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महारत और महारथ – अजित वडनेरकर


अलग-अलग मूल से जन्में एक से शब्दों का भाषा में बर्ताव होता है। हिन्दी में महारत और महारथ दो ऐसे शब्द हैं जिनका प्रयोग आम हिन्दीभाषी बतौर कुशलता, प्रवीणता, दक्षता या निपुणता के पर्याय की तरह से करता है। महारत और महारत अपनी प्रकृति और व्युत्पत्ति के आधार पर दो नितान्त अलग अलग शब्द हैं मगर ध्वनिसाम्य के चलते भ्रमवश इनकी एक दूसरे से अर्थसाम्यता अनजाने में स्थापित होती चली गई। महारत फ़ारसी के ज़रिये हिन्दी में आया तो महारथ संस्कृत मूल का शब्द है । महारत-महारथ के पर्यायी प्रयोगों के मामले में नामीगिरामी लेखक-पत्रकारों की कलम भी बेपरवाह रही है । कुछ लोगों नें अनजाने में इन शब्दों का प्रयोग किया तो कुछ लोगों ने शुद्धतावादी आग्रह के चलते महारत को विदेशज मानते हुए बड़ी आसानी से इसका ध्वन्यार्थ महारथ में तलाश लिया ।

सबसे पहले ‘महारत’ की बात। मूल रूप से ‘महारत’ हिन्दी में बजरिया फ़ारसी आया और यह फ़ारसी का ही शब्द भी है, मगर इसके जन्मसूत्र सेमिटिक भाषाओं में छिपे हैं । ‘महारतट बना है सेमिटिक धातु म-ह-र से। हिब्रू, इजिप्शियन अरेबिक, आम्हारिक, अरबी, फ़ारसी, उर्दू आदि भाषाओं में इस धातु से बने कई शब्दों की व्याप्ति है । अरबी में इससे बनता है माहर जिसमें निष्णात, चतुर, ज्ञानी, विलक्षण, निपुण, प्रवीण, बुद्धिमान जैसे भाव हैं । हिब्रू और फ़ारसी में इसका ‘माहिरट रूप प्रचलित हुआ जिसमें तेज़, चतुर और कुशल का भाव है। हुनरमन्द होना भी माहिर होने की निशानी है । सीरियाई में इसका माहेर रूप है तो आम्हारिक में तेमारे जिसका अर्थ है सीखना। मूलतः म-ह-र धातु में सीखने, जानने का भाव ही प्रमुख है। माहर से बने माहिर की व्याप्ति जब फ़ारसी में हुई तो वहाँ अत् प्रत्यय लग कर इससे महारत शब्द बनाया गया जिसमें प्रावीण्य, कौशल, हुनर, गुणसम्पन्नता, दक्षता जैसे भाव उजागर होते हैं । माहिर संज्ञा है और व्यक्तिनाम भी होता है । हिब्रू में जहाँ इस धातु मूल में तेजी, चपलता का भाव है वहीं इथियोपिया में इसका अर्थ सीखना, सिखाना है । हिन्दी में ‘महारत’ से महारती शब्द भी बनता है जो मूलतः माहिर का हिन्दीकरण ही है । महारती का अर्थ हुआ कुशलता से काम करनेवाला । सम्भवतः इसे महारथी की तर्ज़ पर बनाया गया है। माहिर का भी यह अर्थ होता है।

