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हिन्दी ज्ञान – विज्ञान की भाषा है; तत्समीकरण, तद्भवीकरण दोनों उसकी शक्ति हैं – रमेश कुमार शर्मा


अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी दिवस सम्मेलनः एक प्रतिक्रिया

10 से 12 जनवरी 2011 तक 3 दिनों में जब त्रिनिदाद एवं टोबेगो की प्रधानमंत्री कमला प्रासाद बिसेसर, जयपुर में आयोजित प्रवासी भारतीय दिवस सम्मेलन से निवृत्त होने के उपरान्त, बिहार के बक्सर जिला स्थित अपने पैतृक गॉंव भेलूपुरा में परिजनों और ग्रामवासियों से मिलने में या सभा-संगोश्ठियों में व्यस्त थीं, देश की राजधानी दिल्ली में अक्षरम् संगोष्ठी एवं प्रवासी दुनिया की ओर से अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी दिवस सम्मेलन का आयोजन किया गया। कमला प्रसाद के पैतृक गॉंव जाने और दिल्ली में अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी सम्मेलन होने के बीच कोई सीधा संबंध नहीं है। किंतु अपने पैतृक गॉंव में त्रिनिदाद की प्रधानमंत्री की भोजपुरी मिश्रित हिन्दी में भावाभिव्यक्ति एक ओर हिन्दी भाषा की शक्ति का परिचायक थी तो दूसरी ओर दिल्ली में आजाद भवन एवं हंसराज महाविद्यालय में होने वाले विद्वानों के विचार – विमर्श से हिन्दी की शक्ति के प्रति सकारात्मकता का भाव उजागर होने के साथ-साथ हिन्दी बनाम अंग्रेजी का द्वन्द्व भी सामने आया।

क्या हिन्दी को सचमुच शुद्धतावादियों से खतरा है? यदि अशोक चक्रधर की बात मानें तो है। यदि अन्य भारतीय भाषाओं या क्षेत्रीय भाषाओं – मलयालम, बंगाली, भोजपुरी, डोगरी, पंजाबी कोई भी हो – पर विचार करें तो लगेगा कि वे आज की हिन्दी की तुलना में अधिक तत्सम शब्दावली रखती हैं। इसलिए देश की अच्छी संपर्क भाषा सिद्ध होने के लिए हिन्दी को तत्सम शब्दावली से समृद्ध होना आवश्यक है और वह है भी। हिन्दी के महाकाव्य रामचरित मानस, पृथ्वीराज रासो, साकेत, कामायनी, रश्मिरथी, हल्दीघाटी आदि इसके प्रत्यक्ष प्रमाण हैं। सच में हिन्दी में तत्समीकरण के साथ तद्भवीकरण की भी विपुल संभावना है और उसने अंग्रेजी के शब्दों को भी अपने में सहेजा है। इसलिए तत्समीकरण और तद्भवीकरण दोनों को ही हिन्दी की शक्ति मानकर चलना होगा। हिन्दी को खतरा न तो तत्समीकरणवादियों (शुद्धतावादियो) से है और न ही तद्भवीकरणवादियों से। तथापि अंगेंजी और फारसी-अरबी (उर्दू) शब्दों के साथ समन्वय की प्रक्रिया में फिलहाल चल रही हिन्दी को दक्षिणी भाषाओं मलयालम, कन्नड़, तमिल, तेलगू के समन्वय की दृष्टि से तत्समीकरण को अधिक त्वरित करना ही होगा। यह समय की मांग है, शुद्धतावादियों का दबाव नहीं। फारसी, अरबी एवं अंग्रेजी सहित यूरोपीय भाषाओं की आधार भी संस्कृत ही है जो हिन्दी सहित भारतीय भाषाओं की जननी है। अंग्रेज जाति तो स्वयं भाषा के हिन्दू-यूरोपीय उद्गम की बात करती है।

हिन्दी बनाम अंग्रेजी की चर्चा में एक बात सामने आई कि हिन्दी ज्ञान-विज्ञान की भाषा नहीं अपितु मनोरंजन की भाषा बनती चली गई और केवल इसलिए भारत में अंग्रेंजी अनिवार्यतः शिक्षा के माध्यम के रूप में स्वीकृति प्राप्त करती चली गई। संगोष्ठी के एक सत्र में प्रभु जोशी, कैलाष चंद्र पंत और राहुल देव ने हिन्दी माध्यम में पढ़ने वाले विद्यार्थियों की पीड़ा को अपना स्वर दिया। तो दूसरी ओर एक अन्य सत्र में अनामिका ने आज के तकनीकी युग में मनुष्य के विस्थापन अथवा चंचल मनः स्थिति का मुद्दा उठाकर समकालीन हिन्दी साहित्य में एक तरह से सनातन जीवनमूल्यों से विचलन का परिदृश्य प्रस्तुत कर दिया जो प्रेम जनमेजय सहित अन्य वक्ताओं द्वारा भी कमोबेश विकास प्रक्रिया के रूप में अभिव्यक्त हुआ। सच्चाई यह है कि शिक्षा जीवनमूल्यों से विचलन नहीं कर सकती। यदि मानवीय जीवनमूल्यों से विचलन करना समकालीन हिन्दी साहित्य की नियति बन गया है तो वह मानवमूल्य  बोधक शब्दों का सटीक अनुप्रयोग करने में विफल रहेगा और इससे इस आरोप को बल मिलेगा कि हिन्दी ज्ञान-विज्ञान की भाषा नहीं है।

कोई भी भाषा ज्ञान-विज्ञान से विहीन नहीं होती और विस्थापन या मन की चंचलता की भी कोई सीमा है। यदि हिन्दी भाषा और हिन्दीभाषियों के संबंध में ऐसा नहीं होता तो सुदूर पश्चिमी देश त्रिनिदाद की प्रधानमंत्री बन चुकी एक भारतीय मूल की महिला अब तक अपनी मूल भाषा हिन्दी भूल चुकी होती और अपने पैतृक गांव में किसी दुभाषिये के माध्यम से बात कर रही होती। वे प्रवासी भारतीय दिवस सम्मेलन में भी शायद हिन्दी में ही बोलतीं यदि भारतीय प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति हिन्दी में बोलते। अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी दिवस सम्मेलन के उद्घाटन सत्र में भारत में फिजी के राजदूत ने ठीक ही कहा था कि आज हिन्दी को फिजी से भारत लाया जाना उसे भारत से फिजी लाने की तुलना में अधिक प्रासंगिक प्रतीत होता है।

– रमेश कुमार शर्मा
6/134 मुक्ता प्रसाद नगर,
बीकानेर -334004 (राज.)
दूरभाशः 0151-2252443

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One Comment

  • dr.vedvyathit says:

    bhasha aur lipi dono alg 2 hain lipi kii vaigyanikta srv sidh hai pr hindi bhasha kii vaigyakinta abhi baki hai ise ek roopta kii ati aavshykta hai

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