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एक तरफ हो जा – इन्द्रा धीर वडेरा


इन्द्रा धीर वडेरा   कनाडा की निवासी श्रीमती इंदिरा धीर वडेरा लेखक, विचारक और चिंतक हैं। छोटी और सामान्य घटनाओँ से बड़े निष्कर्षों तक पहुंचना और चिंतन के महत्वपूर्ण बिंदु विकसित करना उनकी विशेषता है। ऐसे ही एक छोटे से वाक्य के इर्द गिर्द उन्होंने साधना के उपाय की खोज कर ली। आइए इस संवेदनशील विचारक के लेख का रसास्वादन करें।

प्रश्न :  (प्रश्न का हिंदी अनुवाद)  विचारों की भीड़ इतनी प्रबल है कि मन चुप ही नहीं होता; विचारों में उलझ अपनी आत्मा की ही सुन नहीं पाता हूँ! मौन घटित हो इसके लिए क्या किया जाए ?

–प्रोफ़ेसर चिन (कैनेडा)

इस बार भारत-यात्रा समय, महाराष्ट्र की सुप्रसिद्ध साध्वी सरलबाबर, जो देश भर में ध्यान-विशेषज्ञ समझी जातीहैं, उनके साथ तीर्थ-यात्रा का संयोग हुआ!   सफ़र का सबसे बड़ा लाभ यह है   कि वार्तालाप में क्रम-भंग नहीं होता !    इसलिए, सरलजी के विषय में विशेष रूप से जाना !

सरलजी के शब्दों का संक्षिप्त वर्णन किया जाए तो भाव कुछ इस तरह से था :

साधना  मार्ग  मेरे  लिए सरल न था,  बल्कि 6 महीने तो मन -की- हलचल ही मेरी साधना  थी !मन के दाँव–पेच,  भावनाओं की  चाल-बाजी… कुछ वर्ष तो मन को समझने में ही लगे !

सरलजी के जीवन का अपना अनुभव  इस बात की गवाही देता है कि आपके विचारों की भीड़ ही प्रबल  नहीं; लगभग हर एक साधक को अपने विचारों संग जूझना पड़ता है और स्पष्ट है कि पूर्ण-मौन भी आसानी से नहीं घटता !

प्रोफ़ेसर चिन,साधना अभ्यास एक अंतहीन प्रगति है;निराशा,“लेकिन, निराशा का बोध”भीइ सप् रकृया का हिस्सा है !मन के दाँव–पेच का एहसास और भावनाओं की चाल-बाजी का बोध, दोनों ही महत्वपूर्ण सबक हैं और आध्यात्मिक प्रगति की बुनियाद भी, जो मौलिक सत्य की झलक देते हुए हमें परम सत्य की ओर ले चलते हैं!

 प्रश्न :  (प्रश्नकाहिंदीअनुवाद)   विचारों, इच्छाओं, भावनाओं इत्यादि का प्रदूषण हो तो अपने ही विचारों को  देख लेना, उन्हें जान लेना मुश्किल है…आपने विचारों के प्रदूषण से छुट्कारा कैसे पाया ?

— पैट मैकडानल्ड(कैनेडा)

बिल्कुल ठीक कहा, …विचारों भावनाओं के प्रदूषण से कैसे बचा जाए ?

स्वामी रामतीर्थ के जीवन की एक घटना है कि एक सुबह, प्रोफ़ेसर तीर्थराम का ले जजा रहे थे!सब ओर धुंध छाई हुई थी !वह दूर तक नहीं देख पा रहे थे !चल रहे थे तो कहीं से कोई आवाज सी कानों को छूई; प्रोफ़ेसर समझ नहीं पाए, व्यस्त थे शायद,किसी सोच में !यह तो स्पष्ट था कि किसी की आवाज सुनाई दी, लेकिन उस आवाज ने क्या कहा, समझ नहीं पाए !

 स्वामी रामतीर्थ रुके, वातावरण धुंधला था, कुछ स्पष्ट दिखाई न दिया ! स्वामी जी आगे चलने लगे, अभी दो कदम भी नहीं चले कि किसी आवाज ने स्पष्ट शब्दों में उन्हें सचेत किया: “एक तरफ हो जा” !

 कुछ कदम आगे बढ़े तो जाना लंबा सा झाड़ू लिए  एक औरत सड़क साफ़ कर रही है! ‘झाड़ू से बिखरी धूल प्रोफ़ेसर की सफ़ेद पोशाक पर गन्दगी के धब्बे ना छोड़ जाए, इसलिए प्रोफ़ेसर को सावधान करवाना जरूरी समझा होगा !’फिर से बोली: “एक तरफ हो जा !”

प्रोफ़ेसर तीर्थराम एक तरफ हो लिए; अपने आपको और अपनी दूध सी सफ़ेद पोशाक को गंदा होने से बचा लिया !

स्वामी रामतीर्थ एक तरफ ही न हो लिए, इस छोटे से संकेत मात्र से सूक्ष्मदर्शी की अन्त श्चेतना जगी !

