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यशस्वी कथाकार दिव्या माथुर से प्रीत अरोड़ा की विशेष बातचीत


यशस्वी कथाकार दिव्या माथुर का रचना संसार उनके संवेदन का स्पंदन है। वे प्रवासी भारतीय समाज समाज की कुण्ठाओं,विषमताओ एवं संघर्षों के जटिल एवं बहुअयामी स्वरूप को गहनता से समझती है। भारत की वरिष्ठ साहित्यकार चित्रा मुद्गलका कहना है – ‘दिव्या माथुर का वैविध्य भरा रचना संसार अपने बहुकोणीय और बहुआयामी पाठ के चलते, सुधी पाठकों की पाठकीय जिज्ञासाओं को नितांत नए आस्वाद से ही नहीं पूरता बल्कि सर्जना की सघन संवेदना और उसकी दृष्टि संपन्न अभिव्यक्ति के माध्यम से कथा वितान को स्वयं उसके अर्जित अनुभवों से सहज ही तब्दील कर देने की क्षमता रखता है. ऐसा तभी सम्भव होता है जब उसके पाठ का निर्वाह … गति कौशल … कथ्य के ताने बाने को पूरी तार्किकता के साथ अपने में गहरे समोये हुए चलता है।’ दिव्या जी यू.के. की एक ऐसी रचनाकार हैं जो हिंदी-अंग्रेज़ी दोनों में ही समान अधिकार से लिखती हैं.

दिव्या,जी  नेहरू केंद्र में वरिष्ठ कार्यक्रम अधिकारी हैं। रॉयल सोसाइटी ऑफ़ आर्ट्स की फेलो है। आर्ट्स काउंसिल औफ़ इंगलैंड द्वारा आर्ट्स एचीवर एवार्ड, कथा यू.के द्वारा पद्मानंद साहित्य सम्मान, यू.के हिंदी समिति द्वारा संस्कृति सेवा सम्मान और भारतीय उच्चायोग द्वारा डॉ. हरिवंश राय बच्चन सम्मान मिल चुका है।  हाल ही में डा कर्ण सिंह ने उनके काव्य संग्रह, झूठ, झूठ और झूठ के लिए उन्हें राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त प्रवासी भारतीय पुरस्कार प्रदान किया और लन्दन के भारतीय उच्चायुक्त ने उन्हें हरिवंशराय बच्चन लेखन पुरस्कार से सम्मानित किया है । आप कविता के क्षेत्र में इंटरनैशनल लाइब्रेरी ऑफ़ पोइटरी द्वारा सम्मानित है। दिव्या की कविता, बौनी बूंद, को Poems for the Waiting Room (आर्ट्स काउंसिल औफ़ इंग्लैंड की स्वास्थय परियोजना) में सम्मलित किया गया है.

लखनऊ विश्वविद्यालय में आपकी कहानियों पर एम. फिल हो चुका है तथा ‘साँप‘ सीढ़ी कहानी पर मुंबई दूरदर्शन ने टेलीफिल्म बनाई है।  इन्हें ‘इक्कीसवीं सदी की प्रेणात्मक महिलाएं’ और ‘ऐशियंस हूज़ हू’ की सूचियों में सम्मलित किया गया है. नैशनल फ़िल्म थियेटर के लिये अनुवाद के अतिरिक्त बी बी सी द्वारा निर्मित फ़िल्म, कैंसर, का हिंदी रूपांतर, मंत्रा लिंगुआ के लिए बच्चों की कई पुस्तकों का हिंन्दी में अनुवाद भी किया है

दिव्या जी  की प्रकाशित रचनाएं हैं :  अंतःसलिला, रेत का लिखा, ख़्याल तेरा, चंदन पानी, 11 सितम्बर : सपनों की राख तले, और झूठ, झूठ और झूठ (कविता संग्रह), 2050 और अन्य कहनियां, पंगा और आक्रोश (कहानी संग्रह), Odyssey : एवं Asha : (अँग्रेज़ी में संपादन) । आक्रोश,  Odyssey एवं Asha तीनों संग्रहों के पेपरबैक संस्करण आ चुके हैं।

प्रस्तुत है दिव्या माथुर की प्रीत अरोड़ा से विशेष बातचीत….

आपके लेखन की शुरुआत कब और कैसे हुई…और आपका प्रेरणा-स्त्रोत कौन हैं ?

