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धूप के खरगोश (हाइकु संग्रह ): कवयित्री –डॉ० भावना कुँअर


 गर्मियों की छुट्टियों के लंबे तपते हुए दिन ।  गर्म हवाओं से बचने के लिए दस बजते ही सभी खिड़कियाँ -दरवाजे बंद करके परदे तान दिए ताकि धूप का कोई टुकड़ा अंदर ना आ सके ।  तभी दरवाजे की घंटी बजी, डाक से भूरे रंग का लिफाफा आया है । गरमी की दुपहरी में हिम की शीतलता का सुखद एहसास हुआ ।  लिफाफा खोलते ही निकल आए  भावना कुँअरजी के धूप के खरगोश ।  नीले सुनहरे आवरण में सजे–धजे  धूप के खरगोश।  दिनभर ये खरगोश मुझे हाइकु के उपवन में सैर कराते रहे ।  मैं मिली- मनचले भौंरे से, रंग की मटकी उडेलती रंग-बिरंगी तितलियों से, कहीं दूर गगन में सुबकी लेकर माँ को पुकारते नन्हे बादलों से तो कभी संन्यासी की तरह साधनारत विशाल पर्वतों से तो बर्फ की लोई तानकर सोई हुई घाटी से ।  चिलचिलाती धूप में छाँह का सा अहसास दिला गए, जाने कहाँ-कहाँ की सैर करा गए ये नन्हे धूप के खरगोश।  पता ही नहीं चला कब दिन बीत गया और साँझ निर्झर हो गयी । इससे पूर्व भावना जी का प्रथम हाइकु संग्रह ‘तारों की चूनर’ ( 2007) विश्व भर के पाठकों को इनकी सर्जनशीलता का अहसास करा चुका है । यहां यह उल्लेखनीय है कि  भारत  से बाहर रहने वालों में डॉ भावना कुँअर  अकेली हाइकुकार हैं जिनके दो संग्रह प्रकाशित हुए हैं ।

  केवल १७ वर्णों की छन्दोबद्ध कविता हाइकु, मर्मस्थल को छू लेती है जब उसमें शब्द की शक्ति समाहित हो जाती है , अभिव्यक्ति का  अनूठापन जब थोड़े में बहुत कुछ कह जाता है ।  प्रकृति से मुझे भी बहुत प्यार है और भावना जी के प्रकृति – चित्रण से सजे हाइकु अद्भुत दृश्य बिम्ब उपस्थित कर चमत्कृत कर देते हैं।   प्रकृति का कोई भी उपादान हाइकुकार की नजरों से गुजरा है तो अद्भुत नज़रिया लेकर उपस्थित हुआ है ।  भावना जी के हाइकु मन की गहराई से निकले मोती हैं, घास पर चमकते । ओस की बूँदों में मोती तो सबने देखे हैं पर भावना जी ने  घास की पीड़ा को उकेरा है।  दबी-कुचली घास जो उदास है,  रात भर रोई है।

भीगी थी घास/ रोई ज्यों चुपके से/  कल की रात ।

ओस की बूँद / सहलाए बदन / नर्म घास का ।

वहीं कवयित्री की सौंदर्यानुभूति पाठक को एक अलग ही दुनिया में ले जाती है, जहाँ हरी घास पर किसी चंचल युवती की पायल टूट गयी है, पायल के घुँघरू घास पर बिखर गए हैं।  अनूठी कल्पना दर्शनीय है ।

टूटी पायल/  बिखरे हैं घुँघरू/  हरी घास पर ।

 पर्यावरण के प्रति कवयित्री का गहरा सामाजिक सरोकार उनकी संवेदनशीलता को बयाँ कर रहा है –

