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Archive for the Category ‘भाषा’


जयशंकर प्रसाद की लघुकथाओं पर चर्चा

Thursday, January 30th, 2014
जयशंकर प्रसाद की लघुकथाओं पर चर्चा महाकवि के रूप में सुविख्यात जयशंकर प्रसाद  (१८८९-१९३७)  हिंदी नाट्य जगत और कथा साहित्य में एक विशिष्ट स्थान रखते हैं। तितली, कंकाल और इरावती जैसे उपन्यास और आकाशदीप, मधुआ और पुरस्कार जैसी कहानियाँ उनके गद्य लेखन की अपूर्व ऊँचाइयाँ हैं। जीवन परिचय इनका जन्म ३० जनवरी १८८९  को वाराणसी में हुआ। स्कूली शिक्षा ...

हिंदी का ज्ञान बन गया है बाजार की शान – राजेन्द्र धोड़पकर

Friday, December 20th, 2013
हिंदी मुहम्मद तुगलक के वक्त में भी भारत में मौजूद थी और औरंगजेब के वक्त भी।    साहित्य-संस्कृति को पैमाना बनाया जाए, तो यह दौर हिंदी का स्वर्ण युग था,   भक्तिकाल इसी बीच हुआ।   साथ ही इस बीच भारत में उद्योग-व्यापार में बड़ी तरक्की हुई।   भारत में व्यापार और बाजार ...

मैथिलीशरण गुप्त

Thursday, December 12th, 2013
मैथिलीशरण गुप्त   राष्ट्रकवि  मैथिलीशरण गुप्त  (जन्म ३ अगस्त १८८५ - १९६४)  खड़ी बोली के महत्त्वपूर्ण कवि हैं।  श्री पं महावीर प्रसाद द्विवेदी जी की प्रेरणा से आपने खड़ी बोली को अपनी रचनाओं का माध्यम बनाया और अपनी कविता के द्वारा खड़ी बोली को एक काव्य-भाषा के रूप में निर्मित करने में ...

अनुवाद हमें राष्ट्रीय ही नहीं अन्तर्राष्ट्रीय भी बनाता है – डा. शिबन कृष्ण रैणा

Monday, November 11th, 2013
अनुवाद हमें राष्ट्रीय ही नहीं अन्तर्राष्ट्रीय भी बनाता है - डा. शिबन कृष्ण रैणा अनुवाद-कर्म   राष्ट्रसेवा का कर्म है।   यह अनुवादक  ही है जो दो  संस्कृतियों, राज्यों, देशों एवं विचारधाराओं के बीच ‘सेतु’ का  काम करता है।   और तो और यह अनुवादक ही है  जो भौगोलिक सीमाओं को लांघकर भाषाओं के बीच सौहार्द, सौमनस्य  एवं सद्भाव को स्थापित करता है तथा हमें  एकात्माकता ...

आर्य भाषा के उन्नायक महर्षि दयानंद – डॉ. मधु संधु

Tuesday, September 24th, 2013
आर्य भाषा के उन्नायक महर्षि दयानंद - डॉ. मधु संधु   आर्य भाषा के उन्नायक महर्षि दयानंद - (1824 - 1884) हिन्दी भाषा और  साहित्य  के  विकास  में महर्षि दयानंद  सरस्वती की  कोई प्रत्यक्ष देन नहीं है,  फिर भी हिन्दी के आज के स्वरूप और स्थान की बात करें तो इसे सशक्त और समर्थ  बनाने में उनका योगदान अप्रतिम है। महर्षि ...

राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर

Sunday, September 22nd, 2013
राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर हिन्दी के प्रसिद्ध कवियों में से एक राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर का जन्म 23 सितंबर 1908 को  सिमरिया नामक स्थान पे हुआ। इनकी मृत्यु 24 अप्रैल, 1974 को चेन्नई) में हुई । जीवन परिचय : हिन्दी के सुविख्यात कवि रामाधारी सिंह दिनकर का जन्म 23 सितंबर 1908 ई. में सिमरिया, ज़िला ...

भाषा और समाज – प्रेमपाल शर्मा

Friday, September 20th, 2013
भाषा और समाज - प्रेमपाल शर्मा   दोहराने  की  जरूरत नहीं कि  भारतीय  समाज  की  स्थिति और शासन व्‍यवस्‍था में  अपनी  भाषाओं के इस्‍तेमाल का  प्रश्‍न निरंतर जटिलता की तरफ बढ़ रहा है ।   ऐसी उम्‍मीद किसी को भी नहीं थी कि 66 वर्ष के बाद भी इस मुद्दे पर ऐसी रस्‍साकसी चलती रहेगी । रस्‍साकसी ...

जन-जन की भाषा हिन्दी – देवी नागरानी

Wednesday, September 18th, 2013
जन-जन की भाषा हिन्दी - देवी नागरानी   माँ के बाद मात्रभाषा के ज़रिये हम अपनी पहचान पाते हैं।  हिन्दी आम जनता की भाषा है और हमारी संस्कृति का प्रतीक भी। भाषा और संस्कृति को जिस तरह संगठित स्वरूप में सजाया, संवारा जाएगा, प्रचार प्रसार उसी रफ़्तार से होगा, और जब इस दिशा में इज़ाफा होने लगेगा ...

हिन्दी के अंतराय – ओम विकास

Wednesday, September 18th, 2013
हिन्दी के अंतराय - ओम विकास    हिन्दी के अंतराय कालांतर   हिन्दी  का  उद्भव  लोक भाषा के रूप में हुआ ।  पराधीनता की असहाय स्थिति में भक्ति मार्ग, और स्वाधीनता की आशा में एकता के  प्रयोजन से हिन्दी का उत्तरोत्तर विकास हुआ ।  स्थानीय शब्दों की स्वीकारिता की लोक अभिव्यक्ति थी । अर्थ समानता की पारस्परिक ...

क्या हिंदी की कोई वैश्विक भूमिका है ? – अनिल जोशी

Saturday, September 14th, 2013
क्या हिंदी की कोई वैश्विक भूमिका है ? - अनिल जोशी   अंग्रेजी एक ग्लोबल भाषा है, विश्व भाषा है। इसके समानांतर पश्चिमी देशों की अपनी भाषाएं जैसे स्पेनिश, फ्रेंच आदि भी राष्ट्रीयता जैसी भावनाओं से अपने बोलने वालों को प्रेरित कर अपने अस्तित्व का संघर्ष कर रही हैं।  ऐसे में पूर्वी देशों की भाषाओं का भावी परिदृश्य कैसा होगा ,यह ...
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