 स्वामी जी के जीवन की यह घटना, उसका दृष्य, दृष्य की प्राकृतिक-छटा, सर्दी का सा मौसम, ओस का धुंधला पन, सदय, विचार शील, और सजग औरत का सड़क साफ़ करना, और उसकी ओर से आ रहा, “एक तरफ हो जाने का संकेत”, यह सब एक चिराग बन कर मेरी समृति में उभर-उभर कर आया, मेरा मार्ग दर्शन करता हुआ इसका महत्वपूर्ण असर मेरे दिमाग में दृढ़ होने लगा, और स्वामी जी के प्रेरणा दायक पल का असर धीरे-धीरे मेरे पूरे जीवन में फलित हुआ !

धुँधला वातावरण, अस्पष्ट-दृष्य, उड़ रही धूल, बिखर रहा कूड़ा-करकट केवल वायु-मंडल में ही नहीं, ऐसी ही परिस्थिति हमारे अंदर भी घटित होती है !

पोशाक गंदी हो जाएगी, वदन पर धूल के कण आ गिरेंगे, किसी कारण हमें यह ना भी दिखाई देतो कोई और हमें इस सत्य से अवगत करवा देगा, लेकिन इच्छाओं के प्रलोभन, भावनाओं की धूल, सामाजिक स्थिति के आकर्षण, कुर्सी के लालच आदि विकारों से हमें कोई और सचेत नहीं करवा सकता इसके लिए तो स्वयं ही सावधान रहना होगा !

आज जब इच्छाओं की धूल मेरी ओर बढ़ रही होती है, तो अंतः करण बोल उठता है :

 “एक तरफ हो जा…,

“…इन चाहतों की धूल मन की शान्ति मैली कर देगी !…”

व्यक्तिगत स्वार्थ और उसकी प्रबल धार जब जब मेरी ओर सरक रहे होते हैं, तो अंदर से धीमी सी आवाज उभर आती है, “एक तरफ हो जा…,

कहने के अभिप्राय है, इस घटना ने मेरी आत्मा पर गहरी छाप छोड़ी, मेरी साधना को ही पुष्ट नहीं किया, मेरे जीवन को भी यू-टर्न दी !

 आज “एक तरफ हो जा,”मेरे लिए एक मन्त्र सामान है; मन में चल रहे तर्क-वितर्क जब केन्द्र से दूर ले जाने को बह कार हे होते हैं,तो उसी आवाज की समृति मुझे सावधान किए देती है !

 “मन तो यह धूल बाहर फैंक रहा है, और मैं अपनी विशुद्ध आत्मा पर इसकी धूल क्यों पड़ने दूं ?”यह आवाज एक गहरे तल से आती है, जिसने एक सारभूत तत्व जान लिया है !

 प्रोफ़ेसर चिन और पैट जी, समुद्र जिसे अपने आप में समाना नहीं चाहता, लहरों के माध्यम से उस कचरे को किनारे पर फैंक जाता है, इसी प्रकार हमारे मन में अक्सर कुछ ऐसा आ बैठता है, जो चेतन में विकार लाने की क्षमता रखता है, जिसे चेतन पचाना नहीं चाहता;  इस कचरे से अवगत करवाने के लिए  और “बाहर फैंकने के लिए ”चेतन इस कचरे को मन की ऊपर वाली तहों तक लाता है, और अनजाने में हम इस कचरे से जूझने लगते हैं, जबकि विचारों की भीड़,  संस्कारों का प्रदूषण, यह सब हमारा दृष्य धुंधला और दृष्टिकोण दूषित करने में समर् थहैं !एक तरफ हो जाना साक्षी भाव विकसित करने की एकमात्र युक्ति है जिससे चेतना दूषित होने से बची रहती है!

 टैगोर के शब्दों में छिपे सुन्दर भाव का हिन्दी अनुवाद करूँ तो अभिव्यक्ति कुछ यूँ है :

 “हम तो सरसराहट करते हुए पत्ते हैं, जिनके स्व रआंधी को भी उत्तर देते हैं, यह इतने चुप-चाप तुम कौन हो ?”

“मैं तो केवल एक फूल हूँ !”

 टैगोर उद्धृत करने का अभिप्राय यही है—

क्रोध,  रोष,  लोभ…सर सराहट करते हुए पत्ते… कोलाहल से भरा मन,  भावनाओं के उत्पात मात्र ही जानते हैं, और उसी संग जूझता है;  परिचित नहीं यह ख़ामोश आत्मा,  उसकी निस्तब्ध उपस्थिति  से…

 अतः जब हम एक तरफ हो जाने की युक्ति अपना लेते हैं तो अपने-आप संग सुखद रिश्ता बुनते हुए अपनी फूल सी कोमल आत्मिक संपत्ति की सुरक्षा करते चले जाते हैं !

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इन्द्रा धीर वडेरा

ekal.windsor@gmail.com

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