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आर्य भाषा के उन्नायक महर्षि दयानंद – डॉ. मधु संधु


1  आर्य भाषा के उन्नायक महर्षि दयानंद – (1824 – 1884)

हिन्दी भाषा और  साहित्य  के  विकास  में महर्षि दयानंद  सरस्वती की  कोई प्रत्यक्ष देन नहीं है,  फिर भी हिन्दी के आज के स्वरूप और स्थान की बात करें तो इसे सशक्त और समर्थ  बनाने में उनका योगदान अप्रतिम है। महर्षि दयानंद सरस्वती समाज सुधारक, चिन्तक और विचारक थे। कवि या कथाकार नहीं थे। उन्होंने साहित्यकारों  की तरह कहानी,  उपन्यास, नाटक, एकांकी,  कविता आदि नहीं लिखे, स्वामी जी का समय रीतिकाल और आधुनिक काल के बीच का समय था।   तब भारतेन्दु और द्विवेदी युग आरम्भ हुए थे। रीति कालीन घोर श्रृंगारिकता के प्रति   तत्युगीन रचनाकारों की अनासक्ति  और सुधारवादी, नैतिकतावादी,  मूल्यवादी,  आदर्शवादी  कथ्य स्वामी जी के सामाजिक,  सांस्कृतिक,  शैक्षिक,  धार्मिक आंदोलनों का ही प्रभाव था। यह प्रभाव इतना सशक्त था कि स्वामी जी की मृत्यु के दशकों बाद भी साहित्यकार नायिका भेद, श्रृंगारिकता, अश्लीलता से परहेज करते रहे। रामधारी सिंह दिनकर लिखते हैं-

रीतिकाल के ठीक बाद वाले काल में  हिंदी भाषी क्षेत्र में जो सबसे बड़ी सांस्कृतिक घटना घटी, वह थी स्वामी दयानंद का पवित्रतावादी प्रचार। इस पवित्रतावादी प्रचार से घबरा कर द्विवेदीयुगीन कविगण नारी के कामिनी रूप से ऑंखें चुराने लगे। इस युग के कवियों को श्रृंगार की कविता लिखते समय यह प्रतीत होता था कि जैसे स्वामी जी पास ही खड़े सब कुछ देख रहे हों।

उस काल में कई प्रकार की शिक्षा पद्धति प्रचलित थी।

1 मदरसा पद्धति-जिसमें उर्दू का प्राधान्य था।

2 लार्ड मैकाले द्वारा 1935  में लागू की गई पद्धति- जो भारतियों के हृदय और मस्तिष्क को अंग्रेजियत में रंग रही थी।

3 पंडित मंडली द्वारा प्रचलित पाठशाला पद्धति-जिसमें वर्तमान और नवीन समय के लिए अनिवार्य ज्ञान-विज्ञान उपेक्षित थे।

ऐसे में स्वामी दयानंद ने पूर्वी और पश्चिमी पद्धतियों का सम्मिश्रण करते हुए शिक्षा की एंग्लो वैदिक पद्धति का सृजन किया।

स्वामी दयानंद सरस्वती गुजराती भाषी थे। उनके पिता वेदज्ञ थे। छोटी उम्र में ही मूलशंकर को वेद कंठस्थ थे। परम तपस्वी दंडी स्वामी विरजानंद जी के यहां मथुरा में 1860 से 1863 तक रह कर उन्होंने वेदों और पाणिनी के अष्टाध्यायी का गहन अध्ययन किया था। कलकत्ता में उनकी भेंट बंगाली भाषी केशवचंद्र सेन से हुई और उनकी प्रेरणा से स्वामी जी ने अपने लेखन और भाषण की भाषा हिंदी बना ली। उन्होंने इसे आर्यभाषा कहा और माना कि आर्यव्रत के प्रत्येक व्यक्ति को आर्यभाषा का ज्ञान होना चाहिए। देश की अखंडता के लिए उन्होंने गुजराती और संस्कृत पर आर्यभाषा को वरीयता दी। गुरू विरजानंद का आदेश पाकर स्वामी जी स्वभाषा, स्वदेश, स्वराज्य, स्वसंस्कृति, स्ववेश, स्वदेशोन्नति का अलख जगाने निकल पड़े। इसी उद्देश्य की प्राप्ति के लिए उन्होंने 1875 में मुम्बई में आर्यसमाज की स्थापना की। आर्य का अर्थ है श्रेष्ठ और प्रगतिशील और इस प्रकार आर्य समाज का अर्थ हुआ श्रेष्ठ और प्रगतिशील लोगों का समाज। मुम्बई से दिल्ली और फिर पंजाब पहुॅंचे। पंजाब में उनके विचारों का भव्य स्वागत हुआ। यहां आर्यसमाज की अनेक शाखाएं खुली और यह प्रांत आर्यसमाज का गढ़ बन गया।

यूॅं तो स्वामी जी की रचनाओं की संख्या तीन दर्जन के आसपास है , लेकिन सत्यार्थ प्रकाश आर्य समाज का आधार ग्रंथ है। उन्होंने देखा कि आर्य भाषा की पहुॅंच संस्कृत से कहीं अधिक है, इसी लिए इसकी रचना आर्य भाषा में ही की और पुस्तक के दूसरे संस्करण में इसे भाषागत अशुद्धियों से मुक्त करने का प्रयास भी किया। यानी स्वामी जी भषिक संरचना और वैयाकरणिक शुद्धता के प्रति एक भाषावेत्ता की तरह सजग और सचेत थे। शिरोल नामक एक विद्वान ने इसे ब्रिटिश सरकार की जड़ें खोखली करने वाला ग्रंथ कहा है।

