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भारत का मौन – डॉ. वेदप्रताप वैदिक


Dr.-Ved-pratap-Vaidik   नई दिल्ली,मार्च 23 :  विदेश नीति के मामले में हमारी सरकार लगभग अकर्मण्य सिद्ध हो रही है। फिलहाल उसका सारा ध्यान चुनाव में लगा हुआ है। विदेश नीति का लक्ष्य होता है- अपने देश के हितों की रक्षा करना लेकिन इस समय कांग्रेस अपने ही हितों की रक्षा में निमग्न है बल्कि यह कहें तो अनुचित नहीं होगा कि वह अपनी ही रक्षा में पूरी तरह से डूबी हुई है। उसका अपना अस्तित्व इस बार जितने खतरे में है पहले कभी नहीं रहा।

इसीलिए विदेश मत्रालय से अगले दो ढाई माह में किसी बड़ी पहल की उम्मीद करना जरा ज्यादती ही होगी। आजकल उक्रेन का मामला सारी दुनिया में छाया हुआ है। रूस और अमेरिका के बीच तलवारें खिंची हुई हैं लेकिन भारत की भूमिका नगण्य है। उक्रेन के क्रीमिया क्षेत्र में जनमत संग्रह हो गया है। उसे उक्रेन से तोड़कर रूस में मिलाने पर जनता की हां हो गई है। क्या ऐसा होना ठीक है? क्या अंतरराष्ट्रीय जगत में इस घटना का स्वागत होगा? यदि इसी तरह जनमत संग्रह होते रहे तो खुद रूस के पता नहीं कितने टुकड़े हो सकते हैं। अमेरिका, चीन, भारत, पाकिस्तान, फिलीपींस, ग्रेट ब्रिटेन, केनाडा आदि ऐसे अनेक देश हैं, जिनके कुछ प्रांतों में वर्षों से अलगाववाद की चिंगारियां सुलगती रही हैं। यदि सभी जगह जनमत-संग्रह होने लगें तो दुनिया का नक्शा ही बदल जाएगा। ज्यादा बुनियादी सवाल यह है कि क्या अलगाववाद से सच्ची स्वतंत्रता और संपन्नता प्राप्त की जा सकती है? क्या उन क्षेत्रों के आम लोगों को बेहतर जीवन दिया जा सकता है?

जहां तक उक्रेन का सवाल है, यह ठीक है कि पश्चिमी राष्ट्र उसे अपने चंगुल में फंसाने की पूरी कोशिश कर रहे हैं और वहां की चुनी हुई सरकार को उन्होंने पलायन के लिए मजबूर कर दिया है लेकिन इसके जवाब में उस देश के टुकड़े कर देना उचित नहीं है। इस संबंध में चीन ठीक पहल कर रहा है। वह बीच का रास्ता निकालने की बात कर रहा है लेकिन भारत लगभग मौन है। अभी तक उसने जो प्रतिक्रिया की है, उसका कोई अर्थ निकालने की कोशिश करे तो यही निकलेगा कि वह कुछ-कुछ रूस की तरफ झुक रहा है। आज भारत के संबंध रूस से भी ज्यादा अमेरिका से घनिष्ठ हैं। अब भारत गुट निरपेक्ष नहीं रहा। वह बहुगुट-सापेक्ष्य है। वह असंलग्न नहीं, बहुसंलग्न है। उससे मौन और उदासीनता नहीं, सक्रियता की अपेक्षा की जाती है।

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