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दिव्या माथुर की कहानी : अंतिम तीन दिन अमेरिकी कोर्ट ने सोनिया गांधी से पासपोर्ट दिखाने को कहा अमेरिकी न्यायाधीश ने 1984 के दंगों पर आदेश सुरक्षित रखा यमन में डूबा जहाज, 12 भारतीय नाविक हुए लापता पंजाबी गायक शिंदा को लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड

Archive for the Category ‘कविता’


डॉ. जे़बा रशीद की कविताएँ

Friday, October 2nd, 2015
डॉ. जे़बा रशीद की कविताएँ जवाब मैंने खत भेजा तो  जवाब में सूखा गुलाब आया है हमने आंखों में सजा लिए आंसूं खूब जवाब आया है सकूने दिल की दवा मांगी तो दर्द बेहिसाब आया है। ख्वाहिशें मुस्करा कर कहती है खाली ख्वाब आया है। ***** 2 चाहते जे़बा रषीद चाहतों ने मेरी जिसको तराशा वो पारस हो यह जरूरी तो नहीं! ख्वाब मेरे हैं मगर ध्यान तेरा है मेरी आंखों में तेरी तस्वीर ना हो यह जरूरी तो नहीं! चाहत ...

आध्यात्मिक कविताएं- मृदुल कीर्ति

Friday, October 2nd, 2015
आध्यात्मिक कविताएं- मृदुल कीर्ति (अाध्यात्मिक जीवन के सत्यों , विचार बिदुओं को काव्य संवेदना में पिरो कर विचारों की ऋंखला बनाते हुए कविताओं की रचना डा मृदुल कीर्ति की एक प्रमुख विशेषता है। उनकी मुक्त छंद की कविताएं भी श्लोक या मंत्र की तरह हैं जो किसी न किसी आध्यात्मि्क सत्य का आविष्कार करती ...

23 मार्च : शहीद दिवस के अवसर पर-रंग दे बसंती चोला-दिव्या माथुर

Sunday, March 23rd, 2014
23 मार्च : शहीद दिवस के अवसर पर-रंग दे बसंती चोला-दिव्या माथुर (भगत सिंह और उसकी माँ के बीच वार्तालाप) ‘मेरा रंग दे बसंती चोला,’ माँ से भगत सिंह बोला तड़प के उसकी माँ बोली लाल मेरे तू अभी न जा ‘टोलकी वज रही वेड़े विच ते नचदे आंडे ग्वांडे ने कुड़ी हल्दी लाके राह तके व्याह ते तू हो जाने दे,’ ‘जलियाँ वाला बाग का बदला खून से गोरों के लूँगा तू ...

अबकी ऐसे फाग मनाएं – अलका सिन्हा

Monday, March 17th, 2014
अबकी ऐसे फाग मनाएं - अलका सिन्हा अबकी ऐसे फाग मनाएं, दीवारों पर रंग लगाएं।  रंग भरी भीगी दीवारें, महक उठें सोंधी दीवारें, नरम पड़ी गीले रंगों से, जहां-तहां टूटें दीवारें, मृदुल-प्रेम के भाव जगाएं। बरसे अबकी इतना रंग, बह जाएं गलियारे तंग, दीवारों से राह बने, आने का हो आमंत्रण, मिलकर सब जोगीरा गाएं। दीवारें घर के भीतर की, दीवारें मंदिर-मस्जिद की, ऊंची-नीची सब ...

माँ ने कहा था – देवी नागरानी

Sunday, March 9th, 2014
माँ ने कहा था मैं गाड़ी के नीचे आते आते बच गई थी ! तब मैं छोटी थी.... और माँ ने ये भी कहा था आने वाले कल में ऐसे कई हादसों से मैं खुद को बचा लूँगी जब मैं बड़ी हो जाऊँगी..... पर कहाँ बचा पाई मैं खुद को उस हादसे से? दानवता के उस षड्यंत्र से? जिसने छल से मेरे तन को, मेरे ...

कविता – गुब्बारे में कैद सपने -अशोक आंद्रे

Thursday, January 30th, 2014
कविता - गुब्बारे में कैद सपने -अशोक आंद्रे कोने में बैठी उस लड़की को हमेशा खामोशी के गुब्बारे फुलाते हुए देखा है उस गुब्बारे में उसके सपने क्यों कैद रहते हैं यह हर प्राणी की समझ से परे सिवाय खामोशी के खामोश रहते हैं. लोग गुब्बारे में कैद उसके सपनो में एक बिंदिया चिपका कर उसे हंसाने की असफल चेष्टा करते हैं लड़की फिर भी खामोश रहती है. कैदी सपने उसकी आँखों ...

रोते कितने लोग यहाँ – श्यामल सुमन

Monday, January 27th, 2014
रोते कितने लोग यहाँ - श्यामल सुमन इस माटी का कण कण पावन। नदियाँ पर्वत लगे सुहावन। मिहनत भी करते हैं प्रायः सब करते हैं योग यहाँ। नीति गलत दिल्ली की होती रोते कितने लोग यहाँ।। ये पंजाबी वो बंगाली। मैं बिहार से तू मद्रासी। जात-पात में बँटे हैं ऐसे, कहाँ खो गया भारतवासी। हरित धरा और खनिज सम्पदा का अनुपम संयोग यहाँ। नीति गलत दिल्ली ...

माँ वाणी से एक प्रार्थना – पद्मा मिश्र

Sunday, January 19th, 2014
माँ वाणी से एक प्रार्थना  - पद्मा मिश्र माँ वाणी से एक प्रार्थना तुम पारस मैं अयस अपावन, तुम छू लो कंचन हो जाऊं. अक्षर अक्षर बांध लिया है , स्नेह सुमन मुक्ताहरों से, अब मन का आकाश खुला है, तुम आओ पावन हो जाऊं. अंतर अंतर भींग रहा है, नेह-वारि  के भावकणों  से, माँ नयनों में आंसू बन कर , बरसों तुम मधुमय हो जाऊं. जग सोता है ...

कविता मौन – बीनू भटनागर

Thursday, January 16th, 2014
कविता मौन - बीनू भटनागर        मौन       अधरों की हंसी हो या         आँखो  से आंसू हों,   आँखो से आँखो की बात होती है,                  क्योकि,    मौन की भी एक निराली भाषा होती है!        जब कोई तस्वीर सामने होती है,       बिना मिले ही उनसे बात होती है, कभी मु्स्कान या नमी आंखो मे होती  है, बिन कहे ...

सब्र और संकल्प – अवधेश सिंह

Wednesday, January 8th, 2014
 सब्र और संकल्प – अवधेश सिंह   दिलों में अब अलाव जले जो रिश्ते ठन्डे हैं उन्हें गर्माहट मिले 2.  तुम्हारा साथ नहीं अकेले चलना हमने सीख लिया है  हाथों में तुम्हारा हाथ नहीं 3. लगाव में युवा बेशक दिलों के तार जोड़ें सार्वजनिक स्थानों में शालीनता की पर हद न तोड़ें 4. कोई न भूले बुनियादी सवाल माँ बहन सा ही रक्खें पराई नारी का ख्याल 5. आल इज वेल / या  सकून का नशा सिर चढ़ कर बोले इसके ...
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