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इला कुमार जी के जन्मदिन के शुभ अवसर पर उनकी चंद कृतियां


परिचय

इला कुमार जी का जन्म 1 मार्च 1956 को मुज़फ्फरपुर में हुआ। इन्होंने एम्. एससी. (फिजिक्स), बी.एड. तथा एल.एल.बी. की शिक्षा प्राप्त की है।  कुछ वर्षो तक अध्यापन तथा तीन वर्ष सिंहभूम के आदिवासी जन-जीवन का विशेष अध्ययन कविताओं और कहानियों के अलावा शैक्षिक, सामाजिक तथा वेदान्तिक विषयों पर सक्रिय लेखन किया है। इनकी रचनाओं का देश की शीर्षस्थ पत्र-पत्रिकाओं में निरंतर प्रकाशन होता रहा है। इनकी कुछ कविताओं का बंगला, पंजाबी, व अंग्रेज़ी में अनुवाद हो चुका है।

प्रकाशित कृतियाँ:  जिद मछली की (कविता संग्रह),  किन्ही रात्रियों में (कविता संग्रह),  टूटे पंखो वाला समय (रैनेर मरिया रिल्के की कविताओं का हिन्दी अनुवाद),  ताओ तेह चिंग (लाओ त्ज़ु की चीनी कविताओं का हिन्दी अनुवाद), कृति-का (उपन्यास), रेसोलुशन ऑफ़ फिश (प्रथम काव्य संग्रह का अंग्रेज़ी अनुवाद),  1970 – 2004 तक की कविताओं का संकलन (चार भागों में)

प्रकाशनार्थ:  नया काव्य संग्रह, कहानी संग्रह, उपनिषद कथाएं (पुर्नलेखन)

व्यवस्ताएँ:  योगवाशिष्ठ एवं उपनिषदों से संबंधित पुस्तक पर कार्य

स्थायी पता: इला कुमार, श्री गणेश एन्क्लेव, गायत्रीनगर नगर रोड, नागपुर 440022 (महाराष्ट्र)

वर्त्तमान पता: इला कुमार, मार्फत श्री मृत्युंजय कुमार, आई,आर,एस,ई/ चीफ इंजी.(कंस्ट्र्),254 2-B, रेलवे कॉलोनी, बसन्त लेन, रेलवे अस्पताल के नजदीक, कनॉट प्लेस, नई दिल्ली – 110001

