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भारतीय शिक्षानीति और समाज – इला कुमार


 इला कुमार   मानव इतिहास के आदिकाल से ही शिक्षा का विविध भांति सतत् विकास तथा विस्तार होता रहा है। प्रत्येक देश अपनी अनूठी सामाजिक तथा सांस्कृतिक पहचान की अभिव्यक्ति तथा संवृद्धि के लिए अपनी विशिष्ट शिक्षा प्रणाली विकसित करता रहा है। भारतवर्ष की मौजूदा स्थिति में यदि शिक्षा जैसे जाग्रत विषय पर नजर डाली जाए, तो हमें एक बार पूरे परिप्रेक्ष्य पर अपनी निरपेक्ष दृष्टि डालनी पड़ेगी यानि कि वैदिक काल (ई. पू. 2500) से होते हुए बौद्धकाल (1200 ई.) संधिकाल (1213ई.) मुस्लिम काल (1700 ई.) ब्रिटिशकाल (1947 ई.) तक के समय को शिक्षा के संदर्भ में परखना पड़ेगा।

सच है देशकाल के साथ-साथ शिक्षा ने भी एक लंबा सफर तय किया है और इस बीच पता नहीं कितनी शताब्दियां गुजर गईं। बात “ऋृग्वेद काल” से शुरू होकर “परमाणुयंत्र-काल” तक आ पहुँची है। यदि हम वास्तव में शिक्षा संबंधी तथ्य को पूरा जान लेना चाहते हैं तो हमें यह अवश्य देखना चाहिए कि हमने शुरूआत कहां से की थी और अभी के काल में वास्तव में हमें चाहिए क्या ?

इन सभी बातों पर एक संक्षिप्त दृष्टि डालते हुए यह जरूरी लगता है कि अपने अनुभवों के बल पर हम शिक्षा के सूक्ष्म विवेचनात्मक पहलुओं का विश्लेषण, अपने ढंग से करें और तब उचित नतीजों पर पहुँचें, और उसके बाद समाधानों की बात उठाएँ।

जैसा कि प्रमाणों में वर्णित तथ्यों द्वारा पता चलता है कि वैदिक काल में शिक्षा का मतलब था- शारीरिक, मानसिक तथा आध्यात्मिक तीनों दृष्टियों से व्यक्तित्व का अधिकतम समन्वित विकास तथा राष्ट्रीय आदर्शों के अनुरूप शिक्षार्थी के स्वस्थ चरित्र का निर्माण। इसके साथ ही सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक विकास तथा वैदिक साहित्य और आध्यात्मिक रहस्यों की रक्षा तथा उनका अगली पीढ़ी में संक्रमण। इसके साथ ही उस काल में अपनी परम्परा को जीवित रखने तथा उसे विकसित करने की महत्वाकांक्षा के मानसिक उत्पादन पर भी विशेष ध्यान दिया जाता था।

पुरातन शिक्षा प्रणाली की जो जानकारी श्रुतियों, स्मृतियों और इतिहास की पुस्तकों में बिखरी पड़ी हैं उसके आधार पर यही सिद्ध होता है कि उस काल की शिक्षा के ये कुछ उपर्युक्त ठोस उद्देश्य थे। और शायद स्वस्थ ढंग से सामाजिक स्थिरता के मूल कारण और तत्व भी यही थे। वैसे आज के आधुनिक युग में भी, कई शिक्षा शास्त्री सच्ची शिक्षा में कमोबेश इन्हीं तथ्यों को तलाशते हैं। राल्फ बारस्पेडी के शब्दों पर ध्यान दें तो यह बात कुछ ज्यादा साफ दीखती है- “शिक्षा का सर्वाधिक महत्वपूर्ण कार्य मानव को मानवता सिखाना है।”