हिन्दी का ‘महारथ’ शब्द तत्सम शब्दावली का हिस्सा है। महा + रथ से मिल कर यह बना है जिसका अर्थ हुआ बड़ी गाड़ी या रथ अथवा बड़ा योद्धा या नायक। गौर करें कि अरबी स्रोत से बने ‘महारतट शब्द की जो अर्थवत्ता है, संस्कृत के ‘महारथ’ में वैसा कोई भाव नहीं है। हिन्दी शब्द सागर के मुताबिक महारथ संज्ञा का अर्थ है बहुत भारी योद्धा जो अकेला दस हजार योद्धाऔं से लड़ सके । बहुत बड़ा रथ । विशाल रथ । आकांक्षा । मनोरथ । स्पष्ट है कि कुशल, चतुर, निष्णात जैसे भावों का यहाँ योद्धा के अर्थ में ही सन्दर्भ जुड़ता है। प्रवीण, निपुण जैसे स्वतंत्र अर्थ इस शब्द में नहीं हैं। महाभारत के शिशुपाल वध प्रसंग में महाभारत की परिभाषा बताई गई है जिसके मुताबिक “एको दशसहस्राणि योधयद्यस्तु धन्विनां शस्त्रशास्त्र प्रवीणश्च विज्ञेयः स महारथः” अर्थात महारथ वह है जो शस्त्र और शास्त्र दोनों में निपुण होता है। जो योद्धा दस हजार योद्धा धनुर्धारियों के साथ अकेला युद्ध करने में सक्षम, समर्थ हो, उसे ‘महारथ’ कहते हैं।

महारथ शब्द में क्षत्रियत्व के साथ ब्राह्मणत्व का समावेश भी है। योद्धा सिर्फ़ वही नहीं है जो शस्त्रास्त्रों के साथ युद्धभूमि में शौर्यप्रदर्शन करे। योद्धाओं में महारथ वह है जो नीति, कर्त्तव्य, सिद्धान्त आदि के शास्त्रीय पक्ष से भी अवगत हो तथा युद्धभूमि में इन शिक्षाओं का नीतिगत और व्यवहारगत परीक्षण करते हुए शूरवीरता दिखाए। सामान्यतः योद्धा सिर्फ़ शस्त्री होता है और विद्वान सिर्फ़ शास्त्री। मगर महाभारत के पंच पाण्ड इन तमाम अर्थों में शस्त्र और शास्त्रनिपुण थे। अर्थात वे महारथ हैं। उनके मुख में चारों वेद और पीठ पर शर सहित धनुष है। यह क्षत्रियत्व और ब्राह्मणत्व का संगम है। शत्रु जब सामने हो तो उसे शास्त्र के ज़रिये अर्थात वाक्चातुरी से पराजित किया जा सकता है। अगर इसमें विलम्ब हो रहा हो तो शरसंधान से उसे पराजित किया जा सकता है। दरअसल महाभारत का जो केन्द्रीय भाव है उसके मूल में महारथ का चरित्र ही है।

महाभारत में युद्ध के समय कौरवों और पाण्डवों के पक्ष में लड़ने वाले महारथियों का हवाला है। कौरव पक्ष के सात महारथी-द्रोण, कर्ण, कृपाचार्य, कृतवर्मा, अश्वत्थामा, शल्य और जयद्रथ। कौरवों के बारह महारथी-दुर्योधन, भीष्म, द्रोण, कर्ण, शल्य, भूरिश्रवा, अश्वत्थामा, कृतवर्मा, विकर्ण, कृपाचार्य, दुशासन और जयद्रथ। पाण्डवों के तेरह महारथी- अर्जुन, सात्यिकी, धृष्टद्युम्न, घटोत्कच, शिखण्डी, अभिमन्यु, भीम, नकुल, सहदेव, युधिष्ठिर, विराट, उत्तर और द्रुपद। पाण्डवों के अठारह महारथी-भीम, अर्जुन, सात्यिकी, विराट, द्रुपद, धृष्टकेतु, काशिराजस पुरुजित, कुंतिभोज, शैव्य युधामन्यु, उत्तमौजा, अभिमन्यु, प्रतिविन्ध्य, श्रुतसोम, श्रुतकीर्ति, शतानीक और श्रुतवर्मा। महाभारत परम नायक अर्जुन नहीं, कृष्ण हैं। उन्होंने युद्ध में शस्रास्त्र ग्रहण नहीं करने की प्रतिज्ञा की थी, इसलिए उनका नाम यहाँ नहीं है, अन्यथा उनसे बड़ा महारथ / महारथी कौन हुआ है?

नोट – अजित वडनेरकर के द्वारा लिखित सम्पूर्ण ब्लॉग ‘शब्दों का सफ़र’ पढ़ने के लिए कृपया यहां क्लिक करें।

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