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दिल्ली में स्पाइल (दर्पण) की रजत जयन्ती



चित्र में बाएं से प्रो हरमहिंदर सिंह बेदी, सर्वमित्रा सुरजन, प्रो एस शेषारत्नम, प्रो अशोक चक्रधर, सुरेशचन्द्र शुक्ल ‘शरद आलोक’,  डॉ गिरिराजशरण अग्रवाल, डॉ विद्याविन्दु सिंह और प्रो उबैदुर रहमान हाशमी 
स्पाइल की रजत जयन्ती 5  जनवरी 2014 को हिंदी भवन नयी दिल्ली में धूमधाम के साथ संम्पन्न हुयी।
कार्यक्रम का शुभारम्भ स्पाइल (दर्पण) के अमेरिका और दिल्ली के प्रतिनिधि डॉ सत्येन्द्र कुमार सेठी के परिचयात्मक सम्बोधन से हुआ जो कार्यक्रम का संचालन भी कर रहे थे.
सबसे पहले सभी उपस्थित विद्वानों का स्वागत पुस्पगुछ और माल्यार्पण से हुआ जिनमें  मुख्य अतिथि डॉ अशोक चक्रधर, प्रो हरमहेन्द्र सिंह बेदी, प्रो उबैदुर रहमान हाशमी, डॉ गिरिराज शरण अग्रवाल, साहित्यिक-वैचारिक पत्रिका अक्षर पर्व की सम्पादिका सर्वमित्रा सुरजन, राष्ट्रीय दैनिक देशबंधु के समूह संपादक, राजीव रंजन श्रीवास्तव, राष्ट्र किंकर के सम्पादक और लघु पत्रों के संघ के महामंत्री विनोद बब्बर, देशबंधु के राजनैतिक सम्पादक शेष नारायण सिंह, अमर उजाला के उप वरिष्ठ सम्पादक हरी प्रकाश शुक्ल,  अंजुरी के सम्पादक बी के शर्मा,  यथासम्भव के सम्पादक जीतेन्द्र कुमार सिंह, साहित्य संस्थान के निदेशक फ़तेह चन्द, हस्तक्षेप के सम्पादक अमलेन्दु उपाध्याय, विशाखापत्तनम विश्व विद्यालय की प्रो एस शेषरत्नम, उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान की पूर्व उपाध्यक्ष और वरिष्ठ साहित्यकार विद्या विन्दु सिंह,  उमेश चतुर्वेदी वरिष्ठ  पत्रकार एवं लेखक,  जे एन यू विश्व विद्यालय के रशियन भाषा के प्रो हेमंत पाण्डेय,  डॉ सुरेन्द्र कुमार सेठी,  डॉ हरनेक सिंह गिल,  जयप्रकाश शुक्ल, सत्येन्द्र कुमार और सुरेन्द्र कुमार सेठी मुख्य थे.
स्पाइल (दर्पण) के  सम्पादक सुरेशचन्द्र शुक्ल ‘शरद आलोक’ ने
अपनी इन पंक्तियों से बात शुरू की
” मन के सब गुबार निकालो, जीवन का सुख सार निकालो।
तुम समाज का दर्पण बनकर, आओ एक अखबार निकालो।।
अभिव्यक्ति बिना सब निस्वर है, आजादी जब तक सस्वर है।
जन-जन जीवित मन नश्वर है, जब तक अपना न कोई स्वर है।।
चाहे जितनी गाथा गा लो, जनता में विशवास जमा लो ।

