मोल्डिंग सिस्टम — अलका सिन्हा बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ नीति आयोग की पहली बैठक 6 फरवरी भारत ने किया पृथ्वी-2 मिसाइल का सफल प्रायोगिक परीक्षण व्यक्ति पूजा को अनुचित नहीं मानता है राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ
दिव्या माथुर की कहानी : अंतिम तीन दिन अमेरिकी कोर्ट ने सोनिया गांधी से पासपोर्ट दिखाने को कहा अमेरिकी न्यायाधीश ने 1984 के दंगों पर आदेश सुरक्षित रखा यमन में डूबा जहाज, 12 भारतीय नाविक हुए लापता पंजाबी गायक शिंदा को लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड

कुछ प्रश्न – इला कुमार


छठ पर्व की शाम में भारत की राजधानी दिल्ली की सड़के करीब है। यमुना के ऊपर बने आई.टी.ओ पुल पर से कार गुजरती है।

हम पीछे मंड़ी हाउस, सिकन्दरा रोड वगैरह छोड़कर आगे बड़े है और ऊँचा अकेला खड़ा विकास मीनार भी पीछे छूट गया है।

आई.टी.ओ. पुल गजब की भीड़ है बस,जीप कार, मोटर सायकल तो है ही पैदल चलने वालो की कतार-पर-कतार है।

इस भीड़ में ज्यादातर लोग छठ घाट जा रहे है वे सूर्य की पूजा करने और “सन्झिया अरक” देने जा रहे है यानि कि “सांझ का अर्घ्य” सूर्य देवता को अपर्ण करने।

जाग्रत भगवान की इस तरह की जानेवाली पूजा शायद केवल भारतीयों के बीच ही प्रचलित है, जिसका उत्स शायद बिहार में ही पाया जाता है। सुबह में फिर से पूजा की जाएगी “भोखा अरक”(भोर का अर्घ्य) दिया जाएगा। तब जाकर यह तपःपूर्ण आराधना पूर्ण होगी।

छठ की शाम में लोग भीड़ की शक्ल बनाते हुए आगे बढ़ रहे है… लोग सूमो, क्वालिस, कार, ट्रक, आदि वाहनों पर सूप, दउरा आदि लेकर जा रहे है। कई लोग जमीन पर आगे बढ़ रहे है। पीली धोती और बनियान पहने हुए तीस-चालीस वर्ष का एक भूमि छूता है तो ढीक पीछे चलते हुए उसके बीबी, बच्चे लुककर उसके पाँव छू लेते है।

पुरे फुटपाथ पर साष्टाग्डं की मुद्रा में बढ़ते हुए तीन- चार लोग है बाकि लोग थोड़ा हटकर पैदल चलते हुए दिख पड़ते है।  फुटपाथ पर भीड़ है। भीड़ सड़क पर भी है। लोग बढ़ रहे है, कारे, बसे सभी आगे बढ़ने के क्रम में है।

तभी अचानक कई स्कूटर, मोटर सायकल वाले फुटपाथ पर चढ़ जाते है, तेज घड़घड़ाहट और पाईप से निकलता धुवा और ट्रैफिक के नियमों को तोड़ने वाला एनैतिकता भरा व्यवहार मन को क्षोभ से भर देता है।

पूजा करने जाते लोग निश्चय ही एक किस्म की तपस्या के बीच है, भूखे प्यासे पैदल चलते लोगों की, जमीन छू-छूकर प्रणाम करते हुए जाते लोगों को अनदेखा करके ढुपहिया वाहन सवार पूरी निर्लज्जता पूर्वक फुटपाथ पर बढें चले जा रहे है। वहीं तीस-तीस फीट की दुरी पर खड़े खाकी वर्दीवाले चुप है, प्रतिक्रिया विहीन, मानो इस प्रकार के अनैतिक कार्यों को रोकना उनका काम है ही नहीं।

आगे बढ़ती हुई पैदल भीड़ मे सें या कार, बस, सभी,क्वालिस पर चढ़ी भीड़ में सें कोई भी पलटकर इस गलत कार्य को नहीं रोकता, वे सभी निर्द्वन्द हैं, प्रतिक्रिया विहीन।

मैं भी नही रुकती हूँ, पुलिसवाले से शिकायत नहीं करती। शायद मुझे इस बात का भरोसा नहीं है कि वह मेरी बात सुनकर कोई सकारात्मक कदम उढ़ाएगा। बल्कि अक्सर देखा जाता है कि शिकायतकर्ता को ही पुलिस मुश्किल में डाल दिया करती है।

हम सबों को, सभी देशवासियों को यह याद रहा करता है कि हम ऐसे देश में रह रहे है जहाँ ‘‘लॉ – आर्डर मेन्टेन’’ करने वाली पुलिस ड्युटी पर तैनात रहा करती है। हम वैसे देश में नहीं निवास कर रहे है जहाँ “वी सर्व, वी प्रोटेक्ट” का नियम निभानेवाली पुलिस काम करती है।

क्या यह हालत बदलनी चाहिए?

–इला कुमार

हिन्दी में राष्ट्रीय - अंतरराष्ट्रीय समाचार, लेख, भाषा - साहित्य एवं प्रवासी दुनिया से नि:शुल्क जुड़ाव के लिए
अपना ईमेल यहाँ भरें :

One Comment

  • हाँ यह हालत जरूर बदलनी चाहिए। इसका एक ही रास्ता है और वह है नैतिक शिक्षा। नैतिक शिक्षा पहली कक्षा से लेकर आखरी कक्षा तक एक अनिवार्य विषय के रूप में विद्यार्थियों को नैतिकतापूर्वक पढ़ाई एवं सिखायी जावे। तभी इस समस्या का पूर्ण रूपेण समाधान होगा। आज की शिक्षा पद्धति से इस प्रकार की शिक्षा लुप्त होती जा रही है और इसका परिणाम हमारे सामने हर जगह देखने को मिल रहा है।

Leave a Reply