बचपन से ही मेरे प्रेरणा स्त्रोत मेरे दादा, बिशन दयाल शाद, रहे, जो एक बेहतरीन चित्रकार और मशहूर शायर थे. चन्दामामा का आजीवन सदस्य बनाकर स्वराज चाचा ने मुझे बचपन में ही पढ़ने की आदत डाल दी थी. मोहन चाचा, जो एक बेहतरीन गायक और तबलाबाज़ भी थे, ने मुझे बांसुरी, हारमोनियम और तबला बजाना सिखाया. चाचाओं और बुआओं से कहानियां सुनते सुनते न जाने कब मैं लिखने लगी. शुरुआत हुई कविता से; मेरी पहली कविता मेरे जन्म के बारे में थी. मेरी दादी ने मुझे बताया था कि जब मैं पदा हुई तो मेरे दादा ने एक बहुत बड़ी दावत दी. मैं घर में चौथी संतान थी और तीसरी बेटी और फिर भी उन्होंने बैंड बाजे बजवाए, हिजड़े नचवाए और पकवान बंटवाए. इन्हीं सबका बखान थी वह कविता, जिसे मैंने आठ या नौ बरस की उम्र में लिखा तेरह बरस तक सबसे छिपा कर रखा और फिर एक दिन फाड़ कर फेंक दिया क्योंकि बड़े भाई को मेरे लिखने की भनक लग गई थी.

आपको साहित्य की कौन-सी विधा में सबसे अधिक रूचि है और क्यों ?

मेरी रुचि कविता में ही अधिक रही हालांकि छपीं पहले मेरी कहानियां ही और चर्चित भी हुईं. मेरे छह कविता संग्रह निकल चुके है, एक और लगभग तैय्यार है किंतु दो एक साल से मैं कहानियां अधिक लिख रही हूं, शायद आलोचकों की बातों में आकर कि मैं एक बेहतर कहानीकार हूँ.

महिला लेखिकाओं में किस महिला लेखिका से आप अत्यधिक प्रभावित हुई हैं और क्यों ?

इंगलैंड में बसने के बाद जब मैंने ‘औडिसी’ और ‘आशा’ कहानी संग्रह अनुदित किए तो मैं बहुत सी लेखिकाओं के सम्पर्क में आई जो विदेशों में बसी हैं जैसे की आतिया हुसैन, अनिता देसाई, उषा प्रियंवदा, उषा वर्मा, फ़िरोज़ मुखर्जी और सुषम बेदी आदि, जिनसे मैं बहुत प्रभावित हुई. युवावस्था में मैं ब्रौंटे-सिस्टर्स से बहुत प्रभावित रही. बचपन से मुझे मीरा और कश्मीरी सूफ़ी कवियत्री लाल देव के भजन बहुत भाते रहे हैं और आज भी बहुत अच्छे लगते हैं.

Holy books will disappear, and then only the mystic formula will remain.
When the mystic formula departed, naught but mind was left.
When the mind disappeared naught was left anywhere,
And a voice became merged within the Void.

समकालीन साहित्य में स्त्री – विमर्श से आपका क्या तात्पर्य है ?

स्त्री विमर्श और दलित जैसे विषयों पर लिखा गया साहित्य भी साहित्य ही है; मुझे साहित्य को खांचों में विभाजित करना अच्छा नहीं लगता किंतु यह तो मानना ही होगा कि स्त्री विमर्श की चर्चा ने स्त्रियों के प्रति देश की लापरवाही की ओर हम सबका ध्यान खींचा है. जैसा कि शीबा फ़हमी ने ‘हंस’ में लिखे अपने एक लेख में कहा है कि अकेला साहित्य स्थिति नहीं सुधार पाएगा, नारी के साथ साथ पुरुष वर्ग को भी ठोस कदम उठाने होंगे, सिर्फ़ कानून बनाने से काम नहीं चलेगा.

नारी अस्मिता और अस्तित्व के सन्दर्भ में आपकी क्या अवधारणा है ?

ऐसा कैसे हो सकता है कि देश तरक्की कर रहा हो और स्त्रियां पीछे रह जाएं? जहां पश्चिम में नारी बराबरी और पहचान के लिए लड़ रही है, वहीं भारतीय नारी को पुरुष प्रधान भारतीय समाज में अपने मूलभूत अधिकारों के लिए भी लड़ना पड़ रहा है. भारतीय पुरुष जब तक नहीं बदलेगा तब तक बात आगे नहीं बढ़ेगी. भाइयों को आगे बढ़कर कहना होगा कि जायज़ाद में बहन को भी हिस्सा दिया जाए और बहन को भी हिस्सा स्वीकार करना होगा. स्त्रियों को स्वयं को भी शिक्षित करना होगा ताकि वे वे अपने अधिकारों और पहचान के बारे में सोच सकें.

सही अर्थों में नारी की मुक्ति किससे है?

अच्छा प्रश्न है. मुक्ति एक मिराज है; जिसके पीछे मैं भागती रही हूं, जो मुझे चिढ़ाती है और हाथ में आ आकर दूर हो जाती है. ख़ैर, नारी शोषण के लिए आज कौन लोग और कैसी स्थितियां दोषी हैं और स्वयं नारी उन स्थितियों के लिए कितनी जिम्मेदार है? पहले तो हम यह तय करें कि मुक्ति हमें किससे चाहिए? पुरूष से या कि अपने हीन भाव से या कि व्यवस्था से? यह एक बहुत बड़ा मुद्दा है और शायद आपको एक विशेषज्ञ से राय लेनी चाहिए.

समाज के उत्थान में नारी का क्या योगदान हो सकता है ?