सूखती नदी/ बेघर होते पंछी / आज की सदी ।

अकेला बीज/ धरती से मिलके / फूटा खिलके ।

निर्मम हाथ / काटने चल पड़े / आरी ले साथ।

सहता रहा / ‘मत काटो मुझे’ / कहता रहा ।

हरा वो पेड़/ पल भर में बना/ घास का ढेर ।

दूर जा गिरा / पंछियों का घरौंदा / छितरा पड़ा ।

बनाए कैसे / हवाओं पे बसेरा / नन्हीं चिड़िया ।

छाया उदास/ भटके यहाँ वहाँ / पेड ना साथ।

मुँह फुलाए/ घूमता घर-घर / दुखी बादल ।

बीज का धरती से मिलकर पेड़ बनना, स्वार्थी मानवों द्वारा हरे-भरे पेड़ों को निर्ममता से काट डालना, पंछियों का बिखरा हुआ घोंसला, छाया की तलाश में  पथिक का दर- दर भटकना और बादलों का मुँह फुलाकर गुस्सा जताना, पल-पल जैसे किसी चलचित्र की तरह मानस-पटल पर अंकित हो जाता है।  यह   कटु सत्य है कि जंगल कटते जा रहे हैं, पेड-पौधों की जगह कंकरीट के जंगल उग रहे हैं।  बेचारी नन्हीं चिड़िया अब अपना बसेरा बनाए तो कहाँ बनाए यह प्रश्न मन को उद्वेलित कर देता है।

 चाँद बनाके / चाहत को था टाँका / आसमाँ पे ।

चाँद की चाहत सबको होती है । किसी को चाँद में अपने प्रिय का सुन्दर चेहरा नजर आता है तो कोई चाँद में  रोटी को देखकर यथार्थ का चित्रण कर देता है लेकिन यहाँ हाइकुकार ने तो अपनी चाहत को चाँद बनाकर आसमाँ में टाँक दिया है।   अपने नेह की शीतल किरणों से सबको तृप्ति देने का भाव भावनाजी के चाहत के  चाँद में ही हो सकती है ।

दौड लगाएँ  / धूप के खरगोश / हाथ न आएँ  

 धूप के ये नन्हे खरगोश छलांग लगाते हुए कभी प्रकृति के नाजुक कोमल प्रांगण   के बीच पहुँचकर  भावविभोर कर जाते हैं तो कभी मन की अतल गहराइयों में गोता लगाकर चमकते भाव- मोती से जगमग कर जाते हैं ।  यूँ लगता है कि हाइकुकार ने सुन्दर रंगमंच सजा दिया है जहाँ  प्रकृति का हर उपादान क्षिप्र गति से सुन्दर गीत-संगीत सुनाता हुआ नृत्य कर रहा है ।  पल-पल दृश्य बदल रहा है, बदलते दृश्यों के साथ मन-मयूर कभी कल्पना के पंख फैला नाचने लगता है तो कभी गहरी  संवेदना में डूब- डूब जाता है ।  धूप के ये नन्हे खरगोश बहुत कुछ कहकर अनकहा भी छोड़ जाते हैं और रच जाते हैं नवीन सृजन की विस्तृत भावभूमि।

सौन्दर्यानुभूति के चित्रण में नैनों का साम्य बनजारे से करना चन्द शब्दों में सारी व्याकुलता का चित्रण कर जाता है । हाइकु के लघु छन्द के माध्यम से इस तरह की कलात्मक ऊंचाई छूना  कठिन है-

बनजारे-से /मतवाले ये नैन /छीनते चैन।

यादों की गहनता को लेकर नवीन उद्भावना  के साथ इनके  ये देखिए –

यादों की जब /चुनरी लहराई/फूटी रुलाई।

यूँ खोलो मत/भूली-बिसरी हुई/यादों के ख़त।

   इस भाव सौन्दर्य से पाठक अभिभूत हो जाता है । अत:  मेरी हार्दिक शुभकामनाएँ है कि भावनाजी की समृद्ध लेखनी हाइकु–जगत को श्रेष्ठ रचनाएँ देकर सुधी पाठकों को शब्द रूपी ब्रह्म की शक्ति से अवगत कराती रहेगी ।

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कमला निखुर्पा

हिन्दी प्रवक्ता ,

केन्द्रीय विद्यालय,

वन अनुसंधान संस्थान देहरादून ।

ई-मेल -kamlanikhurpa@gmail.com

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