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काला धन एवं भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन – डॉ. भरत मिश्र प्राची


देश में काला धन एवं भ्रष्टाचार के खिलाफ फिर से एक बार आवाज बुलंद होती दिखाई दे रही है जहां अन्ना हजारे एवं योग गुरू बाबा रामदेव एक मंच पर खड़े होकर विदेशी बैंक में जमा काला धन को देश में लाकर राष्ट्रीय सम्पत्ति धोषित करने तथा भ्रष्टाचार को जड़ से समाप्त करने की मांग सरकार से करते नजर आ रहे है। इस तरह के मुद्दे सुनने में व देखने में अच्छे लगते है पर वास्तविक धरातल पर कुछ और ही नजर आता है। अन्ना हजारे एवं बाबा राम देव दोनों ही इस मुद्दे पर एक मंच पर खड़े होकर भारत की अवाम को जगाने में आंदोलनीय पृष्ठभूमि में उतर चले है, जहां भ्रष्टाचार मौलिक अधिकार का रुप ले चुका है। पिछले दिनों इसी मुद्दे पर ये दोनों अलग अलग अवाम को जागृत करने की महत्वपूर्ण भूमिका में उतरे थे जिन्हें पूरे देश में जनसमर्थन भी मिला एवं एक बार सरकार भी हिल गई। ऐसा लगा कि भ्रष्टाचार पर पूरा देश इस तरह जाग गया कि भ्रष्टाचार जड़ से मिट जायेगा। कुछ दिनो के लिये कुछ ऐसा नजारा भी देखने व सुनने को मिला , जहां भ्रष्टाचार पर अंकुश लगता दिखाई दे रहा हो। पर यह मात्र क्षणिक दिवा स्वपन्न बन कर रह गया। भ्रष्टाचार पर अंकुश तो लगा नहीं। देश में पहले से भी ज्यादा भ्रष्टाचार फैल गया। महंगाई नियंत्रण से बाहर चली गई। देश में लूट खसोट की प्रक्रिया पहले भी तेज हो गई। जन लोकपाल की चर्चा तो खटाई में पड़ गई। आंदोलन की पृष्ठभूमि आपसी विवादों में उलझ कर समाप्त हो गई।आज फिर से आवाज इस दिशा में उठी है जिसे राजनीतिक दलों का भी समर्थन मिल रहा है। इस तरह की पृष्ठभूमि में स्वार्थ एवं निस्वार्थ की  भूमिका क्या होगी जिस पर आंदोलन का पूरा भविष टिका है, मंथन की आवश्यकता है।

       आखिर काला धन किसे कहा जाय , इसकी परिभाषा आज तक सही मायने में तय नहीं हो पाई। सभी इस मामले पर एक दूसरे को सही गलत ठहराने में लगे हुए है। जिसका परिणाम रहा कि इस बीमारी का आज तक न इलाज हो पाया न भविष्य में हो पाने की उम्मीद है। भ्रष्टाचार से ही काला धन पैदा होता है यह तो शाश्वत सत्य है पर माने कौन जहां आज पूरा का पूरा परिवेश भ्रष्टाचार में समाया हुआ है। दूध में पानी की मिलावट, खाद्य पदार्थ से लेकर जीवन रक्षक दवाईयों में अनेक प्रकार की मिलावट, ठेके के काम में मिलावट एवं विचौलिये की भूमिका, रोजगार से लेकर पदोन्नित, स्थानातरण, पदस्थापन आदि तक विचौलिये की भूमिका, सार्वजनिक सरकारी, अर्द्ध सरकारी आदि के निर्माण से लेकर संचालन तक में विचौलिये की पृष्ठिभूमि आदि आदि। हर जगह इस तरह के पैमाने में समाये भ्रष्टाचार के विभिन्न स्वरुप को आसानी से देखा जा सकता है। यह स्वरुप आज धार्मिक क्षेत्रों में देखने को भी मिल रहा है जहां भ्रष्टाचार अपने नये आयाम को धारण किये हुए है, जहां आरबों खरबों की सम्पदा का मालिक स्वयंभू लोग है। एक ठेकेदार से संत बने निर्मल बाबा की कहानी सभी के समने है जो कृपा बांट – बांट कर आज अरबों -खरबों की संपदा के स्वामी बने है। इस तरह के बाबा आज देश में अनेक है जो इस देश की भोली भाली जनता को फंसाकर अपना घर भर रहे है। इनमें से कईयों की रकम भी विदेशी बैंक में जमा होगी । आज सतसंग, समागम, प्रवचन आदि का गोरखधंधा तेजी से पनप रहा है जहां भ्रष्टाचार अपने नये आयाम में काला धन को बटोरने में तत्पर है। सड़क बनानी हो या गरीबों के लिये आवास भोजन आदि की व्यवस्था करनी हो। सेना में रक्षा के नाम खरिदारी हो या देश में हो रहे विकास के तहत कार्य , सभी जगह अर्थ कमाने की अवैध प्रवृत्ति काला धन को बटोरती है। पर इसे कौन गलत माने ?

