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अनुराग शर्मा नाद के कहानीकार हैं -डॉ मृदुल कीर्ति


पञ्च तत्वों के समीकरण की जब बात होती है तो उनकी तन्मात्राओं के  अनुपात से ही उनकी सूक्ष्मता को जान पाते हैं. आकाश तत्व की केवल ‘नाद’ तन्मात्रा है. नाद का सीधा सम्बन्ध श्रुति से है.  वैसे भी हम श्रुति परंपरा के ही तो वाहक हैं क्योंकि वेद श्रुति से ही हम तक आये हैं. कुछ  मनोवैज्ञानिक और प्रमाणिक  तथ्य हैं कि ध्वनि तत्व सर्वाधिक प्रभावशाली और सूक्ष्म है.  आज हम आपका परिचय एक ऐसे ही व्यक्तित्व से करवाते हैं जो ध्वनि तत्व के साधक और कम्प्यूटर तकनीक को हिंदी साहित्य और संस्कृति के प्रसारण में सहायक बनाने को प्रयासरत है और अमेरिका में पिट्सबर्ग में रहते है.

अनुराग शर्मा  जी ने श्री बिनोवा भावे का  गीता का  भाषा भाष्य और प्रेमचन्द्र सहित अनेक नये-पुराने लेखकों की प्रमुख और प्रसिद्ध कहानियों को कम्प्यूटर तकनीक से एक क्लिक से सुना जा सके, इस  योग्य बनाया. वे स्वयं भी कहानीकार और ब्लॉगर हैं. भारत से दूर रहते हुए उन्होंने इंटरनैट पर 24 घंटे चलने वाला भारतीय रेडियो स्टेशन आरम्भ किया. भारत, हिंदी और साहित्य के लिए  उनकी यह  तकनीकी कुशलता एक सराहनीय योगदान है.  आइये उनसे ही उनकी बात करते हैं.

प्रश्न –अपनी इस तकनीक के प्रति आप कहाँ से प्रेरित और कैसे प्रेरित हुए?

  –    भाग्यशाली हूँ कि सदा अच्छे और सक्षम लोगों का साथ मिला है, वे ही मेरी प्रेरणा रहे हैं. मैं विज्ञान और तकनीक को सांसारिक समस्याओं के हल करने के अस्त्र के रूप में देखता हूँ. सूचना प्रौद्योगिकी मेरे जीवन-यापन

का साधन तो है ही मेरी हॉबी भी है. सहज उपलब्ध सरल तकनीक द्वारा मैंने अपने सामने आई समस्याओं का समाधान किया है. 1987 में दिल्ली के पश्चिमी छोर पर स्थित झड़ौदा कलाँ ग्राम से अपनी नौकरी के लिये नॉइडा जाते हुए रोज़ 6 घंटे विभिन्न नगर-बसों की यात्रा में बिताते हुए मैं बैंक के प्रोबेशनरी अधिकारी की परीक्षा की तैयारी कर रहा था. रविवार के दिन सारी सामग्री बस एक बार पढकर टेपरिकॉर्डर पर रिकॉर्ड कर लेता था और जब भी समय मिलता सुनता रहता था. बस इसी तैयारी से न केवल बैंक अधिकारी बना बल्कि प्रथम पाँच में स्थान भी पाया. तब से मैंने श्रवण साधन को प्रमोट किया और इसे अपनाने से बहुत से मित्रों को लाभ हुआ.

प्रश्न –- तो इस प्रकार आपने सहज श्रवण तकनीक का सफलतापूर्वक प्रयोग किया. हमारे पाठकों के लिये श्रवण पाठन के बारे में कुछ और जानकारी दीजिये …

–    हम भारतीय श्रुति परम्परा के वाहक हैं. वैदिक युग से लेकर भक्तिकाल तक का ज्ञान सुनकर हम तक आया है. भारतीय संस्कृति में कथा पढी नहीं बांची (वाचन) जाती है, ज्ञान की देवी वाक्देवी हैं. लगभग दो शताब्दी पहले

छापेखाने का आविष्कार होने तक पुस्तकें दुर्लभ थीं. उसके बाद भी वे लम्बे समय तक महंगी और अनुपलब्ध रहीं. भारत-नेपाल-पाकिस्तान जैसे देशों में आज भी एक बड़ी जनसंख्या पठन-पाठन की क्षमता से वंचित है. जिस ग़रीब इंसान को एक वक़्त का स्नान भी दुर्लभ हो उसके लिये तो किताबें आज भी विलासिता की सामग्री हैं. अखबार पत्रिकायें आदि पढने वाला वर्ग भी अखबार में बासी समाचार ही पढता है जबकि रेडियो, दूरदर्शन आदि पर संसार भर की जानकारी क्षण भर में देखी सुनी जा सकती है. आप घर में आराम करते हुए भी और चलती बस, रेल या कार में भी रेडियो, सीडी आदि सुन सकते हैं, नई भाषा सीख सकते हैं. देखना, सुनना प्राकृतिक है, जबकि पढना एक मानव-निर्मित (कृत्रिम) साधन है.