व्यवहारिक स्तर पर हम पाते हैं कि एक उन्नत देश (अमेरिका, जापान) के पंद्रह-सोलह वर्षीय छात्र के सामने आगे के वर्ष उपार्जन के तमाम रास्तों के साथ सुंदर ढ़ग से आमंत्रण की मुद्रा में पड़े रहते हैं, वह जिस रास्ते को चाहे चुन ले और बीस-इक्कीस वर्ष की उम्र तक आते-आते चाहने पर वह एक सम्मानित तथा व्यवस्थित जीवन का अधिकारी बन बैठे। लेकिन यहां, स्वतंत्र भारत में, पन्द्रह-सोलह वर्ष के छात्र के सामने आगे के वर्ष सिर्फ कालेज में दाखिला लेने के आमंत्रण के साथ सुरसा की तरह मुंह फाड़े उसके भविष्य को, जिंदगी के सुनहले वर्षों को लील जाने को तैयार खड़े दीख पड़ते हैं। उन्नति करने के ख्याल से यहां भारत के छात्र कालेज रूपी ब्लैक होल में प्रविष्ट हो जाया करते हैं, चार-पांच वर्षों के पश्चात उत्तीर्ण होकर निकले व्यक्तियों मे से पांच प्रतिशत तो नौकरी पा जाते हैं, लेकिन बचे हुए पिचानवे प्रतिशत (95) के संत्रास को कौन नहीं जानता। यहां पर कोठारी कमीशन के द्वारा दी गई चेतावनियों और सुझावों की याद आती है, जो 1966 के बाद और नए कालेज नहीं खोलने के संदर्भ में दी गई थीं, बेरोजगारी को, अनगिनत खुलते जाते कालेजों की संख्या से जोड़ा गया था, शिक्षा के क्षेत्र में ”वर्क एक्सपीरियंस“ के महत्व को बताया गया था।

वास्तव में शिक्षा का प्रमुख लक्ष्य शिक्षार्थी का सामाजीकरण करना ही होना चाहिए। अर्थात् व्यक्ति को सामाजिक जीवन के लिए तैयार होने तथा उसमें समायोजित होने में उसकी सहायता करना ही शिक्षा का मूल उद्देश्य होना चाहिए। परंतु आज की शिक्षा प्रणाली (जिसकी हम खुद उपज हैं।) में शिक्षा के मुख्य लक्ष्यों, उद्देश्यों का कहीं नामों-निशान भी नहीं दीख पड़ता है। हम पाते है कि हर पीढ़ी को शिक्षा की जिस भूलभुलैया में चार वर्ष की उम्र में प्रविष्ट करा दिया जाता है वह उसे सामाजिक आर्थिक स्थिति से पूर्णतया पृथक करके मौजूदा शिक्षा पद्धति कुछ और ही पढ़ने-सीखने पर मजबूर करती है और ऐसे में शिक्षा के मूल तत्व लुप्त हो जाया करते हैं।

ऐसा क्यों हैं ? किसलिए है ? यह एक अलग किस्म की लंबी बहस का मुद्दा है परंतु सत्य यही है।

अगर आज के लाखों-करोड़ों युवाओं, प्रौढ़ों, प्रौढ़ाओं के व्यक्तिगत अनुभवों की बात की जाए (जिन्होंने अपनी जिंदगी के सुनहले वर्ष 18 से 22 तक की उम्र युनिवर्सिटी कैम्पस में पढ़कर बी. एस. सी., एम. एस. सी आदि की डिग्री पाने की खातिर बिताए हैं) तो उनका कहना है कि उनके द्वारा पढ़े गए विषय न तो उन्हें नौकरी दिला पाए, न ही सभी डिग्री धारकों के लिए किसी किस्म के उपार्जन का कारण बने।