ई-मेल: ilakumar2002@yahoo.co.in

इला कुमार जी के जन्मदिन के शुभ अवसर पर आपके समक्ष प्रस्तुत है उनकी कुछ कविताएं-

अश्रांत आविर्भाव

सड़क की खुरदरी सतह हो

या सुचिक्कन प्रासाद का प्रवेशद्वार

कोई बढ़ता चलता है

हर पल पर साथ साथ

निर्जन वनों में

ऊंचे पहाड़ों तले फैली विस्तृत चरागाहों में

शांत उदास सडकों पर

किसी भी अमूर्त से पलांश में

अचानक अवतरित हो उठता है पाशर्व में

भरमाता-सा

अपनी उदार बाहों में भर चौंका देता है

एक दिलासा

मैं हूँ

हर पल तुम्हारे साथ

हर पग को थामता

सूर्य का यह अश्रांत आविर्भाव

***

जिद मछली की

समुद्र के रास्ते से आता है सूरज

सूर्य

जो उदित होता है सीना चीरकर

बादलों का

धप्प् से गिर जाता है सागर की गोद में

गोद भी कैसी

आर न पार कहीं ओर छोर दिखता नहीं

एक सुबह अल्ल्सबेरे जागी हुयी

छोटी सी मछली

मचल गई देखेगी वह

सूरज का आना

तकती रही रह रह कर

दुऽप्प….! दुऽप्प….! सतह से ऊपर

बार बार

जान नहीं पाई

कब और कैसे सूरज उग पड़ा

जिद मछली की

जरुर देखेगी वह जाना सूरज का

आख़िर

घूम फिरकर आएगा थककर

खुली खुली अगोरती बाहों में

सागर के

शाम की लाली तले एक बार फिर

दप्प से कूद गया सूरज

समंदर की अतल गहराइयों में

न जाने कितने कालखंडों से तैर रही है

वही मछली

दिग्भ्रमित

युग युगंतारों अतल तल को

अपने डैनों से कचोटती

क्या जान पायेगी कभी

ख़ुद ही है

वह सूरज और सागर भी

बादलों के पार स्थित

निर्द्वन्द आकाश में उद्भूत

अनन्य महाभाव भी

***

कार्तिक का पहला गुलाब

कार्तिक का पहला गुलाब

सुर्ख पंखरियाँ सुबह की धूप में

तमाम पृथ्वी को अपनी चमक से आंदोलित करती हुई

तहों की बंद परत के बीच से सुगंध भाप की तरह ऊपर उठती है

वह मात्र सुगंध है गुलाब नहीं

वह रंग

वह गंध

वह पंखिरयों के वर्तुल रूपक में लिपटा

कोमलता, सुकुवांर्ता, सौंदर्य प्रतीक

दृष्टी दूर तक स्वयं के संग जाना चाहती है

कार के शीशे चढ़ाती गिराती भंगिमाओं के बीच

मालिकाना भाव से पोषित तत्व को सम्पूर्णता में परख लेना चाहती है

मान्यताओं की स्थापना के बीच

वक्त बीतता हुआ

अचानक दम लेने को ठमक जाता है

***

ठहरा हुआ एहसास

एक एक बीता हुआ क्षण

हाँ

पलों मे फासला तय करके वर्षो का

सिमट आता है सिहरनो में

बंध जाना ज़ंजीरों से मृदुल धागों में

सिर्फ़ इक जगमगाहट,

कितनी ज़्यादा तेज सौ मर्करी की रोशनियों से

कि

हर वाक्य को पढ़ना ही नहीं सुनना भी आसान

कितनी बरसातें आकर गई

अभी तक मिटा नहीं नंगे पावों का एक भी निशान

क्या इतने दिनों में किसी ने छुआ नहीं

बैठा भी नहीं कोई?

अभी भी दूब

वही दबी है जहाँ टिकाई थी, हथेलियाँ, हमने.