      आज एन.जी.ओं की देश में बाढ़ सी आ गई है। जिसमें स्वास्थ्य, शिक्षा, पर्यावरण, का क्षेत्र व्यापक है। इस क्षेत्र में कई सवयंसेवी संस्थाएं काम कर रही है जो इसकी आड़ में काला धन बटोरने में लगी है। अर्थ तंत्र ने आज सभी की परिभाषाएं बदल दी है। शिक्षक, चिकित्सक, नेता सभी के सभी अपने कर्तवय को भूलकर अवैध रूप से अर्थ बटोरने में लगे हुए है। पंचायती राज्य में सरपंच से लेकर जिला प्रमुख,  विधायिका में विधायक से लेकर संसद तक पहुंचने वाला हर नेता चुनाव के दौरान लाखों करोड़ों खर्च कर डालता है। जिसके एवज में अनैतिक कार्य को बढ़ावा देकर काला धन जमा करता है। इस तरह के परिवेश से नैतिकता की बात सोचना बेइमानी होगी। काला धन एवं भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन होना चाहिए पर इस तरह के बिंदुओं पर भी मंथन होना चाहिए जिससे भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिल रहा हो।

       अनुशासन पर बहस यहां बच्चे से बूढ़े तक करते है, उपदेश सभी एक दूसरे को देते रहते है। पर अपनाये कौन इसे,  सब नहले दहले बन चले। ऐसे हालात में बाबा रामदेव एवं अन्ना हजारे का आंदोलन क्या गुल खिलायेगा यह तो समय ही बतायेगा पर काला धन बटोरने के गोरखधंधे में पूरा परिवेश समाया हुआ है जिसके चुगंल से देश को बाहर निकाल पाना मुश्किाल ही नहीं नामुमकिन है। इस तरह के परिवेश से देश को निजात दिलाने में नैतिक आचरण की आवश्यकता है। एक दूसरे पर कीचड़ उछालने के बजाय अपने आप को पहले सुधारने की कोशिश की जाय तभी इस दिशा में सुधार की गुंजाईश है। देश को आजादी तो मिली पर आज इस आजादी का क्या हस्र हो रहा है, इससे सबक लेना चाहिए। काला धन एवं भ्रष्टाचार के खिलाफ उठी आवाज जायज है पर इसके साथ एक स्वस्थ समाज स्थापना का भी संकल्प लेना चाहिए। जहां लोकतंत्र में इस तरह के नेताओं का दायरा बढ़े जो चरित्रवान हो तथा जिनके कंधों पर चुनाव खर्च का भार न हो। काला धन एवं भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाने वाले एवं आवाज का साथ देने वालों को दोहरेपन की भूमिका छोड़ अपने जीवन में नैतिक आचरण को उतारना होगा । इस तरह के परिवेश से ही आंदोलन की भूमिका साकार हो सकेगी।

-स्वतंत्र पत्रकार, डी – 9 , सेक्टर -3ए ,खेतड़ी नगर – 333504 राजस्थान

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