आज भारत जिस मुकाम पर है, मैं तो यही मानती हूँ कि उसमें भारतीय नारी का बहुत बड़ा हाथ है, जैसा कि कहा जाता है के हर एक सफ़ल पुरुष के पीछे एक नारी होती है. भारत की सफ़लता के पीछे भी नारियों का ही हाथ है, बच्चों के भविष्य बनाने से लेकर घर की ज़िम्मेदारियों से पतियों को पूर्ण रूप से मुक्त करने तक ताकि वे अपनी पूरी तवज्जो अपनी नौकरी अथवा अध्ययन पर लगा सकें. विदेशों में रहने और विदेशी महिलाओं से मिलने के बाद मेरी तो यही राय है कि त्याग, स्नेह और कर्मठता की मूर्ति, एक भारतीय नारी का मुक़ाबला संसार की सारी महिलाएं मिलकर भी नहीं कर सकतीं.

आज ऐसा माना जाता है कि हिन्दी भाषा का अस्तित्व संकट में है क्या आप इस बात से सहमत हैं ?

हाल ही में मैंने यमुना नगर में एक अंतर्राष्ट्रीय कहानी सम्मेलन में भाग लिया, जहाँ बहुत से प्रतिभागियों ने प्रवासी कहानीकारों से यही प्रश्न पूछा. इसी सप्ताहंत चतुर्थ अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी सम्मेलन होने जा रहा है जो बर्मिंघम, नौटिंघम और लन्दन में होगा, जिसमें हिन्दी भाषा को लेकर चर्चाएं होंगी. आजकल जितने कवि और कथा सम्मेलन ब्रिटेन और अमेरिका में हो रहे हैं, शायद ही कभी हुए हों. इसका अर्थ यही है कि हिन्दी भाषा तरक़्क़ी पर है. आजकल विदेशियों में भी हिन्दी के प्रति एक नया उत्साह देखा जा रहा है; भारत की प्रगति का एक यह भी पहलु है. हिन्दी का भविष्य ख़तरे में कैसे हो सकता है?

आपके विचारानुसार भारतीय और पाश्चात्य साहित्य में क्या समन्वय है?

कुछ एक सालों से मैं देख रही हूँ कि अंतर्राष्ट्रीय लेखक, कलाकार और फ़ोटोग्रैफ़र्स भारत के बारे में लिख रहे हैं, अपनी कला में भारत को दर्शा कर रहे हैं. ग्लोबलाइज़ेशन की वजह से लगता है कि संसार छोटा हो लगा है; भारत ने भी बहुत तरक्की कर ली है; भारत के साहित्यकार विदेशों में ख़ूब नाम कमा रहे हैं. वेबसाइट्स के ज़रिए अब सभी को सब कुछ उपलब्ध है तो समन्वय तो होगा ही.

आपने विदेश में रहकर भारतीय संस्कृति और सभ्यता का प्रचार किस प्रकार किया है?

ब्रिटेन में भारतीय संस्कृति और सभ्यता को सम्भाले रखने का काम बड़े पैमाने पर चलता रहा है. भाषा और कला के शिक्षण के ज़रिए बच्चे अपने को भारत से जुड़ा पाते हैं. मन्दिरों, गुरुद्वारों, स्कूलों और काउंसिल की इमारतों में नियमित कक्षाएं ली जाती हैं. भारतीय विद्या भवन, नेहरु केन्द्र, पाटीदार समाज जैसे पचासियों आयोजन-स्थल हैं जहां भाषा और संस्कृति को लेकर बड़े पैमानों पर कार्यक्रम होते रहते हैं. यू के हिन्दी समिति की उपाध्यक्ष, वातायन की अध्यक्ष और नेहरु केन्द्र की वरिष्ठ कार्यक्रम अधिकारी होने के नाते हिन्दी के प्रति मेरा उत्तरदायित्व तिगुना है और मैं पूरी निष्ठा और ईमानदारी के साथ इसे निभाने का प्रयत्न करती रही हूं. मेरे जैसे ही सैंकड़ों कर्मठ लोग हैं जो विदेश में हिन्दी के प्रचार और प्रसार के प्रति पूर्णतः समर्पित हैं.

आप नवोदित लेखकों को क्या सन्देश देना चाहती हैं?

निजी तौर पर मैं यह मानती हूं कि लेखन स्वांत: सुखाय होना आवाश्यक है लेकिन आज के लेखक को लिखने से भी पहले यह निश्चित करना होता है कि वह किस पत्र-पत्रिका के लिए लिख रहा है, उनकी अपेक्षाएं क्या हैं, इत्यादि. ख़ैर, नवोदित लेखकों को अपनी रचनाएं न छपने पर जी छोटा नहीं करना चाहिए, उनकी लेखनी में दम है तो वह एक दिन अवश्य बोलेगी. ख़ूब पढ़ें किंतु किसी की नकल न करें; मौलिक विचार ही आए तो ही लिखें.

प्रीत अरोड़ा

(पंजाब विश्वविद्यालय) चड़ीगढ़

arorapreet366@gmail.com

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