***

किन्हीं रात्रियों मे

किन्हीं रात्रियों में

जब हवा का वेग किसी ख़ास पग्ध्वनि के बीच लरज़

उठता है

और मैं पोर्टिको के बगल वाली चोटी दीवार पर बैठी होती हूँ

मोटे खम्भे से पीठ टिकाए हुए

बगल की क्यारियों की बैंगनी और गुलाबी पंखारियाँ

फरफराती हैं

जर्बेरा का मद्धम श्वेत पुष्प अपना मुँह पृथ्वी की ओर थोड़ा झुका

लेता है

मानो शर्म से

उसी समय

मेरे अन्तर से जनमती हुई आकाँक्षा मुझे घेर लेती है

जानती हूँ तुम्हे ये कान सुन नहीं पायेंगे

इन आंखों की दृष्टि से परे हो तुम

तुम

मेरी समस्त इन्द्रियों के महसूस से दूर हो जैसे

ठीक इसी समय

वह आकाँक्षा साँप की तरह फहर कर लहरा उठती है

तानकर खड़ी हो जाती है

घास की नर्म हरी परत के ऊपर से लेकर

वहाँ आद्रा स्वाती नक्षत्रों के बीच तक

तुम्हे देखने महसूस कर पाने की अदम्य आकांक्षा

अपने समस्त सुंदर कोमल भावों के साथ

मैं

यहाँ

तुम्हारी प्रतीक्षा में

तुम्हारा आना महसूस करने की यह स्वप्रतीक्षा बेला

मुझे आमंत्रित करती है

तुम दृष्टि से दृष्टव्य नहीं

कानों से श्रोतव्य नहीं

त्वचा के स्पर्श के घेरे से दूर हो तुम

फिर भी

कैसे

किस भाँति

तुम मेरे अन्दर हो

बाहर भी

इस अनाम गंध से पूरित वायु की भाँति

तुम मुझे चारों ओर से घेर लेते हो

उसके बाद

बिना भाषा

बिना शब्दों के कहते हो

यह मैं हूँ

हाँ

यही हूँ मैं

***

कहा था मैंने

माँ के लिए

कहा था मैंने

लौटकर

कभी न कभी अवश्य आऊंगी

किसी गर्म उमस भरी दुपहरिया में

ठसाठस भरी बस से उतरकर

अपने शहर की मोहग्रस्त धरती पर

छूट गया समय

एक बारगी हिलक उठता है

दूर गुलमोहर के पीछे

आकाश के विस्तार में छिपी है

दो आकुल आँखों में भरी प्रतीक्षा

सम्पूर्ण सिहरते वजूद का यह वाष्पित दाब

***

जब अमृत बरसा

उछलती, मदमाती आई,

चंचल, अल्हड़ इक धारा,

सहसा, टूटकर, बिखर गई,

उस ऊँचे पत्थर के ऊपर,

वक्र हूई दृष्टी,

हुआ कुपित चट्टान,

निर्जन वन में, थामे खड़ा मैं, ज्यों सातों आसमान,

जड़ें मेरी पाताल को हैं जातीँ,

कंधों पर ठहर ठहर जाते बादल,

किसनें ? किसने भिगोयी मेरी, ये वज्र सी छाती,

रुकी नहीं, थमी नहीं, चंचल धारा,

बह चली, पत्थर दर पत्थर,

बोली, सहसा पलट

हां बिखेरी मैंने, अंजुरी भर भर

शीतल धारा,

यूं रचा मैंने, तेरे गुहार में,

मुट्ठी भर जमीं,

होगा कभी अंकुरित यहाँ,

बरस बीते,

इक नन्हा सा, दूर देश का बीज

पिरो देगा वह कण-कण

पतले अंखुआये नन्हें कोंपल,

दिखोगे तुम स्रष्टा

कहलाओगे पालनकर्ता

विहंसा चट्टान,

शिला सी उसकी मुस्कान

पिघल गई धारा के साथ

***

झुके हुए दरख्तों के पार

झुके हुए दरख़्तों के पार झाँकती है एक किरण

बुझी-सी अनमनी-सी

पुरते सपनों के हर रंग को

डुबो-डुबो जाता है गाढ़ा अंधेरा

अनिश्चित को चाहते हुए असमंजस की दीवारों से घिर जाती हूँ

तो

पर्त-सी खुलती है

कि

चांद तो दूर कहीं दूर

आंधियों के पार घिर, जा चुका

रेतीले चक्रवातों के बीच

डगमगाती खड़ी हूँ

किसी नए क्षितिज कि तलाश में

***

 

आपके समक्ष प्रस्तुत है इला कुमार जी द्वारा लिखित कहानी

वाश्विता एक नाम

‘‘कभी-कभी इच्छा होती है कपड़े बदलने के साथ-साथ शरीर भी बदल डालूँ.’’
‘‘क्या…’’
स्वयंभू की दृष्टि वाश्विता के चेहरे पर घूमकर वापस लौट आई वहाँ अनमनेपन की परत के पीछे उसका अपना ठंडा ऊहापोह कुहरे की नाई लिपटा पड़ा था.

रेलिंग की सतह पर दोनों हथेलियाँ टिकाकर खड़ी वाश्विता की मुद्रा में न कोई प्रश्न था न उत्तर की प्रतीक्षा. सामने नीम के तने पर मजबूत पकड़ जमा-जमाकर फैली मनीप्लांट की लतर की दिशा में पसरी निगाहों में छिपी उलझन की लकीर सीधी नीम के खुरदरे तने तक फैली हुई थी. सोच में डूबी उस मुद्रा के पीछे शायद उसके स्वयं के स्वप्न थे. मानों बहुत से स्वप्नों के बीच उनकी सत्यता असत्यता को तौलती हुई वह खड़ी थी. लाल फर्श की पारदर्शिता पर हल्के आसमानी रंग की पोशाक में मूर्तिवत खड़ी वाश्विता की गर्दन की खम में वही राजरानियों वाला सौंदर्य था, सुराहीदार कंधों पर टिकी ऐश्विर्यित मुस्कान से ढ़ंकी लंबोत्तरी गोलाई.

स्वयंभू ने सोचा कि वह वाश्विता करीब जाए, थोड़ा आगे बढ़कर दाहिने कंधे के नीचे बाँह और पीठ पर अपनी दाहिनी हथेली को नरमी से टिका दे और तब शायद उलझनें स्वयं वहाँ से तिरोहित हो जाएँगीं. झाड़ियों के बीच छिप-छिपकर चुनमुन करती चिड़ियाओं के पास चली जाएँगी.

उसने गोलाई में कटी गुड़हल की झाड़ी को देखा, वहाँ पत्तों की ओट पूरी गोलाई में फैली हुई थी, अंदर के गोलक में डालियाँ एक दूसरे में उलझी हुई, उसके अंदर शायद चिड़ियों के घोंसले थे. उस गोल झाड़ी के अंदर से हमेशा चिड़ियों की चुनमुनाहट की आवाज़ आती.

‘‘कल शाम ही ड्रेसिंगरुम में कपड़े बदलते समय यह बात में उगी.’’

‘‘क्या फायदा? फिर से गर्भगृह, फिर बचपन.’’

