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23 मार्च : शहीद दिवस के अवसर पर-रंग दे बसंती चोला-दिव्या माथुर


bhagt singh(भगत सिंह और उसकी माँ के बीच वार्तालाप)

‘मेरा रंग दे बसंती चोला,’

माँ से भगत सिंह बोला

तड़प के उसकी माँ बोली

लाल मेरे तू अभी न जा

‘टोलकी वज रही वेड़े विच

ते नचदे आंडे ग्वांडे ने

कुड़ी हल्दी लाके राह तके

व्याह ते तू हो जाने दे,’

‘जलियाँ वाला बाग का बदला

खून से गोरों के लूँगा

तू तेल चोएगी शांति का

मैं क्रांति के फेरे लूँगा’

‘वच्चयां दे दुद विच गोरां ने

की सोंच ज़हर है कोला

गोलियां बंदूकां छड्ड काक्के

मुरमुरां तो पर लै झोला,’

‘लाजपत सा था जिसका बेटा

माँ, तड़प रही है उसकी माँ

यदि मुझे किसी ने मार दिया

तू उसे माफ़ कर देगी क्या?’

‘गांदीजी दी गल्ल सुन पुत्रा

इन जंगा विच कोई नहीं वचा

वदले दि अग्ग नु दे तू बुझा

ए करेगी सारा देश तब्बाह,’

‘विदेशी वस्त्रों की होली जला

चल फूंक मशालें हमारे लिए

फिर देख बसंती चोलों पर

चमकेगा खून अँगारे लिए,’

‘गोरों दा दीन-ईमान नहीं

तोपा ते तैन्नु देंगे उड़ा

मार काट साड्डा तरम नईं

रब तों ते डर मेरे पुत्रा,’

‘मुझे किसी का खौफ़ नहीं

न गोरों का और न रब का

मृत्यु के बाद मेरे विचार

माँ, जिंदा रहेंगे सदा सदा,

फ़ख्र कर, माँ, फ़िक्र न कर

हम कफ़न बाँधकर निकले हैं

राजगुरु सुखदेव से लाखों

इस संग्राम में सैनिक हैं,’

अक्षत की जगह आँसु छिड़के

और खुन से माँ ने टीका किया

‘पैरी पौना’ कहकर माँ से

वीर भगत सिंह निकल पड़ा

इंकलाब और जिंदाबाद

कहकर उसने बम फेंक दिये

व्यवधान यह केवल नाटक था

न मरे कोई न ही ज़ख़्मी हुए

बेइंसाफी के खिलाफ़

सरदार भगतसिंह नहीं झुका

उसके तो दिलो-दिमाग़ में बस

गोरों पर क्रोध था धधक रहा

सौंडर्स की हत्या का भी जुर्म

उसने ही स्वयं कुबूल किया

और देश के ज़र्रे ज़र्रे में

मुक्ति का मंत्र ज्यूँ फूँक दिया

‘इंकलाब और जिंदाबाद

मैं रहूँगा देश आज़ाद करा,’

वह नारे लगाते थका नहीं

फाँसी पर हँसते हँसते चढ़ा।

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