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डॉ अनिता कपूर की कविताएँ


 

सीधी बात

आज मन में आया है

न बनाऊँ तुम्हें माध्यम

करूँ मैं सीधी बात तुमसे

उस साहचर्य की करूँ बात

रहा है मेरा तुम्हारा

सृष्टि के प्रस्फुटन के

प्रथम क्षण से

उस अंधकार की

उस गहरे जल की

उस एकाकीपन की

जहाँ  तुम्हारी साँसों की

ध्वनि को सुना है मैंने

तुमसे सीधी बात करने के लिए

मुझे कभी लय तो कभी स्वर बन

तुमको शब्दों से सहलाना पड़ा

तुमसे सीधी बात करने के लिए

वृन्दावन की गलियों में भी घूमना पड़ा

यौवन की हरियाली को छू

आज रेगिस्तान में हूँ

तुमसे सीधी बात करने के लिए

जड़ जगत, जंगम संसार

सारे रंग देखे है मैंने

ए कविता ………

तुम रही सदैव मेरे साथ

जैसे विशाल आकाश,

जैसे स्नेहिल धरा,

जैसे अथाह सागर,

तुमको महसूस किया मैंने नसों में, रगों में

जैसे तुम हो गयी, मेरा ही प्रतिरूप

शब्दों के मांस वाली जुड़वा बहनें

स्वांत: सुखाय जैसा तुम्हारा सम्पूर्ण प्यार…

इसील्ये

आज मन में अचानक उभर आया यह भाव-

कि बनाऊँ न तुम्हें माध्यम

अब करूँ मैं सीधी बात तुमसे

-0-

उम्र को कैद करना चाहती हूँ

 

घरौंदा कैसे बनता है

यह तो मुझे बचपन से ही मालूम था

पर रूप अलग था

बचपन में घरौंदा रेत से बनाया

अगर टूटा, बिखरा

फिर समेटा, फिर बनाया

कोई दुख न था…..

जवानी में घरौंदा प्रेम का बनाया

परिवार और बच्चों से बसाया

घरौंदे का रूप बढ़ाया

यह भी रूठा, यह भी बिखरा

पर संस्कार की कड़ियों से

फिर-फिर जोड़ा

कोई मलाल न था……

अब एक घरौंदा बुढ़ापे का भी होगा

सहमी हूँ, सोच में हूँ

न्यूक्लियर परिवारों का चलन

पता नहीं घरौंदे का रूप क्या होगा?

इसीलिए

कुछ स्वार्थी हूँ

मैं ,

उम्र को कैद कर लेना चाहती हूँ…..

-0-

साँसों के हस्ताक्षर

हर एक पल पर अंकित कर दें

साँसों के हस्ताक्षर

परिवर्तन कहीं हमारे चिह्नों   पर

स्याही न फेर दे

साथ ही

जिंदगी के दस्तावेजों पर

अमिट लिपि में अंकित कर दे

अपने अंधेरे लम्हों के स्याह हस्ताक्षर

कल को कहीं हमारी आगामी पीढ़ी

भुला न दे हमारी चिन्मयता

चेतना लिपियाँ

प्रतिलिपियाँ….

भौतिक आकार मूर्तियां मिट जाने पर भी

जीवित रहे हमारे हस्ताक्षर

खोजने के लिए

जीवित रहें हमारे हस्ताक्षर

कहीं हमारा इतिहास

हम तक ही सीमित न रह जाये

इसीलिये आओ

प्रकृति के कण-कण में

सम्पूर्ण सृष्टि में

चैतन्य राग भर दें

अपनी छवि अंकित कर दें

दुनिया की भीड़ में खुद को

शामिल न करें।

भविष्य की याद हमें स्वार्थी बना कर

आज ही पाना चाहती है

अपना अधिकार

न हम गलत है, न हमारे सिद्धांत

फिर भी

स्वार्थी कहला कर नहीं लेना चाहते

अपना अधिकार

आओ

अंकित कर दें

हर पल पर

अपनी साँसों के हस्ताक्षर

-0-

अलाव

तुमसे अलग होकर

घर लौटने तक

मन के अलाव पर

आज फिर एक नयी कविता पकी है

अकेलेपन की आँच से

समझ नहीं पाती

तुमसे तुम्हारे लिए मिलूँ

या एक और

नयी कविता के लिए ?

-0-

अधूरी नज़्म

 

मिले थे हम बरसों बाद

तुमने कुछ सुनाया था…

मैंने भी उसमे कुछ जोड़ा था

तुम्हारी अधूरी नज़्म को

रूहानी शब्दों से थोड़ा सा मोड़ा था

मैंने जब कहा, कि देखो

अधूरी नज़्म को आगे बढा दिया

तुमने कहा, नहीं

ज़िंदगी को आगे बढ़ा दिया..

-0-


हर रोज़ यह चाँद

रात की चोकीदारी में

सितारों की फ़सल बोता है

पर चाँद को सिर्फ बोंजाई पसंद है

तभी तो वो सितारों को

कभी बड़ा ही नहीं होने देता है ।

-0-

पिघला चाँद

चाँद रात भर पिघलता रहा

पिघला चाँद टपकता रहा

मैं हथेलियाँ फैलाये बैठी रही

कोई बूँद बन तुम शायद गिरो

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