मोल्डिंग सिस्टम — अलका सिन्हा बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ नीति आयोग की पहली बैठक 6 फरवरी भारत ने किया पृथ्वी-2 मिसाइल का सफल प्रायोगिक परीक्षण व्यक्ति पूजा को अनुचित नहीं मानता है राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ
दिव्या माथुर की कहानी : अंतिम तीन दिन अमेरिकी कोर्ट ने सोनिया गांधी से पासपोर्ट दिखाने को कहा अमेरिकी न्यायाधीश ने 1984 के दंगों पर आदेश सुरक्षित रखा यमन में डूबा जहाज, 12 भारतीय नाविक हुए लापता पंजाबी गायक शिंदा को लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड

आध्यात्मिक कविताएं- मृदुल कीर्ति


Mridul-Kirti

(अाध्यात्मिक जीवन के सत्यों , विचार बिदुओं को काव्य संवेदना में पिरो कर विचारों की ऋंखला बनाते हुए कविताओं की रचना डा मृदुल कीर्ति की एक प्रमुख विशेषता है। उनकी मुक्त छंद की कविताएं भी श्लोक या मंत्र की तरह हैं जो किसी न किसी आध्यात्मि्क सत्य का आविष्कार करती हैं। प्रस्तुत है ऐसी ही संवेदना औरआध्यात्म से रची -पगी तीन कविताएं)

अब उठो कुण्ठा  बुहारो

शक्ति के आँगन में तुलसी दीप चौबारे में बारो

ज्ञान की इस अलसुबह में,  आरती का स्वर उबारो,

अब उठो कुण्ठा बुहारो।

रात की अब तह बना दो, विगत को चादर उढ़ा दो,

प्रात की गाओ प्रभाती,  उदित रवि को जल चढ़ा दो।

अब उठो कुण्ठा बुहारो।

विगत से बस सीख लेकर, सत्य परिपाटी बना दो,

ज्ञान की इस शृंखला  में, गीत नव नूतन उचारो।

अब उठो कुंठा बुहारो।

अरुणिमा आते ही देखो , विहग वृन्द उड़ान भरते,

 शक्ति पंखों में समेटे ,      नाप लेते दिशा चारों .

अब उठो कुंठा बुहारो।

प्रगति  कोई उच्च साधो, मुट्ठियों में लक्ष्य बाँधो ,

मन को अर्जुन सा बना कर, तीव्र गति सा तीर मारो।

अब उठो कुंठा बुहारो।

उदित रवि को सर नवा लो, प्रकृति को गुरुवर बनालो,

प्रकृति के कण- तृण सकल, महिम अति आरती उतारो।

अब उठो कुंठा बुहारो।

*****

मृग तृष्णा

तप्त भूमि, तृषित मन, तप्त तन

तृप्ति के लिए

दूर-दूर तक पानी देखती दृष्टि।

एक मन,  एक चित्त, एक टक ,

दूरी को चीरती, अपलक।

एकमेव पानी —–

अहा! वह रहा पानी

पूरे मनोयोग से भागते पाँव,

क्योंकि प्यास को पानी तक जाना है ,

तृष्णा को तृप्ति तक जाना है।

कहाँ?

वहाँ तो जमीन तक गीली नहीं।

क्या तुम?

तुम्हारी तपन

तुम्हारी आसक्ति

तुम्हारी प्यास

तुम्हारी तृष्णा

यही तो नहीं कि

जमीन तक गीली नहीं।

किन्तु

 तुम्हारी दौड़ अगली और अगली

मृग तृष्णा तक

कहाँ तक जायेगी ?

तुम्हें उस सूखी जमीन का

बार-बार विश्वास नहीं।

कितने जन्मों भ्रम

मृग मरीचिका कितने जन्मों तक

कब तक भागोगे ?

कब विश्वास करोगे कि

कि वहाँ जमीन तक गीली नहीं।

लेकिन दौड़ सतत है

. सुनो —

अतृप्त सदा उदास रहता है

और

उदास व्यक्ति कभी शांत नहीं हो सकता

और

शांत कभी उदास नहीं हो सकता।

*****

गुलाब

हे नाथ!

तुम मुझे सदा तीखा

परवेश ही क्यों देते हो?