कई बुरी तरह ठोकर खाए हुए व्यक्ति तो यहां तक स्वीकार करते हैं कि उन्हांेने यदि सिर्फ बारहवीं पास करके पढ़ाई छोड़ दी होती और चाट-पकौड़ों की दुकान खोल ली होती तो कम से कम कुछ ढंग का उपार्जन तो किया होता। सच है कि एम. एस. सी., बी. एस. सी. पास करने के बाद उनसे चाट-पकौड़ों की दुकान भी तो नहंी खोली जाती, कहीं न कहीं व्यर्थ किस्म के ज्ञान द्वारा पोषित अहंकार उन्हें रोक लिया करता है। ठीक इसी तर्ज पर कई गृहणियां, बहुएं अपना सर ठोंकतीं हुई नजर आती हैं- “काश हमने फिजिक्स, केमेस्ट्री की जगह होम साइंस पढ़ा होता या फिर कोई छोटा-मोटा डिप्लोमा ही ले लिया होता, कम से कम हम घर की साज-संभाल, बच्चे की देखभाल तो अच्छी तरह तो कर पातीं, या कोई छोटा मोटा उद्योग ही शुरू कर पातीं।”

सच है जब चौदह-चौदह घंटों की कठिन पढ़ाई करने वाली एक कुशाग्र विद्यार्थिनी अचानक शादी के बाद कुछ ऐसी-ऐसी समस्याओं के सामने खुद को रूबरू खड़ा पाती है जिनके बारे में उसका ज्ञान शून्य होता है और इतने सालों तक हासिल किया गया ज्ञान कहीं काम नहीं आता तो नई परिस्थिति जिस घने संत्रास को उपजाती है, उसे सिर्फ भुक्तभोगी ही समझ सकते हैं। लंबे समय तक तो यही समझ नहीं पड़ता कि क्लास में ज्यादातर सवालों का सही उत्तर देनेवाली वही बुद्धि सामाजिक बिंदुओं पर इस कदर कुुंठित कैसे हो गई। पढ़-लिखकर अपने पैरों पर खड़े होने का सपना कहां बिला गया।

सच तो यह है कि हमारी दूषित शिक्षा प्रणाली के कारण आज पूरा देश एक ऐसी भूल-भूलैया में अनायास प्रविष्ट हो चुका हैं, जिस अंधेरी सुरंग के अंतिम सिरे को मानों प्रथम अंधकारपूर्ण द्वार से कुटिलतापूर्वक जोड़ दिया गया है- षड़यंत्रित संरचना को जीवित बनाए रखने की लंबी साजिश।

और उसी अंधेरी, दोनों ओर से बंद सुरंग के अंदर समूचा भारत, जन-जन का गौरव, उनकी उन्नति उनका भविष्य मानों बंद पड़ा हैं बुद्धिजीवी वर्ग अच्छी तरह जानता है कि जबतक शिक्षा जगत पर छाए घनघोर अंधकार को हटाया नहीं जाएगा, वास्तविक प्रगति हमसे लगातार एक खास दूरी पर रहेगी, हमारी पहंुच से दूर।

ऐसा नहीं है कि शिक्षा प्रणाली की भयावहता को, उसके षड़यंत्रों को शिक्षाविद् मंत्री या जन साधारण समझते नहीं, लेकिन मुश्किल यह है कि पहला पत्थर कौन फेंके ? शीशे के घर में रहने वाले दूसरों पर पत्थर नहीं फेंका करते।

इन सभी उतार चढ़ाव पर से गुजरने के पश्चात यदि कहीं से थोड़ी रोशनी अपनी शिक्षा प्रणाली के पक्ष में मिलती दीख पाती हैं तो वह देश में प्रचलित इस पुरानी कहावत के बीच से झिलमिलाती हैं-

”उत्तम खेती, द्वितीय वाण्, निकृष्ट सेवा, भीख निदान“- सच है नौकरी यानी कि ”सेवा“ करना निकृष्ट काम ही वो हैं, लेकिन हमारी शिक्षा हमें सिर्फ इसी लायक बनाकर छोड़ती है। खेती और वाणिज्य की उत्कृष्टता को सराहकर, उसके महत्व को समझकर अमेरिका आज की तारीख में विश्व पर छाया हुआ हैं।