हिन्दी भाषा और साहित्य को इस सुधारवादी धार्मिक नेता ने कई प्रकार से प्रभावित किया।

ऽ     हिन्दी भाषा के तत्समीकरण और संस्कृतिकरण पर स्वामी जी का ही प्रभाव है।

ऽ     उन्होंने इस भाषा को वाद-विवाद, खण्डन-मण्डन, शास्त्रार्थ के अनुकूल बनाया।

ऽ     तार्किकता के साथ-साथ इसे व्यंग्य और कटाक्ष की शक्ति से सम्पन्न किया।

ऽ     भारतेन्दु हरिश्चंद्र, राधा कृष्णदास, श्री निवास दास, प्रताप नारायण मिश्र, बालकृष्ण शर्मा नवीन जैसे साहित्यकार आर्यसमाजी नहीं थे , लेकिन उन्होंने वही विषय अपनाए , जिन्हें आर्य समाज आंदोलन अपनाए हुए था। जैसे इंिग्लश पढ़े तो बाबू होय, कंकड़ स्त्रोत।

ऽ     ऐसा लगता था, मानों यह लेखक आर्य समाज के प्लेटफार्म से बोल रहे हों। जैसे श्रद्धा राम फिल्लौरी का भाग्यवती, भारतेन्दु का भारत दुर्दशा, मैथिलीशरण गुप्त का भारत भारती आदि।

ऽ     उस काल में पद्म सिंह शर्मा, नात्थू राम शर्मा जैसे  अनेक आर्यसमाजी लेखक भी हुए।

ऽ     स्वामी दयानंद सरस्वती ने प्रत्येक आर्य के लिए आर्य भाषा का ज्ञान अनिवार्य ठहराया।

ऽ     आर्य समाज ने हिंदी को न केवल एकता के सूत्र में बांधने वाली कड़ी माना, अपितु इसे राष्ट्रीयता की संदेंश वाहिका भी बनाया। स्वामी श्रद्धानंद ने ंअमृतसर में होने वाले कांग्रेस अधिवेशन का स्वागत भाषण हिंदी मे पढ़कर इस भाषा की शक्ति का परिचय दिया। इससे पहले कांग्रेस के राष्ट्रीय मंच पर अंग्रेजी का ही बोलबाला था।

ऽ     1886 में लाहौर में प्रथम डी. ए. वी. स्कूल स्थापित किया गया।

ऽ     स्वामी श्रद्धानंद ने उर्दू में प्रकाशित होने वाले पत्र-पत्रिकाओं का देवनागरी में प्रकाशन आरम्भ किया।

ऽ     1898 में गुरुकुल प्रणाली का निर्णय लिया गया जिसका लक्ष्य मातृभाषा हिंदी को शिक्षा का माध्यम बनाना था। गुजरांवाला के बाद 1902 में स्वामी श्रद्धानंद ने 1200 बीघे के कांगड़ी ग्राम में गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय की स्थापना की, जिसे 1962 में डीमड विश्वविद्यालय का दर्जा मिला। यहां के अध्यापकों ने ही हिन्दी में विज्ञान की प्रथम पुस्तकें लिखी हैं।

ऽ     आर्य समाज की सफलताओं के कारण ही दक्षिण भारत में गांधी जी और राजगोपालाचार्य के यत्नों से हिन्दी प्रचार सभा की स्थापना हुई। राजगोपालाचार्य तो चाहते थे कि इस भाषा का नाम बदल कर स्वराज्य भाषा रख दिया जाए।

        स्वामी जी साहित्यकार नहीं थे, पर साहित्य उनके आंदोलन के मूल आदर्शों और उद्देश्यों को लेकर लिखा जा रहा था। रामधारीसिंह दिनकर ने उनके विचारों को पवित्रतावादी कहा है। ऐसा पवित्रतावाद जिसने श्रृंगारिकता और अति श्रृंगारिकता को समूल बुहार दिया। शिक्षा के क्षेत्रा में वे मध्यमार्गी थे। न पाठशालीय पद्धति उन्हें पसंद थी और न लार्ड मैकाले की अंग्रजी पद्धति और न मदरसों की शिक्षा शैली। उन्होंने ऐंग्लोवैदिक पद्धति का समर्थन किया।स्वामी जी पंडित थे, वेदज्ञ थे, संस्कृतज्ञ थे। उनके प्रभाव से पूरा द्विवेदी युग तत्सम मय हो गया। महावीर प्रसाद द्विवेदी जी की वैयाकरणिक सजगता उन्हीं की देन थी। उन्होंने आर्यव्रत की भाषा को आर्य भाषा नाम दिया और इसे राष्ट्रीयता की संदेशवाहिका बनाया। उन्होंने भाषा में वाद विवाद की, खण्डन मण्डन की शक्ति भरी। गुरूकुल के वैज्ञानिक विषयों के हिन्दी उत्प्रेरक वही थे। प्रचार के लिए न स्वामीजी विदेश गए और न अपनी पुस्तकों के अनुवाद की अनुमति दी। स्वभाषा, स्वदेश, स्वराज्य, स्वसंस्कृति ही उन्हें अभीष्ट थी।

कहते हैं-

                    मेरी आंखें तो उस दिन को देखने के लिए तरस रही हैं, जब काश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक सभी भारतीय एक ही भाषा बोलने समझने लगेंगें।

  आज अगर भारत सरकार/यू जी सी प्रत्येक विषय के अध्यापक की तरक्की के लिए पुस्तकों का हिन्दी अनुवाद अनिवार्य कर दे तो भारत का मस्तक भी चीन, जापान, रूस सा उन्नत हो सकता है।

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madhu_sd19@yahoo.co.in

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