जैसे तरकश से बाण निकालो,  ऐसे तुम अखबार निकालो।।
नार्वे में हिंदी पत्रकारिता पर प्रकाश डालते हुए उन परेशानियों की तरफ इशारा किया जब उनके पास उचित मेज और टाइप राइटर के अभाव में तथा हिंदी के लिए उचित वातावरण न होने के बावजूद कैसे पहले नार्वे की पहली पत्रिका ‘परिचय’ में 1980 से 1985 तक  सम्पादन किया फिर सन 1988 से स्पाइल (दर्पण) की शुरुआत की. और इन  25 वर्षों में रजत जयन्ती तक पहुँचने तक क्या-क्या पापड़ बेलने पड़े और अब आगामी 25 वर्षों में पत्रिका कैसे चलाई जाये इस पर विचार विमर्श शुरू कर दिया है.
सभी विद्वानों ने अपने अनुभवों को साझा करते हुए विदेशों में हिंदी पत्रकारिता को विस्तार देने के लिए पत्रिका और सम्पादक को बधाई दी. शरद आलोक ने इसके लिए सभी पाठकों, विदेशों में हिंदी के शिक्षकों, अविभावकों को जो अपने बच्चों को हिंदी पढते हैं को धन्यवाद देते हुए ओस्लो स्थित भारतीय दूतावास और नार्वेजीय सरकार और सांस्कृतिक मंत्रालय को धन्यवाद दिया जो पत्रिका और सम्पादक को समय-समय पर सहयोग देते हैं. उन्होंने आगे कहा कि विदेशों में हिंदी का भविष्य उज्जवल है क्योंकि यहाँ स्थानीय हिंदी पत्रिका के पाठक बढ़ रहे हैं और विदेशों में बसे लोगों के लिए हिंदी रोजगार की भाषा बन रही है. इसके लिए उन्होंने विदेशों में भारतीय मोल के राजनीति में सक्रिय लोगों की भूमिका की तारीफ करते हुए कहा कि हमको अधिक से अधिक राजनीति में हिस्सा लेना चाहिए ताकि हम अपनी भाषा और संस्कृति को स्वीकृति दिला सकें और अपनी भी पहचान कायम रखें।
इस अवसर पर विद्वानों को प्रतीक चिन्ह दिए गए और पत्रिका का लोकार्पण किया गया.
कार्यक्रम का समापन विनोद बब्बर जी ने बड़ी ख़ूबसूरती से किया।
अन्य शुभकामनाओं देने वालों में लोक सभा टी वी के वरिष्ठ पत्रकार ज्ञानेन्द्र पाण्डेय, आकाशवाणी राष्ट्रीय प्रसारण के डायरेक्टर और संगीतकार-गायक  राधेश्याम, डॉ श्याम सिंह शशि, डॉ हरी सिंह पाल,  गोविन्द व्यास ने हिंदी भवन के बाहर ही शुभकामनाएं दीं.

समीक्षा 
स्पाइल (दर्पण) का  रजत जयन्ती अंक 

समीक्षक:  सुरेशचन्द्र शुक्ल ‘शरद आलोक’