वास्तव में होना तो यह चाहिए कि शिक्षा के एक पहलू को समाज से तथा दूसरे पहलू को व्यक्ति से संबंधित होना चाहिए। सच तो यह है कि ये दोनों पक्ष यथार्थ के धरातल पर इतने संबंद्ध होते हैं कि इन्हें एक दूसरे से पृथक किया ही नहीं जा सकता। लेकिन कितने आश्चर्य की बात है कि भारतीय शिक्षा में इन मूलभूत तत्वों को ही अनुपस्थित कर दिया गया है। हमें ऐसी शिक्षा दी जाती है जो व्यवहारिक धरातल पर तो काम में नहीं ही आती उपार्जन वाले बिंदु पर भी हमें अंगूठा दिखा जाया करती है यानी कि “पढ़े फारसी बेचे तेल, देखो भई, किस्मत का खेल”- वाली कहावत बार-बार चरितार्थ होती है।

यदि यहां माग्रेटमीड के शब्दों को दुहराएं, तो कहना पड़ेगा कि “शिक्षा वह सांस्कृतिक प्रक्रिया है जिसके द्वारा प्रत्येक नवशिशु मानव, समाज का पूर्ण सदस्य बनता है”- सच है और कितना आश्चर्यजनक है कि ठीक इसी स्वर में तैत्तरीए उपनिषद में वर्णित शिक्षा संबंधी पुरातन मानदंड प्रतिध्वनित होते दीख पड़ते हैं। तैत्तरीय उपनिषद में संदर्भ आता है कि समावर्तन संस्कार के अनन्तर विद्यार्थी ‘स्नातक’ कहलाते थे और  दीक्षान्त समारोह मंे उन्हें अंतिम दीक्षा इन शब्दों में दी जाती थी-

“सदा सत्य बोलना। धर्म का आचरण करना। स्वाध्याय में प्रमाद मत करना। संतान और शिष्य परम्परा का लोप मत होने देना। अपनी सुरक्षा एवं कल्याण में प्रमाद मत करना। ऐश्वर्य प्राप्ति में प्रमाद मत करना। वृद्धजनों की सेवा में प्रमाद मत करना।”

दीक्षा की अंतिम पंक्तियां ये होती थीं-

“यही आदेश है। यही उपदेश है। यही वेदों का रहस्य है। यही अनुशासन है। ऐसा ही आचरण करना चाहिए।” और इन्हीं मान्यताओं के साथ वैदिक काल के स्नातक दीक्षांत समारोह से निकलते थे। विषय उन्होंने जो भी पढ़े हों, वेद-वेदांत, इतिहास या पुराण, व्याकरण या अंकशास्त्र, शकुन विद्या या भूगर्भ विद्या, वाकोवाक्य तर्क शास्त्र या क्षत्रविद्या, सैन्य विज्ञान, नक्षत्र विद्या, ज्योतिष शास्त्र या देवजन, शिल्प विद्या संगीत शास्त्र या आयुर्वेद शास्त्र, परंतु उपर्युक्त बातें सभी स्नातकों के लिए एक जैसी ही थीं और समाज में इन स्नातकों द्वारा प्रयोग में लाईभी जाती थीं, जिसके कारण उस समय के समाज में एक अलग किस्म की स्थिरता थी, अन्वेषणात्मक उत्सुकता थी, अध्यात्मिक ऊंचाईयां थीं।

पूर्ण शिक्षित स्त्रियांे को सभाओं में वेदांत चर्चा आदि करने की सुविधा प्राप्त थी, जैसा कि मैत्रेयी, गार्गी, मण्डन मिश्र की पत्नी आदि की विद्वतापूर्ण कथाओं से जाहिर होता है, साथ ही योगवाशिष्ठ में वर्णित लीला चूड़ाला आदि महान नारियों के ब्रह्मज्ञानी होने से परिलक्षित है।