स्वयंभू ने सोचा कि वह आगे कहे कि फिर एक बार कई वर्ष प्रबुद्ध होने के इंतजार में बीत जाएँगे. इतने सालों में जो इतनी मेहनत से यह सारा कुछ सीखा समेटा गया है पुरानी अड़चनों को परे हटाकर मंजिल की ओर चले गए रास्ते पर आगे और आगे बढ़ने की चेष्टा के बीच समृद्ध वर्ष बिताए गए हैं, वह सारा कुछ फिर से मुट्टी से रेत की नाई फिसल जाएगा. क्या पता फिर से कायाकल्पित जीव वह सब पुराना समेट पाने में सक्षम हो पाए या नहीं.

‘‘हूँ, मेरे मन में भी यही बात आई थी.’’

वाश्विता की अनमनी आवाज़ बरामदे के रेलिंग के पार चली गई. मोटे लकड़ी के डंडों से बनी रैलिंग सफेद पेंट से पुती हुई जड़ भाव में स्थित थी. लकड़ी के लंबे टुकड़ों के पार पूरा बगीचा पसरा पड़ा था. एक, दो, तीन, चार- यहाँ सामने रेलिंग के पूरे 16 डंडे ऊर्ध्व खड़े थे. बीच में बर्फी की शक्ल के काठ के टुकड़े सीधे खड़े डंडों को ऊपर से अपने अंदर समेटते हुए. पूरे बरामदे को घेरने वाले उभरी हुई सतह वाले मोटे डंडे सरीखे लकड़ी के लंबे टुकड़े रेलिंग की ऊपरी सतह को सिरजते हुए लंबाई में बरामदे को घेरे हुए खड़े थे.

उदग्र खड़े 12 टुकड़ों को जोड़कर बनी हुई रेलिंग की एक यूनिट थी. बरामदे को घेरती हुई यहाँ से वहाँ तक फैली हुई, पूरी संरचना के बीच ऐसे चौबीस यूनिट उपस्थित थे. एक लंबा बरामदा था वह.

वाश्विता ने लम्बे बरामदे को एक बार उसकी पूर्णता में पूरा देखा. वहाँ हमेशा की तरह फर्श की लाल पारदर्शिता पसरी पड़ी थी. वहाँ हर समय चिकनी पारदर्शिता को काटते हुए यहाँ-वहाँ रक्खे गए गमलों के पौधों का चिकना हरापन सुबह से शाम तक वहाँ की शाँति फिजा में दमकता रहता.

मांसटेरा की गोलाकार पत्तियों की सतह कमल की तर्ज पर अपने अंडाकार बनावट को छोड़ मानों गोलाई की ओर मुड़ना चाहती. हरे डंठलनुमा तने से एक-एक करके पत्ते निकलते. पहले वे लपेटे गए गोल मुलायम डंडे जैसे दिखते फिर शनैः शनैः एक-एक पत्ति खुलनी शुरु होती. नर्म हरेपन की छाँह में डूबी चिकनी सतह.

वाश्विता ने सभी गमलों को एक साथ देखा, वहाँ पौधों की अपनी दुनियाँ थी, उनका समाज था. छोटे-मोटे, ठिंगने, लंबे. बरामदे के मध्य में गोलाकार फर्श पर बेंत की कुर्सियों के तिरछे झुकाव बेत की गोलाईयों में डूबे हुए. धूप थोड़ी तिरछी होकर छत के मुड़े कोनों से अंदर झाँककर चुपचाप कुर्सियों की पीठ पर पसर गई थी. वहाँ पोर्टिको के खंभे से लेकर बेंत की कुर्सियों तक स्वर्ण रश्मियाँ अगले घंटों में अपना साम्राज्य फैलाने वाली थीं.

उन स्वर्ण रश्मियों के संग एक-एक जूही के पत्तों से एक-एक सूर्य किरण टकराएगी. कुछ किरणें तो सीधी निकल जाएगी, कुछेक परावर्तित हो इधर-उधर फैल जाएंगी और जूही की लतरों से घिरे मेहराब की ऊपरी गोलाई को बिना छुए हुए धूप का एक गुच्छा सीधा बरामदे की फर्श पर जा लोटेगा. फर्श की सीमेंटी सतह अंतिम किरण के रहने तक प्रकाशित रहेगी, फिर वहाँ एक कच्चा धुंधलका घिर आएगा.

‘‘मैं अंदर जा रहा हूँ.’’