विदेशों में हिन्दी की पत्रकारिता में चार चाँद लगाने वाली पत्रिकाओं में ‘स्पाइल’ (दर्पण) महत्वपूर्ण है.
नार्वे एक छोटा किन्तु सुन्दर और राजनैतिक दृष्टि से उत्तरीय यूरोप का महत्वपूर्ण देश है. इसे विक्रम सिंह ने अपनी पुस्तक में ‘विश्व शांति का चैम्पियन कहा है. चूँकि दो महीने जून और जुलाई में उत्तरी नार्वे के उन भागों में जहाँ से ध्रुवीय रेखा गुजरती है वहाँ आधी रात को भी सूरज निकला रहता है. इसी लिए नार्वे को मध्यरात्रि का सूरज वाला देश भी कहा जाता है. सबसे खास बात यह कि हिन्दी की पत्रिका ‘स्पाइल’ दर्पण ने अपने 25 वर्ष पूरे किये।
इस अंक में बताया गया है कि यह पत्रिका किन-किन अभावों का सामना करते हुए आगे बढ़ी है.
स्पाइल (दर्पण) का पहला अंक 
सन 1988 में जब इसका पहला अंक निकला था तब वह हिंदी और पंजाबी (गुरुमुखी) दोनों भाषाओँ में था. अतः सम्पादक के नाते मुझे पंजाबी लिखनी और पढ़नी सीखनी पड़ी थी. कोई टाइपराइटर नहीं था. हाथ से लिखी थी पूरी पत्रिका।  सन 1985 में तीन महीने (जून से अगस्त महीने तक) में ‘साप्ताहिक हिंदुस्तान’  में हिंदी पत्रकारिता सीखने की गरज से तत्कालीन सम्पादक राजेंद्र अवस्थी और ब्रजनारायण अग्रवाल के साथ बिताये। उससे उस समय के हिंदी पत्रकारिता के तेवर सीखने को मिल चुके थे. और स्वयं मैं नार्वे में पत्रकारिता की शिक्षा प्राप्त करने वाला पहला भारतीय के रूप में प्रतिष्ठित हो चुका था. इन दोनों ने मेरी पत्रकारिता की समझ को विस्तृत और पैना किया।
अतः पहला अंक भी अति साधारण होने के बावजूद विज्ञापनों से भरपूर था. ओस्लो में भारतीय राजदूत, नार्वेजीय लेखकों और प्रवासी भारतीयों के सहयोग ने पत्रिका को निरंतर छापने के लिए प्रोत्साहित किया।
पत्रिका भारत और नार्वे के मध्य सेतु बनी 
स्पाइल (दर्पण) धीरे-धीरे  भारत और नार्वे के मध्य एक सेतु के रूप में प्रतिष्ठित हो गया. भारत और नार्वे के लेखकों के अतिरिक्त दूतावासों और यहाँ की स्थानीय सरकार ने मान्यता दी, आर्थिक सहयोग देना शुरू किया और साथ-साथ नियंत्रण भी करती रही कि पत्रिका स्तरीय है. इसके लिए नार्वे के सांस्कृतिक मंत्रालय के सलाहकारों के साथ बैठकें होती रहीं और पत्रिका को नार्वे में एक एक स्तरीय सांस्कृतिक पत्रिका के रूप में भी प्रतिष्ठा मिली।  भारत और नार्वे दोनों देशों के राजनेताओं के अलावा दूतावासों ने प्रकाशनार्थ सामग्री आदि भी भेजना शुरू किया और अपनी प्रतिक्रया भी जिससे पत्रिका को सेतु बनने में देरी न लगी. पर यह कार्य अति कठिन और चुनौतियों से भरा है और एक बड़ा मिशन भी जिसमें प्रथम 25 वर्षों में पत्रिका सफल रही और पहला रजत जयन्ती अंक निकला।
देश विदेश के रचनाकार सम्मिलित 
स्पाइल (दर्पण) पत्रिका में आरम्भ से ही स्कैंडिनेवियाई (नार्वे, स्वीडेन, डेनमार्क और फिनलैंड) के लोगों को प्राथमिकता दी जाती थी पर धीरे-धीरे यह पत्रिका पूरे विश्व में बसे हिंदी सेवियों और लेखकों का महत्वपूर्ण मंच बन गयी जिसे नार्वे और भारत की सरकारें  और संस्थान भी पूरी तरह मान्यता देते हैं. नए और उभरते रचनाकारों की प्रथम रचनाएं छापने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाली पत्रिका स्पाइल  विदेशों में हिंदी पत्रकारिता में मील का पत्थर साबित हुई है. इसके अलावा इसने आगामी 25 वर्षों के लिए परिचर्चा और गोष्ठियां करना आरम्भ किया है.
इस सम्बन्ध में इस अंक में व्यापक सूचनाएं प्रकाशित हुई हैं.
भारतीय सूचनाओं और सांस्कृतिक समाचारों से परिपूर्ण 
पत्रिका का यह अंक भारत की साहित्यिक गतिविधियों, लेखकों के जन्मदिन और पुण्य तिथियों पर सूचना और समाचार के अलावा, चलचित्र, भारतीय खेल और विज्ञान की उपलब्धियों पर सामग्री छपी हुई है. भारतीय समाचारों को नार्वेजीय समाचारपत्रों में उचित स्थान नहीं मिलता इस तरह यह पत्रिका भारतीय समाचार पढ़ने वालों के लिए और भी महत्वपूर्ण हो जाती है.
पत्रिका यूरोपीय देशों के सांस्कृतिक समाचार सम्मिलित करेगी 
पत्रका के इस अंक से पता चलता है कि स्पाइल पत्रिका ने नेट पर और संगोष्ठियों के जरिये विचार विमर्श शुरू किया है कि आने वाले 25 वर्षों में किस तरह छपती रहेगी और दीर्घायु बनेगी पर इस बात का भी ध्यान रखा गया है कि पत्रिका अपने सेतु बनने वाले उद्देश्यों से विलग न हो और हिंदी के प्रचार-प्रसार में लगी रहे और अपने ऊपर बाजार को न हावी न होने दे.
यह अंक एक महवपूर्ण अंक है. पाठ्य सरल भाषा समयानुकूल है और स्थानीय शब्दों का अधिक प्रयोग हुआ है. एक ख़ास बात स्पाइल में यह है कि यह अभी भी हिंदी पृष्टों पर हिंदी के अंकों का प्रयोग करती है जिसे अनेक बड़े हिंदी लेखकों ने स्तुत्य कहा है.

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speil.nett@gmail.com

सुरेशचन्द्र शुक्ल ‘शरद आलोक’

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