प्रश्न — आपके रेडियो में कुछ अलग सा था, क्या था वह?

–    भारतीय रेडियो आरम्भ करते समय मैंने यह ध्यान में रखा कि हम भारत को किसी एक क्षेत्र, एक साधन, एक विधा या एक भाषा तक सीमित न रखें. संगीत, समाचार, विचार, समीक्षा प्रस्तुत करते समय पिट रेडियो (पिट्सबर्ग से भारतीय स्वर) ने असमी से संस्कृत, सिन्धी से तुलु, आशा भोसले से येसुदास, बॉलीवुड से बाउल तक और इन सबसे आगे भारतीयता के असीमित रूप और विविधता में एकता को सामने रखने का प्रयास किया.

प्रश्न — ऑनलाइन कवि सम्मेलन — जो एक अद्भुत प्रयास था, उसके विषय में कुछ बताइये

–    दूर देश में बैठे हुए साहित्यकारों का ऑनलाइन मिलन अपने आप में एक अनूठा प्रयोग था. हिन्दी साहित्य के प्रसार प्रचार के लिये तकनीक के सफल प्रयोग का यह एक उत्कृष्ट उदाहरण सिद्ध हुआ है. आवाज़ पर जब आपके संचालन में ऐसे कवि सम्मेलन पॉडकास्ट प्रस्तुत किये तो मुझे सम्पादन और तकनीकी सहायता का अवसर मिला इसकी खुशी है. इस बहाने अनेक कवियों के साथ लावण्या जी और डॉ.मृदुल कीर्ति – आप सरीखी विदुषियों से परिचय हुआ, मेरे लिये तो यह भी एक कार्यसिद्धि ही है. कल ही देख रहा था कि वे कवि सम्मेलन अभी भी दुनिया भर में हज़ारों श्रोताओं द्वारा सुने जा रहे हैं. एक उदाहरण यहाँ प्रस्तुत है:

http://archive.org/details/KaviSammelanFeb2009

प्रश्न — क्या आपका करियर आपकी इस रूचि से प्रभावित हुआ?

–    जीवन में संतुलन बनाये रखना भी एक कला है।. लेखन, अंतर्जाल और तकनीक मेरी रुचि भी है और मेरे करियर का आधार भी . इस प्रकार ये दोनों ही एक दूसरे के पूरक और लाभप्रद सिद्ध हुए हैं.

प्रश्न — क्या इस तकनीक के माध्यम से हिंदी साहित्य का प्रसार अधिक हो सकता है? इस विषय में आप क्या सोचते हैं?

–    जी, तकनीक एक सहज, सुलभ, सक्षम साधन है. अंतर्जाल पर लेखन व श्रवण-दर्शन साधनों से हिन्दी ही नहीं अन्य भाषाओं का साहित्य भी आसानी से भाषायी, भौगोलिक, और शारीरिक सीमायें लांघ चुका है. ब्लॉगिंग जैसी नई

विधा ने साहित्यकार (और कलाकार) को उसके पाठकों (और दर्शकों/श्रोताओं) से तत्काल जोड़ दिया है. इधर आपने लिखा, उधर प्रतिक्रिया मिली. हिन्दी क्या संस्कृत के दुर्लभ ग्रंथ भी अंतर्जाल पर उपलब्ध हैं. यहाँ ज्ञान का स्वर्ग भी है और हिंसा, द्वेष, और अज्ञान का नर्क भी. यह हमारे ऊपर है कि हम इसका उपयोग कितनी ज़िम्मेदारी से करते हैं. हिन्दी के न जाने कितने क्षेत्रीय रूपों से ब्लॉगिंग के कारण सहज परिचय हुआ, कितने ही शब्दों के  उद्गम, उनकी यात्रा के बारे में अंतर्जाल समूहों पर विचार विमर्श हुए. कविता कोश जैसे विशाल संग्रह इसी तकनीक द्वारा सम्भव हुए. तकनीक के द्वारा भाषा सम्पन्न हो रही है, हिन्दी का संसार विस्तृत हो रहा है.

प्रश्न –- आप किस प्रकार के ब्लॉग्स से जुड़े हैं?