स्वयंभू की आवाज़ गोल मेहराब के पीछे कुनमुना कर छिप गई, वाश्विता ने ड्राईगरुम के दरवाजे से अंदर जाती हुई उसकी आकृति को देखा.

वह स्वयं के आर्गन बजाने का समय था. उसकी एकमात्र बची-खुची हॉबी जिसे उसने एहतियात से संभाल समेट कर रक्खा था.

पिछले बरामदे में खुलने वाले अंदर के गोल कमरे में आर्गन लंबे स्टैंड पर रक्खा रहा करता, छुट्टियों के दिन ढलती शाम के पहले वाले घंटे में स्वयंभू के अंदर एक तलब जाग उठती. एक अनदेखी हवा की तह लहर की शक्ल में उसके बालों के सिरे को छूती, सभी बालों की जड़ें एक साथ सिमसिमा उठती. झुरझुरी की तह बाहों के बालों से लेकर समूची त्वचा पर सरसरा उठती, उसका पूरा ज़िस्म अलग किस्म की लालसा तले लरज उठता, वह जहाँ कहीं भी बैठा होता, बस उठ खड़ा होता.

‘‘एक्सक्यूज मी’’

मंत्रबिद्ध सा वह शाम की सपनीली हवा के संग अंदर के गोल कमरे की ओर चल पड़ता. आर्गन पर झुकी उसकी आकृति किसी यूनानीदेव की तरह नर्म धूप-छाँव के बीच खड़ी दिखती. कमर तक सीधी सतर खड़ी आकृति कंघों के पास से थोड़ी झुकी हुई. आर्गन बजाता हुआ वह किसी के पास नहीं होता उस समय वह स्वयं अपने पास भी नहीं रहा करता, वाश्विता ने कई बार इस सत्य को करीब से पहचाना था.

हवा में अनजानेपन की छुअन, धुनों की तेज़ सरगम के संग कौंधने लगतीं, स्वयंभू के अंदर का अजनबीपना वातावरण के ज़र्रे-ज़र्रे पर छा जाता. ऐसे में वाश्विता की इच्छा होती वह स्वयंभू के करीब जाए उसे छूकर महसूस करे.

‘‘मैं कपड़े की तरह शरीर बदल डालना चाहती हूँ.’’ वाश्विता के आवाज़ की गूंज स्वयंभू के पीछे-पीछे चुपके से गोल कमरे तक चली आई थी.

पिछले गोल बरामदे की ग्रिल के करीब खड़े होकर स्वयंभू ने पीछे पसरे बाग के खुले हिस्से को निहारा-अमरुद, नींबू, बेर के झुरमुट के नीचे मिट्टी में जड़ों के पास दिन रात पाइप लगा रहता, सुबह शाम नल आने के समय पानी स्वयं आगे बह-बहकर बीच की पूरी ज़मीन को गीला कर डालता वहाँ बिछी सूखी पत्तियाँ गीले कतरों को अपनी बेतरतीब परतों तले दुबका लेतीं, दूर खड़े नींबू अपनी जड़ों को पसारकर कतरा-कतरा पानी सोख लिया करते. मिट्टी द्वारा निथरी छनी हुई वे बूंदे चढ़ती-चढ़ती ऊपरी तनों तक चढ़ जाती और वाष्पित हो नींबुओं की हरी परत के नीचे छिप जाती.

कुछ पानी वहीं नीचे मिट्टी में पाइप के पास जमा रह जाता, छोटे डबरे की शक्ल में. हर दुपहर वहाँ बुलबुल, हुद-हुद और पंडुक नहाने आते. छोटी गौरेया ऊभ-डूब होक नहाती, बीच-बीच में पंखों को पसार कर धोती. मैना जब नहाती तो स्नान खत्म कर लेने के बाद भी देर तक उसके पंखों की साज संभाल चलती. चोंच घुमा-घुमाकर वह एक-एक पंख को संवारती, बीच-बीच में सिर को ख़ास लय में झटकती.

स्वयंभू ने ऊभ डूभ करके चिड़ियों को नहाते हुए देखा. इनमें से किसी भी चिड़े-चिड़ी को याद है अपना पूर्व जन्म?…

लेकिन वाश्विता तो चिड़ा-चिड़िया नहीं…

थोड़ा तो एहसास रहना ही चाहिए कि किन मुश्किलों से यह दुबारा मिले संग साथ का सफर शुरु हुआ है. उसकी अपनी माँ बार-बार उसके जन्म की बेतरतीबियों का जिक्र किया करती. ऐसे समय में उसके अंदर छिपा हुआ दैवी आश्चर्य वायुमंडल में फैल जाया करता. अंत-अंत तक बच्चे के जन्म के अजन्मे रह जाने की आशंका के विवरण को वे बार-बार दुहराती.

