम. ए. स्नातकोतर शिक्षा पाई। उससे पूर्व बी. टी, कर चुकीं थीं।  सहारनपुर कालेज में अध्यापन कार्य किया।

१९६८ में विवाह के उपरांत और १९६९ में विदेशगमन।

चिंतन प्रेरणा और लेखन:  शहीद परिवार की एक लतिका होने और लेखकीय प्रतिभा संपन्न होने से अपने परिवार के देश के प्रति समर्पण और बलिदानों की पृष्ठभूमि के साथ वीरेन्द्र जी ने भारत के स्वतंत्रता संघर्ष कालीन संघर्ष में क्रांतिकारियों की ऐतिहासिक भूमिका का गहन अध्ययन किया। अपने ताया शहीद भगत सिंह के सम्बन्ध में अपनी दादी माता बिद्यावती जी और पिता की यादों और अपने ही परिवार में सुरक्षित दस्तावेजों का लाभ लिया। उनके बलिदानों पर हिन्दी पत्र पत्रिकाओं में वीरेन्द्र जी के अनेक लेख प्रकाशित हुए। क्रांतिकारी साहित्य पत्रिका ‘संजीवनी’ की संस्थापक संपादिका रहीं।

प्रकाशित रचनाएँ :-

युगद्रष्टा भगत सिंह और उनके मृत्युंजय पुरखे: अमर शहीद, प्रसिद्ध क्रान्तिकारी सरदार भगतसिंह की यह प्रामाणिक जीवनी वर्षों के अध्ययन और रिसर्च का परिणाम है। परिवार के सभी वरिष्ठ सदस्यों की जुबानी  जो महत्त्वपूर्ण जानकारियां  वीरेंद्र सिन्धु  को मिलीं, वे पहली बार इस पुस्तक में समाविष्ट हैं। इसमें सरदार भगतसिंह और उनके पुरूखों के जीवन-वृत्त तो हैं ही, साथ ही युवा क्रातिकारियों द्वारा अंग्रेजों से देश का आज़ादी के संघर्ष का रोमांचक वर्णन भी है।

अनेक लेखकों द्वारा सतत उद्धृत एक प्रामाणिक, ऐतिहासिक एवं विश्लेष्णात्मक मूल ग्रन्थ जो सर्वप्रथम १९६८ में भारतीय ज्ञानपीठ द्वारा और अब राजपाल एंड संस प्रकाशित है।  इसके अनेक संस्करण प्रकाशित हो चुके हैं। यह पुस्तक एक प्रामाणिक, ऎतिहासिक दस्तावेज़ है।

शहीद भगत सिंह: १९७४ में पंजाब सरकार द्वारा प्रकाशित पंजाबी भाषा संस्करण.

अमर शहीद भगत सिंह: १९७४ में भारत के प्रकाशन विभाग द्वारा प्रकाशित संक्षिप्त हिन्दी संस्करण

भगत सिंह पत्र और दस्तावेज़: संकलन और संपादन पहली बार १९६८ में प्रकाशित –  केन्द्रीय असेम्बली में बम फैंकने और लाहौर बम कांड के सम्बन्ध में उनके विरुद्ध दायर मुकदमों में अदालत में भगत सिंह के महत्वपूर्ण बयानों, और दस्तावेजों पर आधारित पुस्तक । अमर शहीद भगतसिंह को प्रायः क्रान्तिकारी देशभक्त के रूप में ही जानते हैं। परन्तु वह आरम्भ से ही अध्ययनशील, विचारक और कलम के धनी भी थे। अपनी २३ वर्ष की आयु में उन्होंने फ्रांस, आयरलैण्ड तथा रूस की क्रान्तियों का विशद अध्ययन किया था। नेशनल कॉलेज से लेकर फाँसी की कोठरी तक उनका अध्ययन बराबर जारी रहा। इस अध्ययन के फलस्वरूप वह गम्भीर चिन्तक और क्रान्तिकारी दार्शनिक बने।
असेम्बली में बम विस्फोट के समय फेंके गए पर्चे में उनका महत्त्वपूर्ण वाक्य था- “हम देश की जनता की ओर से कदम उठा रहें है।” इस घटना ने जनता को पहली बार विद्रोह का नेतृत्व सौंप दिया। शहीद भगतसिंह के ऎसे अनेक प्रामाणिक और ऎतिहासिक दस्तवेजों का अपूर्व संकलन किया है लेखिका ने। इस पुस्तक में शहीद भगतसिंह के ये दुर्लभ पत्र और दस्तावेज़, जो सही माने में राष्ट्र की मूल्यवान निधि है और आने वाली पीढ़ी के लिए मार्गदर्शक भी, पहली बार हिन्दी में प्रकाशित हुए हैं।

मेरे क्रांतिकारी साथी: भगत सिंह – संकलन और संपादन  पहली बार १९६८ में प्रकाशित

सम्मान एवं पुरस्कार: २००८ में पंजाब सरकार  द्वारा शिखर हिन्दी साहित्य सम्मान एवं पुरस्कार

सामाजिक अभिनन्दन: भारत में शहीद भगतसिंह की स्मृति में आयोजित अनेक सभाओं में वीरेन्द्र जी को आमंत्रित और सम्मानित किया जाता रहा है.  २००६ में गुजरात के राजकोट नगर में शहीद भगत सिंह की प्रतिमा स्थापना के लिए नगर महापौर ने आमंत्रित किया. अनेक नगरों में जनता ने उनका भव्य स्वागत किया और उन्हें सम्मानित किया। वीरेन्द्र जी प्रभावी वक्ता भी हैं और स्वतंत्रता संघर्ष में क्रांतिकारियों के भूमिका पर अधिकार भाव से बोलती हैं।

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