–    निरामिष ब्लॉग हिन्दी और अंग्रेज़ी में शाकाहार से सम्बन्धितजानकारियाँ प्रदान करता है जबकि रेडियो प्लेबैक मनोरंजन. शेष सभी मेरे निजी ब्लॉग हैं जो तकनीक, भाषा, समीक्षा और मेरी रचनाओं के आधार पर बँटे

हुए हैं.

प्रश्न — अनुराग जी, यह सब शुरू कैसे हुआ? कृपया अपनी हिंदी साहित्य की रूचि और रुझान के प्रति कुछ और बताएं.

–    हिन्दी मेरी मातृभाषा है. बचपन से ही सुरुचिपूर्ण साहित्य पढने का अवसर मिला. पारिवारिक पृष्ठभूमि ऐसी थी कि जहाँ घर के अन्दर हर ओर या तो हिन्दी, अंग्रेज़ी पढाने वाले थे या संस्कृत पढने वाले. सूर, मीरा, तुलसी, कबीर को बचपन से साथ पाया. बाद में पाठ्य-पुस्तकों, पत्रिकाओं और साहित्य अकादमी व नेशनल बुक ट्रस्ट के प्रकाशनों द्वारा हिन्दी माध्यम से देश भरके अनेक लेखक-लेखिकाओं से पहचान हुई. अश्क़ जी से संक्षिप्त पत्राचार और मन्नू जी से एक अनपेक्षित फ़ोन वार्ता मुझे पुलकित करने वाले क्षणों में से हैं. तब से अब तक हिन्दी में न जाने क्या क्या पढ डाला है. उद्देश्यपूर्ण साहित्य जो वास्तविक होते हुए भी सुरुचिपूर्ण और आह्लादकारी हो, मेरी पहली पसन्द है.

प्रश्न — अनुराग जी, आज आपकी आवाज़ में सैकड़ों कहानियों के पॉडकास्ट ऑडियो उपलब्ध हैं. क्या इनमें से कोई एक कहानी आज हमारे दर्शकों को सुनायेंगे?

–    ज़रूर. हरिशंकर परसाई जी का यह व्यंग्य “चार बेटे” प्रस्तुत है:

http://www.archive.org/download/CharBete/parsai-4bete.mp3

प्रश्न – विनोबा भावे के गीता प्रवचन का पाठ भी आपने किया है, एक कम्प्यूटर इंजीनियर और सूचना प्रबन्धक का गीता और विनोबा से अनुराग कैसे हुआ?

–    संसार भर में अपनी तरह के अनूठे भूदान यज्ञ के द्वारा विनोबा जी ने मुझे पातंजल योग सूत्र में वर्णित सिद्धि के सिद्धांत को और गीता में सन्यासी द्वारा बिना कुछ किये सब कर सकने की क्षमता का खुलासा किया.

जिस व्यक्ति ने अपने पास अपना कुछ भी न रखा हो उसके हाथ से हज़ारों भूमिहीनों का भूमिपति बनना संसार के महान आश्चर्यों में से एक है. स्वाधीनता संग्राम के प्रथम सत्याग्रही विनोबा जी से मैं प्रभावित था. जब मेरे मित्र श्री भीष्म देसाई ने उनके गीता प्रवचन के ऑडियो का सुझाव दिया तो बहुत अच्छा लगा. मूल मराठी के प्रवचनों का हिन्दी अनुवाद मैंने और गुजराती अनुवाद देसाई जी ने पढा है जो अंतर्जाल पर उपलब्ध है और इसके अब

तक चार हज़ार से अधिक डाउनलोड हो चुके हैं. इंटरनैट तक पहुँच न रखने वाले श्रोताओं के लिये हम लोग इनके सीडी बनाकर निशुल्क वितरण करने पर विचार कर रहे हैं.

–    http://archive.org/details/Vinoba_Bhave_Geeta_Pravachan_Hindi

प्रश्न – आप तात्या टोपे के वंशजों से मिले हैं, जापान जाकर नेताजी के भस्मावशेष देखकर आये हैं, स्वाधीनता सेनानियों के बारे में, उनके नायकत्व के बारे में लिखते भी रहे हैं, इस बारे में कुछ बतायेंगे?