वाश्विता ने भी सुने हैं सारे विवरण, फिर भी वह शरीर बदलने की बात करती है?

अचानक स्वयंभू ने स्वयं अपने मन को बीते समय की परतों के बीच झिलमिली की नाई मन को विचरते हुए देखा. ग्रिल के बाहर बनती-बिगड़ती परछाइयों के बीच स्वप्ननुमा द्वीप उभर आए. वहाँ एक पूरा जन्म स्वप्न की नाई खड़ा हो गया.

बड़ी-बड़ी खिड़कियों वाले दालाननुमा कमरे के बीचों-बीच रक्खा हुआ बड़ा सा आबनूसी पलंग. कालीन की सतह को छूते झालरदार पलंगपोश के लेस लगे किनारे. उसी जहाज से पलंग पर तो लेटी थी वाश्विता. नहीं, नहीं, मादाम वारेन. बुढ़ापे से जर्जर शरीर के बीच जगमगाती वे आँखें अभी भी स्वयंभू के निकट आकर पूछती है.

‘‘शैल आय स्टे मोर?’’

बुढापे से झुकी कमर लिए कैप्टन वारेन उस शाम पूरे का पूरा पलंग की पट्टी पर झुक गया था.

‘‘ओह!माय डार्लिंग! माय…माय!’’ बीच के वर्षों को लाख तलाशने पर भी उनके बिंब करीब आने से पहले ही हवा की तरह परावर्तित हो जाते हैं.

बीच के खंड में न जाने कितने स्वप्नों की, कितने जन्मों की छाया है, हर स्वप्न को वह कायदे से तयशुदा खाने में सिलसिलेवार ढंग से रखना चाहता है, लेकिन यह हो नहीं पाता.

पिछले दो दशकों में हर पार्टी, हर जमघट के बीच उसका अकेलापन उसके साथ चलता रहा है. उसके मर्दाना सौंदर्य के कंघों पर टिका रहा है. उसे कुछ भी मोह न पाता था न लंबे सरु के वृक्ष से कद, न आकांक्षाओं से भरी निगाहें. एक कालखंड में दूसरों से नियत एक दूरी को साथ लिए हुए वह इस वर्तमान कालखंड में मंत्रबिद्ध देव सा विचरता रहता था. उसका अंतर्मन यह तो इंगित करता था कि ये नहीं, वो भी नहीं, लेकिन वास्तव में क्या? उसे क्या चाहिए था-यह हवा की किसी भी तह में मौजूद नहीं रहा करता था वहाँ उपस्थित रहती थी एक बैचेनी और ढेर सारे उलझनों भरे ऊन सरीखे गोले, जिनके बीच उसका मानस कैद रहा करता था.

लेकिन अनपेक्षित गंध की तरह वह शाम एक दिन उसके जीवन में आ गई थी.

गुलमुहर के गुच्छों से आसमान के कोने रंगे हुए थे. लाल नारंगी कौंध पुष्प बनी आकाश की चादर पर आयतन सरीखी पसरी पड़ी थी. डामर के सड़क की काली छाती जगह-जगह पुष्पों की पंखुरियों के भार तले उदभासित थी, लालिमा की प्रकाशित तरंगों के बीच सड़क अलग किस्म से आभामंडित थी.

उस शाम डिपार्टमेंटल स्टोर से मैकरोनी, मशरुम, टमाटर और चीज के पैकेट लेकर वह निकला था. वह कार के दरवाज़े को बंद कर चलने की तैयारी में था, उसने चाभी कार में घुमाई नहीं थी, स्टार्टर भी चुप था तभी स्टियरिंग के करीब झुककर एक प्रश्न ठिठक गया था.

‘‘डू यू नो मिस्टर करंजी ज प्लेस?’’

मिसेज वारेन की खनकती आवाज़ की गूज के बीच चौंका हुआ स्वयंभू कब दरवाज़ा खोलकर बाहर आया, कब तक पसीने से भींगे चेहरे पर रुमाल रगड़ता रहा था, याद नहीं. बीच-बीच में फंसी आवाज़ में वह लगातार दुहराता रहा था.

‘‘एक्सक्यूज मी, एक्सक्यूज मी’’

उस दौरान वाश्विता आश्चर्य से भरी हुई अपलक उसे निहारती खड़ी रही थी.

