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विद्यार्थियों के समग्र विकास के लिए आजमगढ़ की मस्जिदें जला रहीं शिक्षा की अलख


कुकुरमुत्ते की तरह पनपते कॉन्वेंट स्कूलों के बीच उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ जिले की मस्जिदें अब भी शिक्षा की महत्वपूर्ण केंद्र बनी हुई हैं। कम से कम प्राथमिक कक्षा के स्तर तक तो ऐसा ही है। शहरों और कस्बों में जहां इस्लामी प्राथमिक स्कूल दुर्लभ हैं वहां मस्जिदों में शिक्षा देने का चलन बहुत आम है।

ज्यादातर छात्र मुस्लिम समुदाय के

आजमगढ़ शहर में 100 से ज्यादा मस्जिदें हैं और उनमें से करीब 40 प्रतिशत में प्राथमिक शिक्षा दी जाती है। यहां आने वाले ज्यादातर छात्र मुस्लिम समुदाय के हैं लेकिन गैर-मुसलमान छात्रों के प्रवेश लेने पर कोई प्रतिबंध नहीं है। मस्जिदों में चलाई जाने वाली शिक्षा प्रणाली के तहत कुरान, उर्दु, प्रारम्भिक गणित, हिंदी व प्रारम्भिक अंग्रेजी जैसे विषयों की मुफ्त शिक्षा दी जाती है। अन्य स्कूलों में पढ़ने वाले जो छात्र कुरान व धार्मिक नैतिकता सीखना चाहते हैं, उनके लिए अलग से कक्षाएं चलाई जाती हैं।

हिंदू छात्र भी अध्ययन के लिए आते हैं

आजमगढ़ में स्थित जामा मस्जिद के इमाम मौलाना इंतेखाब आलम कासिमी कहते हैं कि हमारे दरवाजे हर किसी के लिए खुले हैं लेकिन वास्तविकता में केवल मुस्लिम बच्चे ही यहां अध्ययन के लिए आते हैं। कासिमी 1988 में जामा मस्जिद के इमाम नियुक्त किए गए थे। उन्होंने कहा कि कभी-कभी हिंदू छात्र भी अध्ययन के लिए मस्जिदों में आते हैं लेकिन वे उर्दू भाषा में ज्यादा रुचि रखते हैं न कि प्राथमिक शिक्षा में।

उन्होंने कहा कि यहां आने वाले बच्चों में ज्यादातर गरीब छात्र होते हैं। ऐसा इसलिए है कि हम यहां मुफ्त शिक्षा देते हैं। उन्होंने कहा कि हमने प्रत्येक बच्चे को शिक्षित करने की पहल की है। हर किसी को सही और गलत की पहचान करना सीखना चाहिए। कासिमी ने कहा कि यहां लोग मस्जिदों में शिक्षा के प्रति ज्यादा रुचि दिखाते हैं क्योंकि उनका मानना है कि आधुनिक शिक्षा के साथ कुरान पढ़ना भी जरूरी है।

जिले के एक और मौलवी मौलाना जावेद अहमद कासिमी ने मस्जिद शिक्षा प्रणाली में एक नई शुरुआत की। उन्होंने अन्य आधुनिक स्कूलों व एक अंग्रेजी माध्यम के अबु बकार इस्लामिक नर्सरी स्कूल में दाखिला लेने वाले बच्चे के लिए एक ही छत के नीचे कुरान की शिक्षा के लिए एक विशेष कक्षा ‘मदरसा’ की शुरुआत की है।

मस्जिद के तहखाने में स्थित अबु बकार इस्लामिक नर्सरी स्कूल की शुरुआत पिछले साल मार्च में हुई थी। यहां केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (सीबीएसई) की पाठ्यक्रम आधारित उच्च कक्षाओं के लिए छात्रों को तैयार किया जाता है। अहमद कासिमी के मुताबिक मस्जिदें शिक्षा व आध्यात्मिकता की केंद्र हैं। उन्होंने कहा कि मस्जिदें आध्यात्मिकता व शिक्षा दोनों की केंद्र हैं। हम इसे सीमित नहीं कर सकते।

अहमद कासिमी ने 1975 में देवबंद के दारुल उलूम से अपनी शिक्षा पूरी की थी। वह पिछले 20 सालों से आजमगढ़ के दलाल घाट इलाके में स्थित इस्लामपुरा जामा मस्जिद में अपनी सेवाएं दे रहे हैं। अहमद ने इलाके के पिछड़े मुसलमानों के बीच जागरूकता फैलाने के लिए एक अभियान की शुरुआत की थी। इन मुसलमानों में शिक्षा का अनुपात बहुत कम था। उन्होंने कहा कि ये लोग मुख्यधारा से दूर हैं। हम उन्हें शिक्षा के साथ पठन सामग्री व स्कूल की वर्दी उपलब्‍ध कराते हैं।

वैसे अहमद मुफ्त शिक्षा प्रणाली से सहमत नहीं हैं। उन्होंने कहा कि हम प्रत्येक छात्र से 30 रुपये लेते हैं और उन्हें मुफ्त शिक्षा नहीं देते। इसकी वजह यह है कि लोग मुफ्त मिलने वाली चीजों को महत्व नहीं देते हैं। वैसे यदि कोई शुल्क देने में सक्षम नहीं होता, तो हम उससे इसके लिए कभी नहीं कहते।

उन्होंने कहा कि पहले छात्रों से कोई शुल्क नहीं लिया जाता था लेकिन तब छात्र नियमित रूप से स्कूल नहीं आते थे। उन्होंने कहा कि शुल्क लेने की शुरुआत करने के बाद छात्रों की कक्षा में उपस्थिति में सुधार हुआ। आजमढ़ में रहने वाली गृहिणी नौशीन रिजवान अपने दो बच्चे, बेटा व बेटी को मस्जिद में चलने वाले स्कूल में भेजती हैं।

वह कहती हैं कि मैं उन्हें मस्जिद में भेजना पसंद करूंगी जहां वे दोनों तरह की धार्मिक व आधुनिक शिक्षा ले सकते हैं। सेंट जेवियर्स हाई स्कूल के किंडरगार्टन का छात्र लारेब हर रोज दोपहर में कुरान की शिक्षा लेने के लिए मस्जिद जाता है। उसने बताया कि मेरी मां मुझे हर रोज इस मस्जिद में भेजती हैं और मुझे यहां आना पसंद है।

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