–    आज खलनायकों को सफलता पाते देखकर आमजन हताश होते हैं. कालाधन, सुधार आदि की बात करके वालों को जनता हाथों हाथ लेती है और कुछ ही दिनों में असलियत ज़ाहिर होने पर निराशा की गर्त में चली जाती है. ऐसे में अच्छे -बुरे की पहचान करने की क्षमता ज़रूरी है. मैं समझता हूँ कि जिनमें यह दृष्टि है, उन्हें सामने आकर इसके ज्ञान का प्रसार करना चाहिये. कठिन समय में यह पहचान आसानी से हो जाती है क्योंकि नायकों में ही अपना सर्वस्व लुटाने का, दूसरों के लिये अपनी जान न्यौछावर करने का दैवी गुण होता है. जबकि खलनायक सत्ता, शक्ति और यश के भूखे होते हैं और इसके लिये वे हिंसा और दमन का मार्ग अपनाते हैं. नायक बनना तो दूर की बात है लेकिन उनकी सोच को समझ पाना भी बहुत से लोगों की क्षमता से परे है. मेरा प्रयास उन महामनाओं की सोच और कृतित्व को समझने का है.

प्रश्न –- लेखन और वाचन के अलावा क्या आप समाज सेवा से ज़मीनी तौर पर भी जुड़े हैं?

–    कुछ खास तो नहीं लेकिन यथासम्भव छिटपुट काम करता रहता हूँ. पहले कुछ भारतीय सांस्कृतिक संस्थाओं के लिये बच्चों के नाटक लिखे और निर्देशित किये थे, एक नृत्य संस्थान की वैबसाइट बनाई, युनाइटेड वे और तिब्बत के मित्र (फ़्रैंड्स ऑफ़ टिबैट) के लिये थोड़ा काम किया है, अवसर मिलने परश्रमदान, और रक्तदान भी किया है. हिन्द महासागर की 1995 की त्सुनामी के समय कुछ धन इकट्ठा करके भेजने में सहयोग किया था. ज़िन्दगी छोटी है मगर इतनी छोटी भी नहीं कि कोई भी सत्कर्म किये बिना मर जाऊँ.

प्रश्न –-लेखन, रेडियो, सामाजिक कार्य, आप काफ़ी कुछ करते रहे हैं, समय की कमी सामने नहीं आती क्या?

–    कोई भी काम शुरू करने से पहले जहाँ तक सम्भव हो उसकी योजना मन में बना लेता हूँ, याददाश्त अच्छी है, मन शांत रहता है इसलिए थोड़ी आसानी हो जाती है. समय का सदुपयोग करता हूँ. मेरा काम ऐसा है जिसमें नयी तकनीक से हमेशा रूबरू होना पड़ता है और मैं एक विद्यार्थी हूँ. किताबें पढने के बजाय जहाँ तक सम्भव हो ऑडियो बुक्स को सुनता हूँ. ड्राइव करते समय रेडियो पर खबरें और CD पर किताबें व संगीत सुनता हूँ. दफ्तर व घर में काम करते समय भी अपने काम से जुड़े हुए पॉडकास्ट सुनता हूँ.

  प्रश्न – हमारे पाठकों के लिये आपकी ओर से कोई सन्देश?

 –    सत्यमेव जयते नानृतम!

अनुराग जी इस इस तकनीकी विधा के विषय में बताने के लिए अनेकों धन्यवाद .  साहित्य और संस्कृति के परिवेश  में आपकी  तकनीकी विधा को जोड़ना बहुत ही आकर्षक और  लाभकारी तो है ही साथ ही इसमें भविष्य की बहुत संभावनाएं भी छुपी है. अनेक साधुवाद

अभी आपने जो एक वाक्य कहा कि ‘ कि जीवन छोटा है किन्तु इतना भी नहीं कि कुछ सार्थक ना किया जा सके , केवल यही एक वाक्य आपके अंतस और व्यक्तित्व का दर्पण है जो मुझे बहुत ही अच्छा लगा.

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2 Comments

  • शशि पाधा says:

    अनुराग जी के व्यक्त्तित्व तथा कृतितत्व के विषय में जान कर बहुत अच्छा लगा | साथ ही वेब पर क्या -क्या उपलब्ध है, इसके विषय में भी ज्ञान वर्धक जानकारी मिली | मृदुल जी, इस साक्शात्कार के लिए धन्यवाद तथा प्रवासी दुनिया का आभार |

  • भाई श्री अनुराग जी एक बेहतरीन इंसान हैं। तकनीकी ज्ञान के धनी हैं। सभ्य , सुसंस्कृत सज्जन भी हैं।
    डा। मृदुल कीर्ति जी के संग उनकी बातचीत से हम पाठकों को कई सारी जानकारियाँ हासिल हुईं हैं।
    आशा है आगे भी ‘ प्रवासी दुनिया ‘ के माध्यम से ऐसे बढिया साक्षात्कार पढने के सुअवसर मिला करेंगें।
    – लावण्या

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