यदि व्यवहारिक स्तर पर शिक्षा के सत्यों को आज के समय के अनुसार, कायदे से प्रतिपादित किया जाए तो कोई संदेह नहीं कि समाज का ढांचा ज्यादा व्यवस्थित, ज्यादा सकारात्मक हो सकता है। और यही तो शिक्षा का मूल ध्येय है। यानी कि मानव को मानवता सिखाना। यही व्यवस्था नामक तत्व मनुष्यों के हुजुम को समाज में बदल डालती है, वरना जंगलों में भी तो जीवित जीव जंतुओं और नरभक्षी आदिवासियों के समूह रहा करते हैं और बरसों बरस जीवित भी रहते हैं।

ऐसे में  शिक्षा के संदर्भ में जगद्गुरू शंकराचार्य कीे उद्घोषणा ”सा विधा या विमुक्तये“ की गंूज को आज के समय में बारबार उद्घोषित किया जाना चाहिए।   शिक्षा से संबंधित सूत्रों पर एक नजर डालने केक्रम में हमारी दृष्टि यशपाल कमीशन (1993),   कोठारी कमीशन (1966), राधाकृष्णन् कमीशन (1949), सैंडलर कमीशन (1919) से होती हुई हन्टर कमीशन (1883) तक जा पहुँचती हैं और तब धीरे से अट्ठारह सौ पैंतीस (1835) का     वर्ष अपनी पूरी ढिठाई के साथ हमारे सामने आ खड़ा होता है, लार्ड मैकाले द्वारा बनाई गई ”शिक्षा नीति“ के   कुरूप बिंब  एक बार  फिर वातावरण पर गहराते हैं।

”प्राच्य पाश्चात्य शिक्षा संघर्ष“ यानी कि सन्   अट्ठारह   सौ  तेरह (1813) से लेकर  अट्ठारह  सौ चौवन (1854) के बीचका संघर्ष काल।इसी संघर्ष काल के बीचांेबीच स्थितसन्  अट्ठारह सौ पैंतीस (1835) में शिक्षा नीति की घोषणा हुई थी। दो फरवरी (1835) के दिन लार्ड मैकाले ने अपना शिक्षा संबंधी विवरण पत्र गवर्नर जनरल विलियम बैंटिक को सौंपा था और  इसके तुरंत बाद ”नई अंग्रेजी शिक्षा नीति“ की घोषणा कर दी गई थी। कितने आश्चर्य की बात हैं कि आज पूरे एक सौ अड़सठ (168) वर्ष बीतने के पश्चात् भी हमारी शिक्षा नीति का मूल ढांचा वही है, जो उस समय किसी खास मकसद के तहत् गढ़ा गया था और वह मकसद था ब्रिटिश साम्राज्य को सुचारू रूप से चलाने के लिए अंग्रेजी पढ़े-लिखे भारतीयों की जरूरत।

यहां पर लार्ड मैकाले के उन शब्दों को एक बार फिर याद करना युक्तिसंगत होगा, जो उन्होंने उस समय शिक्षा के संदर्भ में कहे थे…………

”इस शिक्षा के द्वारा एक ऐसे समाज की सृष्टि होगी, जो हमारे तथा हमारी करोड़ों प्रजा के बीच विचार वाहक बनेंगे। इससे एक ऐसे वर्ग का निर्माण होगा जो रंग और रूप में भारतीय, परंतु विचारों, रूचियों, नैतिक आदर्शों तथा बुद्धि में अंग्रेज होगा।“

और हम, इस स्वतंत्र भारत के नागरिक, तबसे लेकर आज तक लगातार इस षड़यंत्रित चमत्कार के प्रत्यक्ष साक्षी हैं।

ऐसी दुरूह परिस्थितियों को यदि नकारना है,  उससे बाहर आना है तो शिक्षावल्ली/ तैत्तरिए उपनिषद् की इन ध्वनियों-प्रतिध्वनियों की अनवरत् आवृत्तियों को लगातार संग रखना पड़ेगा  –

सत्यात् न प्रमदितव्यम्

धर्मात् न प्रमदितव्यम्

कुशलात् न प्रमदितव्यम्

भूत्यै न प्रमदितव्यम्

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इला कुमार

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