हिरण्यगर्भाः मनोज कुमार श्रीवास्तव (स्त्री जीवन का प्रतिनिधित्व करती कवितायें)
सहस्त्राब्दियों पहले
कंस ने जब
मुझे
यों ही पटक कर मार डालना
चाहा
मैं उसके हाथों से छिटककर
ऊपर
आकाश में चली गई
उसे शाप देते हुये
परिणाम का
तुम
मेरे अभिभावक हो
या कहूं
कि हो सकते थे
तुम्हारे लिये
मै शाप रोक लूंगी
किन्तु
परिणति
क्या तुम रोक सकोगे, पिता.
(2)
रक्तबीज को
मारने वाली
देवी
तेरे ही सामने
बिखरा पड़ा है
बीजों
का
रक्त
(3)
मां,
लोग कहते हैं
मत आओ इस दुनिया में
जहां लोग मज़हब के नाम पर एक दूसरे को मारते हैं
भाषा के नाम पर मारते हैं
प्रांत के नाम पर मारते हैं
जाति के नाम पर मारते हैं
मां,
मुझे लगता है कि
उसके भी पहले
कैसे आऊं
उस दुनिया में
जहां मां
अपनी बच्ची को मारती है
(4)
मां
तुम हिरण्यगर्भ हो
हर स्त्री की तरह
तुम्हारा गर्भ त्रुटि नहीं है
तुम्हारा गर्भ हीनता नहीं है
तुम्हारा गर्भ बोझ नहीं है
उनसे कहो मां
कि तुम्हारे मातृत्व का शिकार नहीं किया जा सकता
उनसे कहो मां
कि अपनी कोख को लेकर
तुम कभी क्षमाप्रार्थी न होगी
उनसे कहो मां
कि तुम्हारा शरीर एक संप्रभु देश है
और मैं
एक छोटी-सी कोशिका भी
एक संप्रभु देश की
साधिकार नागरिक
अपनी देह का संविधान तुम्हें ही तय करना है, मां
अंग्रेजी में वे देह को संविधान कहते भी हैं
(5)
डाँक्टरों की वह शपथ
और मेरा
यह पथ
ऊर्ध्वलोक का
क्या तुम्हें नही लगता है
कि कुछ लोगों ने
हत्या की माकेटिंग शुरू कर दी है
वे आकर्षक पैकेजिंग में जिस तरह
मेरी मृत्यु का वादा करते है, तुम्हारी खुशी का भी
सावधान रहना मां
यदि ठगी गई
तो मैं रिफंड में भी नहीं मिलूंगी।
(6)
कहते हैं
प्यार इसलिए अंधा होता है
क्योंकि मां अपने
गर्भस्थ शिशु को
तब से प्यार करना शुरू करती है
जब उसने उसका चेहरा भी नही देखा होता है
तुम्हारा चेहरा क्यों उतर गया मां
मैंने तुम्हें कुछ नहीं कहा
बस एक बात कही।
(7)
खो गई हैं लड़कियां
नौ करोड़ से ज्यादा
अफगानिस्तान, बांग्लादेश, चीन, भारत
पाकिस्तान, द. कोरिया और ताईवान भर में
खो गई हैं लड़कियां
कितना अच्छा लगता है न
एक नरसंहार को
तब्दील करना
गुमशुदा की तलाश में।
(8)
मां तुमने बताया नहीं मेरे हत्यारों को
कि मेरी आस जोह रही है एक सूर्य- किरण
कि मेरी राह में नज़रें गढ़ाए बैठा है एक फूल खिलने को
कि एक ऋचा मेरे नाम से बनने को विकल है
कि एक चिड़िया मेरी प्रतीक्षा में कितनी बार
गवाक्ष में आ बैठती है
कि एक गीत मेरे लिए तुम्हारे ओठों पर वैसे ही बन रहा जैसे
ये मोजे जो तुम बना रही हो
कि मेरे लिए घर के पड़ोस से गुजरती नही भी ठिठककर
पूछती है कि मेरी किलकारी उसकी तरंगों में कब मिलेंगी
कि मेरे नन्हें भाई की आंखें चमकती हैं उत्सुकता में
मां तुमने बताया नहीं हत्यारों को
तुम अवाक् रहा गयी थीं
या मूक बना दी गयी थीं
मुझे नहीं पता
पर
इन प्रतीक्षाओं का प्रतिशोध शेष है मेरे हत्यारों पर
(9)
सुपारी लेकर
किसी की जान लेने वाले
गुंडे होते हैं
डॉक्टर नहीं होते
मैं दुहराता हूं
डॉक्टर डॉक्टर है
कान्ट्रेक्ट किलर
कान्ट्रेक्ट किलर है
दोनों में फरक है
इतने साफ कह रहा हूं मैं
और
आप भी यही कह रहे हैं न
डॉक्टर
(10)
ओ मेरी मां के ससुर
ओ मेरी पिता के ताऊ
ओ मेरी मां की सास
तुम जो भी कोई हो
जिसके दबाव में मुझे उत्पाटित कर दिया गया
मेरी मां का अहसान मानो
कि तुम जैसे आउटलॉ को वो
अभी भी
इन- लॉ कहती है।
(11)
वो लंदन में था
और वो भी चित्रपट पर
जब उसने द्रवित होकर कहा अपनी युवा लड़की से
‘जा सिमरन, जी ले अपनी जिन्दगी’
और उस लड़की ने शुक्र मनाया
और पंख फैलाकर उड़ चली
हमारे यहां
मुरैना में
कहीं कहीं
तब गनीमत है जब यों गर्भ में ही
कहा जाए
‘जा सिमरन, जी ले अपनी जिन्दगी’
- मनोज कुमार श्रीवास्तव





















SEEDHEE – SAADEE BHASHA MEIN SEDHEE – SAADEE BHAVANUBHTI
KE LIYE MANOJ SHRIVASTAV JI KO BADHAAEE AUR SHUBH KAMNAAYEN.
बालिकाओं व फिमेल चाइल्ड से सम्बंधित अनुभूतियों को बिना लाग लपेट सपाट शब्दों में ढाल कर जिस तरह व्यक्त करना चाहिए उसी तरह कहने की अदभुत ताकत रचनाओं में स्पस्ट दिख रही है इसके लिए रचनाकार श्री मनोज जी को व संपादक मंडल को विश्व महिला दिवस के अवसर पर इस को पोस्ट करने के लिए बधाई – अवधेश
Bahut achhi kavitein!
मनोज जी की कवितायेँ बहुत ही सारगर्भित एवं दिल को छूने वाली हैं.
काश इन कविताओं के माध्यम से लेखक के उदगार सभी समझ लेते तो कन्या भ्रूण हत्या जैसा घिनौना कृत्य न करते।
इतनी सुन्दर और सरल रचना के लिए आप साधुवाद के पात्र हैं ॥
– डॉ. राम नरेश त्रिपाठी