कदाचित उसमें छुपे

 सहारे का सन्देश देते हो .

तुम मुझे सदा गुलाब

ही बनाते हो।

इसीलिये तो काँटों के

सर पर बिठाते हो।

*****

बूँद और सागर

सागर का किनारा

प्रकृति  के रहस्यों का पसारा

अगाध, अनंत, असीम, अपार

लहरों का गर्जन, तर्जन , नर्तन और चीत्कार

ऊपर व्योम के आँगन में कुलाँचे

भरते घन शावक।

मेरे सामने के पेड़ के कोमल पात पर

एक बूँद का गिरना मोती  सा चमकना .

एक बूँद ——

तृप्ति का संकेत

प्यास और तृप्ति के दो सिरे

एक बूँद ही सही किन्तु  मही

क्योकि

सागर बूँद-बूँद से बना है,

सागर से बूँद नहीं।

बूँद सागर का बीज है,

कोंपल के कोने पर पड़ी

अपने रूप गुण पर आसक्त

गर्वीले सागर की लहरें

एक बूँद का अस्तिव न सह सकीं

ठीक ही है किसी की सत्ता कोई  सहता नहीं

क्योंकि अहम् तो सागर से भी बड़ा है

एक बूँद और मिटाने को  विशाल लहरें।

सागर रत्न गर्भा है

किन्तु रत्नों से प्यास नहीं बुझती,

बूँद तृप्ति गर्भा है

सागर को मेरी तृप्ति नहीं रुचती।

एक बूँद ही थी, प्रसन्न थी,

सागर से मिलकर क्या मिला?

मिठास भी खो बैठी,

तृप्ति भी खो बैठी,

अस्तित्व भी खो बैठी ,

प्यास का खारा  समंदर

ऐसे विस्तार का क्या करना ?

जो काम ही ना आये।

ऐसे प्रसार का क्या करना ?

जो नाप ही ना पाये ?

ऐसी जल निधि का क्या करना?

जो प्यास ना बुझाये।

एक बूँद ही थी किन्तु समर्थ थी

प्यास में तृप्ति की सामर्थ्य थी

अब अपना अस्तित्व भी खो बैठी

कितनी असमर्थ थी।

सोचती हूँ

मैं अकिंचन ही भली थी

अंश तृप्ति का लिए

जलधि से मिलने की  मेरी

 कोई  भी न चाह थी।

*****

mridulkirti@gmail.com

हिन्दी में राष्ट्रीय - अंतरराष्ट्रीय समाचार, लेख, भाषा - साहित्य एवं प्रवासी दुनिया से नि:शुल्क जुड़ाव के लिए
अपना ईमेल यहाँ भरें :

3 Comments

  • dr.vedvyathit says:

    aadr ke sath aadhyatm ka nma le kr kuchh bhikh dena aadhyatm nhi hota in me aadhyatm khan hain ? aadhyatm me aavrn to hai hi nhi apitu aadhyatm is ka nivarn krta hai

  • mridul krti says:

    आध्यात्म, बृहत अर्थों में स्वयं की वृत्तियों का अध्ययन और सात्विकता की ओर वृत्तिओं को ले जाने का ज्ञान है. जिसने आत्म को जान लिया उसका संसार स्वयं छूट जाता है.क्रमशः देखें
    कुण्ठा
    प्रकृति के उपादानों से प्रेरित होकर व्यर्थ विकारों को छोड़ सार्थक विचारों का सन्देश है, अवसाद नहीं प्रकृति का प्रसाद लो.
    मृगतृष्णा –माया और अतृप्ति —-जिसमें ‘मा गृधा’ का संकेत है। जो अतृप्त है वही उदास है, शांत कभी उदास नहीं होता .
    गुलाब
    कष्ट परिमार्जित करते है।
    बूँद और सागर
    अहंकार और तृप्ति का विश्लेषण है

  • om sapra says:

    dr. ved vayathi ji ne sahi kaha hai-
    par in kavitoyon ki khoobi yeh hai ke wo hame chintan ki aur prerit karti hai,

    ata: kafi achha prayas hai-
    badhai aur saadhu vad sweekar akren
    saadar
    -om sapra
    delhi-9
    m- 9818180932
    omsapra@gmail.com

Leave a Reply to om sapra