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शिक्षा-शिक्षण और उपार्जन – इला कुमार


  शिक्षा से सम्बन्धित एक तथ्य पुरातनकालीन संदर्भ में उपनिषद कथाओं के बीच से उभरता है – जब उद्दालक मुनिपुत्र श्वेतकेतु शिक्षा प्राप्त करने के पश्चात् आत्मज्ञानी राजा प्रवाहण की सभा में जाता है तो प्रवाहण उससे आत्मविषयक पाँच प्रश्न पूछते हैं- ‘‘जीव-गण इस लोक में कहां से आते हैं?‘‘, ‘‘मरने पर प्रजा (जीव) कहां जाती है?‘‘ वगैरह, वगैरह..

श्वेतकेतु इन प्रश्नों में से एक का भी जबाव नहीं दे पाता और त्रस्त होकर पिता के पास लौटने पर उनसे शिकायत भरे स्वर में गुहार लगाता है कि बिना पूर्ण शिक्षा दिए हुए उसे क्यों ज्ञानियों से भरे हुए राजसभा में भेज दिया गया।

कहानी आगे बढ़ती है और अन्त में मूल विषय (आत्मज्ञान) को प्रवाहण द्वारा प्रतिपादित किया जाता है। यहां हम शिक्षा से सम्बन्धित तथ्यों पर नजर डालते हैं तो यह साफ-साफ समझ में आ जाता है कि उस बीत चुके पुरातन कालखण्ड में ‘शिक्षित‘ होने का मतलब आत्मज्ञान को पाना था, सर्वोच्च शिक्षा ब्रह्म से सम्बन्धित हुआ करती थी और बिना आत्म को, ब्रह्म को जाने हुए पंडितगणों को शिक्षित नहीं माना जाता था।

यानि ‘शिक्षित‘ होने की उपाधि उसे ही बख्शी जाती थी, जो ब्रह्म विषयक तत्व का जानकार हो। खैर, यह तो हुई पुरातनकाल की बात (जिसे पश्चिमी विद्वान बड़े छल-बल पूर्वक ‘मिथक‘ घोषित करते हैं)।

अब हम यदि आज के समय खण्ड की ‘शिक्षा‘ के बात पर विचार करें, शिक्षण से सम्बन्धित विभिन्न तथ्यों पर ध्यान केन्द्रित करें तो पठन-पाठन से सम्बन्धित कुछ महत्वपूर्ण बिन्दु हमें चैंका देते हैं – सबसे पहले कालेजी पढ़ाई की बात, कालेजी पढ़ाई बीच संदर्भ आता है ‘एडुकेटेड‘ और ‘लिटरेट‘ का। हमारे देश में लिटरेट लोग तो बहुतायत से पाए जाते हैं लेकिन जिन्हें सही ढंग से ‘एडुकेटेड‘ कहा जा सके, वे लोग बहुत ही कम दिख पड़ते हैं।

‘एडुकेटेड‘ (शिक्षित) होने का मतलब बहुआयामी है यानि कि व्यक्ति सभ्य, सुसंस्कृत, सदाचारी होने के साथ-साथ व्यावहारिक, उपार्जनवान् एवं जिम्मेवार भी हो। लेकिन यदि भारतवर्ष में रहने वाले खूब बड़े डिग्रीधारक क्राउड की बात करें तो यह सच बुरे ढंग से उभरकर आता है कि वास्तविक और स्तरीय ढंग से ‘एडुकेटेड‘ लोग नहीं के बराबर हैं, लोगों ने केवल डिग्री प्राप्त करके एक अपूर्ण किस्म की शिक्षा प्राप्त की है। साथ ही हम पाते हैं कि निम्न, मध्यमवर्ग एवं निम्न वर्ग के लोगों के बीच हुनरगर तकनीक वाली शिक्षा का पूर्णतः अभाव है, जो उनके लिए आवश्यक जरूरत की तरह है।

हमारे देश में शिक्षा से जुड़े महत्वपूर्ण तत्वों पर न तो सरकार का पूरा ध्यान है, न ही एन.जी.ओ. आदि या मंदिर वगैरह से जुड़ी समाजसेवी संस्थाओं का।