‘‘हैव आय डिस्टर्ब्ड यू एनी वे?’’

पिछले जन्म में सुनी हुई वह अदभुत सौंदर्यवती आवाज़ फिर से कभी अपने समस्त अनुगूंजों समेत उसके करीब गूंजेगी, स्वयंभू को अपने किसी भी स्वप्न के दौरान इस बात का भरोसा नहीं था.

‘‘प्लीज बी सीटेड. मैं उधर ही जा रहा हूँ, आपको छोड़ दूँगा.’’

उस शाम वह गाड़ी लेकर नहीं चला था, स्वयं उसे गाड़ी समेत लिए जा रहा था. आगे और आगे. कार दौड़ती रही थी, बिना वजह और आगे. दो किलोमीटर की जगह उसने भुलभुलैया से भरी सड़कों वाले उस शहर में लंबा रास्ता चुना था. तिहारे-चौराहों से भरी कालोनियों को उसकी गाड़ी ने बार-बार पार किया. तालाबों के बगल से वह बार-बार गुजरा, सड़क किनारे लगे वृक्ष उसके नजदीक आते-जाते एकदम से पीछे छूट जाते. जानबूझर वह पूरी शाम लंबे रास्तों पर गाड़ी दौड़ाता रहा था. वह वाश्विता को अपने से दूर नहीं होने देना चाहता था. मिसेज वारेन को फिर उसने पा लिया था.

घर ढूंढने के नाटक के बीच वाश्विता निश्चिंत बैठी रही थी. स्वयंभू को केप टाउन के उस विशाल कमरों वाले घर की याद आई जिसकी खिड़कियों और दरवाज़ों के बीच मात्र ढाई फुट की ऊँचाई का फर्क था. ऊँची दीवारों और चिकनी छतवाले कमरे, पोर्टिको के चौकोर खंभे नाइट लैंप के बीच भुतहे दीखते. लंबी ड्राइव के बीच घंटों वह ड्राइविंग सीट पर रहा करता और मादाम वारेन बैठी रहतीं मिस्टर वारेन की बगल में.

उस शाम ड्राइव करते हुए उसने धीरे से वाश्विता की ओर देखा था, अंडाकार चेहरे पर तनी हुई भवों के नीचे पुतलियाँ कुछ सोचती सी थीं. बाल कंधों को छूते कटे हुए नहीं थे लेकिन वे कंधे पर गुच्छों की शक्ल में अब भी टिके हुए थे.

शहर के बाहर निकलने वाले फ्लाइ ओव्हर के ऊपर से गुजरते हुए उसने पाया कि नीचे बहते ट्रैफिक का रेला पुल के सबसे लम्बे पायों के बीच चलता-चलता गुम हो जाता दीख पड़ता था और तब वहाँ नीचे बहती हुई सलेटी काली नदी के बहने का गुमान होता था, जो वहाँ थी ही नहीं.

स्टियरिंग पर टिकी हथेलियों से जुड़ी बाहों और पूरे शरीर के साथ बैठा वह कार चलाता रहा था, लेकिन उसका मन पिछले बिताए काल की ओर जोरों से दौड़ पड़ा था. मिस्टर व मिसेज वारेन के बिम्ब वहीं उस काल के बीच टिके खड़े थे. एक किस्म के जादुई आवेश की चौंकन तले घिरा वह पूरे रास्ते एकदम मौन रहा.

आखिरकार गंतव्य पर कार पहुँची थी-करंजी हाउस. वाश्विता उतरकर खिड़की के नजदीक आई थी.

‘‘थैंक्यू, मुझे बिलकुल नहीं लगा कि किसी अजनबी के साथ बैठी हूँ. बड़े लेक के पास की कालोनी में मेरा घर है, बंगला नं.210. कीप माय कार्ड.’’

स्वयंभू बिना कुछ कहे गाड़ी आगे बढ़ा ले गया था.

उस पूरी रात वह बिना वजह शहर की सड़कों पर गाड़ी के दौड़ते पहियों के साथ चला था. वह रात वैसी ही बितानी तय थी शायद. उस रात न तो वह अपने बीते हुए समय से ऊबर पा रहा था न ही बीता हुआ वक़्त उसे छोड़ने को तैयार था. बत्तियों की लंबी कतार विंडस्क्रीन पर उभरती एक,दो,तीन. अनगिनत चमचमाती चेतावनी —-

आसमान पर सलेटी नीलाहट के साथ ललाई के कतरे उतर आए थे तब उसे हल्की सी थकान ने नरमी से छुआ था. कार रोक वह वही उस सड़क के शुरुआती कदमों पर ठहर गया, थर्मस से निकाली गई काली काफी के गर्म घूंट उसके अंदर पूरब के आसमान की समस्त उजास भरते रहे थे. सुनहले रेशों में डूबी हल्की ललाहट.

