मोल्डिंग सिस्टम — अलका सिन्हा बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ नीति आयोग की पहली बैठक 6 फरवरी भारत ने किया पृथ्वी-2 मिसाइल का सफल प्रायोगिक परीक्षण व्यक्ति पूजा को अनुचित नहीं मानता है राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ
दिव्या माथुर की कहानी : अंतिम तीन दिन अमेरिकी कोर्ट ने सोनिया गांधी से पासपोर्ट दिखाने को कहा अमेरिकी न्यायाधीश ने 1984 के दंगों पर आदेश सुरक्षित रखा यमन में डूबा जहाज, 12 भारतीय नाविक हुए लापता पंजाबी गायक शिंदा को लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड

हिंदी का ज्ञान बन गया है बाजार की शान – राजेन्द्र धोड़पकर


हिंदी मुहम्मद तुगलक के वक्त में भी भारत में मौजूद थी और औरंगजेब के वक्त भी।    साहित्य-संस्कृति को पैमाना बनाया जाए, तो यह दौर हिंदी का स्वर्ण युग था,   भक्तिकाल इसी बीच हुआ।   साथ ही इस बीच भारत में उद्योग-व्यापार में बड़ी तरक्की हुई।   भारत में व्यापार और बाजार की तरक्की हिंदी से सीधे-सीधे जुड़ी हुई है, कथित अंग्रेजी वर्चस्व के इस दौर में भी।   हिंदी के समकालीन चिंतन में बाजार को बड़ी बुरी चीज माना जाता है और कोई भी प्रगतिशील लेख पहले ही पैरा में बाजारवाद को दो-चार हाथ आजमाए बिना शुरू नहीं होता।  लेकिन हिंदी देश में इसलिए बची रही, क्योंकि किसी न किसी रूप में वह बाजार की भाषा थी।  दक्षिण, उत्तर, पूर्व, पश्चिम के व्यापारी आपसी बातचीत और सौदा करने के लिए हजारों साल से जो भाषा इस्तेमाल करते रहे हैं,  वह हिंदी का ही एक रूप है।  तीर्थयात्री, विद्वान, किसी और रोजगार की तलाश में जाने वाले लोग रास्ते में हिंदी इस्तेमाल करते रहे।  जिसे हम हिंदी कहते हैं, वह समूचे भारत की संपर्क भाषा है।

इन दिनों यह कहा जाता है  कि अंग्रेजी बाजार की भाषा है,  जबकि अंग्रेजी भारत के शासनकर्ताओं और नौकरशाहों की भाषा रही है।  जब तक भारत में सरकार नियंत्रित अर्थव्यवस्था रही, अंग्रेजी का वर्चस्व ज्यादा रहा।  जो क्षेत्र सरकारी नियंत्रण से बाहर थे, वहां हिंदी ही चलती थी।  पूरे भारत में चलने वाली मुंबइया फिल्में हमेशा हिंदी में बनीं।  जब सिर्फ दूरदर्शन था, तब उसमें अंग्रेजी को हिंदी के बराबर रखा गया।   टीवी का निजीकरण हुआ, तो अंग्रेजी हाशिये पर चली गई।    उदारीकरण के पहले हिंदी अखबार चार पन्नों के निकलते थे, सिनेमा हॉलों और सरकार के विज्ञापनों पर पलते थे, आज देश के पहले चार बड़े अखबार हिंदी के हैं, और पहले दस में सिर्फ एक अंग्रेजी का अखबार है।

भारत में आर्थिक उदारीकरण के बाद व्यापार-व्यवसाय को सचमुच बाजार की असलियत से रूबरू होना पड़ा। उसे महसूस हुआ कि यहां तो हिंदी ही चलती है।    पहले विज्ञापन सिर्फ अंग्रेजी में बनते थे, जिन्हें दक्षिण मुंबई के वे लोग ही बनाते थे। आज बड़ी विज्ञापन एजेंसियां हिंदी या अन्य भारतीय भाषाओं के ज्ञान को अनिवार्य योग्यता मानती हैं। मुंबई की विज्ञापनों की दुनिया में 25-30 साल पहले यह सोचना तक मुश्किल था कि ‘पांडे’ और ‘जोशी’ जैसे नामों वाले ‘भैया’ विज्ञापन की दुनिया पर राज करेंगे।   बाजार में हजारों बुराइयां हैं, लेकिन उसमें एक अच्छाई है कि उसमें एक ठोस और काफी हद तक क्रूर तर्क ‘मुनाफा’ चलता है।  इसकी वजह से इसमें काम करने वालों की सीधी जवाबदेही तय हो जाती है। नौकरशाही जैसी जो व्यवस्था बाजार के इस तर्क को नहीं मानती,  उसकी कोई जवाबदेही तय नहीं होती। ऐसा तंत्र ऐसी भाषा चला सकता है, जो उसके लिए फायदेमंद हो, आम लोगों के लिए नहीं।   कोई दुकानदार ऐसी भाषा बोले, जो ग्राहक नहीं समझता, तो उसका दीवाला पिट जाएगा।

साभारः हिंदुस्तान / प्रभासाक्षी

हिन्दी में राष्ट्रीय - अंतरराष्ट्रीय समाचार, लेख, भाषा - साहित्य एवं प्रवासी दुनिया से नि:शुल्क जुड़ाव के लिए
अपना ईमेल यहाँ भरें :

Leave a Reply