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हरीश रावत हर हाल में सीएम बनना चाहते हैं, बीसी खण्‍डूरी को कुदरत का एक स्‍वर्णिम मौका? : चन्‍द्रशेखर जोशी की ख़ास रिपोर्ट


आने वाले समय मे उत्तराखंड मे राजनैतिक अनिश्चितता का माहौल रहेगा और ये उत्तराखंड के लिये सबसे बड़ी दुःख की बात होगी और सीएम चुनने में कांग्रेस नेताओं के व्‍यवहार से ये प्रतीत होता है कि आने वाले समय मे झारखण्ड जैसी राजनैतिक अनिश्चितता उत्तराखंड मे बनी रहेगी और उसका सबसे ज्यादा नुक्सान उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्र को होगा, और इसका खामियाजा कांग्रेस को त्रिस्‍तरीय पंचायत चुनाव 2013 तथा 2014 के चुनाव में भुगतना पड सकता है, इस समय उत्‍तराखण्‍ड में राजनीतिक संदेश यह जा रहा है कि हरीश रावत उत्तराखंड कांग्रेस की नया डूबोने में लगे हैं और येन केन प्रकारेण मुख्‍यमंत्री बनना चाहते हैं ।

बीसी खण्‍डूडी को कुदरत एक स्‍वर्णिम मौका और देने जा रही हैं, अवसर है कांग्रेस के दिग्‍गत नेता हरीश रावत से मुकाबले का, हरीश रावत के सीएम पद की घोषणा होने के आसार लग रहे हैं, ऐसे में उत्‍तराखण्‍ड में दो चुनाव कराने होगें जिसमें एक विधानसभा तथा एक लोकसभा का, कोटद्वार से चुनाव हार चुके भाजपा के मुख्यमंत्री पद के दावेदार भुवन चंद्र खंडूड़ी के पक्ष में जिस तरह से प्रदेश में सहानुभूति की लहर चल रही है, उससे उनके कहीं से भी खड़े होने पर वह कडा मुकाबला कर सकते हैं। यद्यपि कांग्रेस नेतृत्व के समक्ष यह तथ्‍य लाया गया था कि हरिद्वार की लोकसभा सीट गंवाने का खतरा तो है ही, साथ ही यदि कांग्रेस का कोई विधायक किसी सांसद के लिए इस्तीफा देता है तो भाजपा और कांग्रेस के विधायकों की संख्या 31-31 यानी बराबर हो जाएगी। ऐसे में भाजपा तुरंत हमलावर हो जाएगी। परन्‍तु लगता है कि कुदरत उत्‍तराखण्‍ड में भाजपा को फिर से मौका देना चाह रही हैं।

लगभग एक सप्ताह से भी ज्यादा का समय हो चुका हैं.लेकिन दसरे की बैशाखी पर खड़ी उत्तराखंड कांग्रेस उत्तराखंड में अपने मुख्यमंत्री की घोषणा नहीं कर पायी है। ऐसे में सवाल यह उठ रहा हैं कि आखिर कांग्रेस की इस स्थिति के पीछे कौन लोग खड़े है। जबरदस्त मशक्कत कर राजभवन में बहुमत साबित करने के बाद भी कांग्रेस नेता विधायक दल पर अभी तक निर्णय नहीं कर पाई है। विशेषज्ञों की मानें तो सोमवार तक अनिर्णय की स्थिति रहने पर राज्य में विधानसभा को एनीमेटेड सस्पेंशन में डालने की नौबत आ सकती है। उत्तराखंड की दूसरी निर्वाचित विधानसभा की पहली बैठक 13 मार्च 2007 को हुई थी। इससे पहले उत्तराखंड में सरकार का गठन आवश्यक है।

राजनैतिक विश्लेषकों की माने तो इस सारी स्थिति के लिए कांग्रेस के कुछ द्दिग्ज ही जिम्मेदार है। क्योंकि जिस तरह से पिछले चार दिनों से दिल्ली में डटे उत्तराखंड कांग्रेस के नेता एक के बाद एक नाम मुख्यमंत्री के लिए उछा रहे है,उससे साफ जाहिर हो रहा हैं कि कांग्रेस में अंदर आखे कुछ तो हैं,जो ठिक नहीं चल रहा है। कई लोगों का ये कहना हैं कि इस सारी स्थिति के लिए केंद्रीय संसदीय राज्यमंत्री हरीश रावत को सीधे तौर पर दोषी मानने लगे है।