1964-66 के युग्म वर्ष को बीते पैंतीस वर्ष से ऊपर हो गए, लेकिन अभी तक हमने कोठारी कमीशन की शिक्षा-शिक्षण से जुड़े उस सलाह को नहीं माना है जिसमें स्कूली शिक्षा के बीच ‘टर्निंग प्वाइंट‘ की बात की गयी थी। टर्निंग प्वाइंट यानि कि एक किस्म का मोड़, जिसे आठवीं एवं दसवीं कक्षा के बाद भारतीय शिक्षण पद्धति में स्थापित किया जाना था, ताकि आठवीं-दसवीं तक लिखा पढ़ी सीख लेने के बाद जो बच्चे आगे नहीं पढ़ना चाहें, वे आगे स्कूल नहीं आने पर भी हानि में नहीं रहें। स्कूल छोड़ने के पहले उन्हें इस प्रकार शिक्षित किया जाय कि वे पढ़ाई के दौरान सीखे गए हुनरों के बल पर उपार्जन करके अपने पैरों पर खड़े हो सकें। स्कूलों में टेबल-कुर्सी बनाना, लैम्प और लैम्पशेड बनाना, टोकरी बनाना, पॉलिश करना, टाइपिंग वगैरह उन्हें सिखाया जाय।

कोठारी कमीशन के द्वारा दिये गये इस सुझाव के पीछे यह सोच थी कि स्कूली शिक्षा के दौरान सीखे गए हुनरों के बल पर बच्चे खुले समाज में उपार्जन करके अपने पैंरों पर खड़े हो सकेंगे। और इस तरह सही शिक्षण के बल पर एक बड़ी जनसंख्या पन्द्रह-सोलह वर्ष की उम्र से ही उपार्जन करके अपना भरण-पोषण कर सकेंगी, किसी अन्य विकसित देश में रहने वाले खुद्दार बच्चों की तरह अपने स्वाभिमान को कायम रख सकेंगी।  लेकिन कोठारी कमीशन के द्वारा दिया गया यह सुझाव अभी भी हमारे देश में उपेक्षित है, आज भी शिक्षा-शिक्षण के क्षेत्र में लार्ड मैकाले का ‘‘षडयंत्रित नियम‘‘ ही कायम है, जो हर बार, हर वर्ष स्वयं को पूरी दुष्टतापूर्वक प्रतिस्थापित करता रहता है, ‘‘काले अंग्रेज महाप्रभुओं‘‘ की जमात को डिग्री प्रदान करता जाता है, साथ ही बेरोजगारों की फौज भी तैयार करता जाता है।

उपार्जन करने का गुर नहीं सिखाने वाली, बेरोजगारों को पनपाने वाली, विदेश जाकर गाय-गोरू की तर्ज पर पैर में रेडियो कॉलर पहनने को मजबूर करने वाली हमारे लोकतंत्र (तथाकथित) में स्थित शिक्षा प्रणाली बेढंगी चाल से दशकों का सफर तय करके आगे बढ़ती जा रही है, शिक्षाविद, प्रिंसिपल, वाइस-चांसलर, चांसलर, शिक्षा मंत्री (मानव संसाधन) और महामंत्री मौन हैं, एक बेपरवाही के नकाब तले मौन।

शायद भविष्य में वह समय आएगा जब सारे उपार्जन रहित, बेरोजगारों की भीड़ मंत्रियों-सांसदों के घर को घेर लेगी, अपनी ‘शिक्षा‘ का, शिक्षित होने का हिसाब मांगेगी और बंगले की बत्तियाँ बुझाकर हमारे प्रजातंत्र के मंत्री-सांसद घर में घन्टों-घन्टों दुबके रहेंगे, तब पुलिस भी शायद उनकी रक्षा करने में सक्षम नहीं हो पाएगी। और तब, शायद तब ही भारत में भी ‘शिक्षा‘ उपार्जनमुखी होकर प्रतिष्ठित हो पाए।

हम सबों को उस दिन का इंतजार है!

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इला कुमार

Ilakumar2002@yahoo.co.in

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