उसने लंबी सड़क को उसके पूरे स्वरुप में देखा था अशोक के लंबे वृक्षों की कतार, उनके पीछे पसरा खेत, जिसके अंतिम किनारे की रेख ने स्वयं को पूरा तानकर क्षितिज की गोलाई के बीच घुल जाने के लिए छोड़ दिया था. उस सुबह भी वहाँ सूरज पहले अपने मस्तक के सबसे ऊपरी बिंदु में जड़ें सुनहले लाल हीरे की कनी को निकाल जगमगाया था.

प्रहरों पर छाया अनिश्चितता का आलम समाप्त हो चुका था. उतनी सुबह उसने अपनी गाड़ी बंगले नंबर 210 की ओर मोड़ दी थी, उसके अंदर वाश्विता की नींद से तुरंत जागी हुई आंखों को देख पाने की इच्छा जादू की तरह जागी थी.

अल्लसुबह वह उसके घर के आगे आ खड़ा हुआ था, घंटी बजाने पर स्वयं वाश्विता ने ही दरवाज़ा खोला था ‘मादाम वारेन’.

वाश्विता उसे देखकर बिल्कुल नहीं चौंकी थी. वह अंदर आकर चुपचाप सोफे पर बैठ गया था. घर की मालकिन चाय बनाने किचन में चली गई थी.

तब से आज तक वे एक दिन के लिए भी अलग नहीं हुए थे….स्वयंभू ने एक साथ बीते हुए सभी दिनों के बारे में सोचा था.

शाम की गंध कमरे में फैलने लगी. एकदम धीमे-धीमे, स्वयंभू ने पहले आर्गन पर मद्धम सुरों को साधने की चेष्टा की. फिर अचानक तेज सुर स्वयं उसके करीब आ गए.
‘‘कम टू मी…ओ …कम..अलोन…

धूप तिरछी होकर दीवार पर तैर उठी थी, गोलाकार बिंब एक दूसरे में उलझे हुए. उनके बीच पत्तों की छाया. पत्तों की छायाओं के बीच रोशनी के घेरों से निर्मित निरंतर प्रवाहित जादू. उथल-पुथल भरा जादू. कमरे के सन्नाटे ने ऊपर उठकर रोशनदान के शीशे को छुआ फिर पल्लों के तिरछे दरार से होकर बाहर निकल गया.

आज यह धुन क्यों?’’

वाश्विता के चेहरे पर पुराने दिन अनधुले रूप में चिपके खड़े थे.

नहाधोकर आई हुई दरवाज़े के फ्रेम में खड़ी वह किसी महारानी की तरह अपनी शानदार कत्थई पोशाक के बीच तनी खड़ी थी.

स्वयंभू डूबकर मुस्कुराया.

दो पंजे नजदीक आए और नजदीक.

छाती पर छिपटी कलाइयाँ और पीठ पर सलोने चेहरे का नर्म दबाव, ‘‘स्वाम्भो!सौमी!माय डार्लिंग!’’

स्वयंभू ने गहरी सांस खींची. मन में दुहराया, ‘‘नहीं. इस बार दोनों साथ जाएंगे. चाहे जहां भी.’’

***

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5 Comments

  • PRAN SHARMA says:

    ILA KUMAR KO UNKE SHUBH JANM DIWAS PAR DHERON BADHAAEEYAN
    AUR SHUBH KAMNAAYEN . VAH SAMARTH KAVYITRI V KAHANIKAR HAIN.

  • atamprakashkumar says:

    ila kumar ji ko un ke janamdin per bahut-bahut bdhai.mene yhan di hui sari kavitain padhi,ati uttam ,shbh kamnaen.

  • AK SINGH says:

    जन्म दिन पर हार्दिक शुभ कामनाएं इस अवसर पर जन्म दाता द्वारा प्रदत्त संसर्ग व आशीर्वाद के लिए, इला जी बधाई – अवधेश सिंह

  • मै नेपाल से हुँ । नेपाली भाषा मे लिखता हुँ । आपकी रचनाएँ अच्छी लगी । जन्म दिन की बहुत सारी शुभकामनाएँ । सृजनकर्म की सफलता की कामना करता हुँ ।

  • anupama saxena says:

    Happy B’ Day.

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