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क्या भूलू क्या याद करू – शैल चतुर्वेदी


आस्ट्रेलिया से प्रवासी   संवेदना की एक भावनात्मक कविता

जल जल कर बुझ गए दिए सब तेरी आस लगाये

तू आया निर्मोही जब बिखरे है काले साए

योवन की हर ऋतू हंसती आती थी रोती जाए

तुझको पाने की आशाये धूमिल सी कर जाए
क्या भूलू क्या याद करू

यह उलझी हुई कहानी है
सूरज नहीं उगा जिस दिन से तेरी हुयी रवानी है
सोने की वो देह नहीं बस चांदी है अब बालो में
कितना हम तुम बदल गए है बिन देखे इन सालो में
कोयल की वोह कूक नहीं जो मेरे स्वर में गाती है
तेरे साजो की आवाज़े बस सपनो में आती है

आँखों में वो ज्योति नहीं जो पथ तुझको दिखलाती थी
हाथों में वो जोश नहीं जो थके पाँव सहलाती थी
साँसों में वो जोश नहीं हर मुश्किल हल कर जाती थी
पीपल का वो पेड़ जहां हम मिल कर रास रचाते थे
गांधी बनकर लौटेंगे फिर वो नारे लगवाते थे

माँ की लाठी टूट गयी और सूख रहे थे ताल यहाँ
वादे सब तू भूल गया और सींच रहा था बाग़ वहां
बरसो में तू आया है अब बैठ ज़रा कुछ बात करे
गंगा कैसी सूख गयी इस कथा व्यथा की बात करे
भटका हुआ सुबह का राही जब घर वापस आता है
भोर तभी होती है जब वोह ऊर्जा नयी जगाता है

तेरा अभिनन्दन करने को बंदनवार सजाई है
जिस मिट्टी में पला बढ़ा वो स्वागत करने आयी है
नयी फसल और नयी उम्र में ऊर्जा नयी जगानी है
तू जो वैभव देख रहा ये उगती हुयी जवानी है
तेरी मेरी बीत गयी अब इनकी बात बनानी है

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