जानकारो का मानना हैं कि हरीश रावत के मुख्यमंत्री पद पर बैठाने से निश्चित तौर पर उत्तराखंड में कांग्रेस की स्थिति खराब हो सकती है,सबसे पहले तो उनके लिए कौन विधायक अपनी सीट खाली करें,अगर कोई विधायक सीट खाली कर भी देता हैं तो,इसकी क्या गारटी हैं की रावत की वहां से जीत हो। क्योंकि बीजेपी किसी भी किमत पर हरीश रावत को चुनाव नहीं जीतने देगी,इसकी वजह यह भी हैं कि उत्तराखंड में खंडूड़ी के चुनाव हारने के बाद अब उनके प्रति लोगों में ज्यादा सहानभूति है,जिसके चलते हरीश रावत का चुनाव जीतना बहुत मुश्किल होगा,यह रावत भी अच्छी तरह जानते है।

इसी के चलते हरीश रावत अब दूसरे पात्रों को भी पीछे धकेलने में लगे,विशेष तौर पर उस चेहरे को जिसने उत्तराखंड में विपक्ष के नेता के रूप में पांच साल तक काम करने के बाद आज कांग्रेस को इस रेस में खड़ा किया। लेकिन हरीश रावत गुट इन तामम चेहरों को दरकिनार करने में लगा है्। इसी का नतीजा हैं की दस जनपथ से लेकर देहरादून तक मुख्यमंत्री की लड़ाई लगातार जारी है।

इसके बानजूद भी यदि हरीश रावत गुट का कोई व्यक्ति उत्तराखंड की कमान संभालता हैं तो इतना तय हैं की उत्तराखंड हम लोगों को बहुत जल्द सत्ता परिवर्तन की सुगबुहाट सुनायी दें,और शायद बीजेपी फिर से एक नयी भूमिका में हो।

वहीं दूसरी ओर हरीश रावत ने कहा है कि हम उत्तराखंड में विधानसभा या लोकसभा दोनों के ही उपचुनाव की स्थिति में जीत के प्रति आश्वस्त हैं. इसका साफ मतलब है कि उनके सीएम बनने की स्‍थिति में दो चुनाव कराने होगें, विधानसभा तथा लोकसभा, इस पर हरीश रावत कांग्रेस अध्‍यक्षा को यह भरोसा दिला रहे है कि वह विधानसभा तथा लोकसभा चुनाव कांग्रेस को जितवा कर रहेगें, शायद सोनिया गॉधी इसी वजह से सीएम के फैसले को रोक कर रख रही हैं, हरीश रावत ने सोनिया गॉधी पर जबर्दस्‍त दबाव डलवाया है कि सीएम पर उनके नाम की ही घोषणा हो, और वह विधानसभा तथा लोकसभा चुनाव जितवायेगें, इस तरह अगर सोनिया हरीश रावत के दबाव में आ गयी तो हरीश रावत के नाम की घोषणा होनी अवश्‍यम्‍भावी हो जायेगी, बहुमत तक का चार कदम का फासला तो कांग्रेस ने किसी तरह पार कर लिया मगर इसके एवज में उसको खासी बड़ी कुर्बानी देनी होगी है। समर्थन देने के लिए हुई बार्गेनिंग के बाद 32 विधायकों वाली कांग्रेस के हिस्से महज सात या आठ ही मंत्री पद आ रहे हैं। अब अगले कुछ दिन कांग्रेस के भीतर इस बात पर घमासान के आसार हैं कि कौन मंत्री पद कब्जाने में कामयाब रहता है।

इस स्थिति में अब यह भी तय नजर आ रहा है कि नई सरकार लालबत्तियों के बंटवारे के अपने पुराने रिकार्ड को भी इस बार ध्वस्त कर देगी। नेता विधायक दल चुनने के लिए कांग्रेस में पिछले चार दिनों से जिस कदर खेमेबाजी नजर आई, उससे इस बात के संकेत साफ हो गए कि मंत्री पद हथियाने के लिए भी जोरदार दंगल होगा।

उत्तराखंड विधानसभा के आकार के मुताबिक यहां सरकार में मुख्यमंत्री के अलावा अधिकतम 11 मंत्री बनाए जा सकते हैं लेकिन जिन तीन निर्दलियों व उत्तराखंड क्रांति दल-पी के एक विधायक के बूते सरकार बनाने की कवायद चल रही है, वो भी तो अपना हिस्सा मांगेंगे।

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