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मनरेगा घोटाले में कुछ और पूर्व मंत्रियों को लपेटने की तैयारी


MANREGA Scamलखनऊ ,जून १० : प्रदेश के 17 जिलों में मनरेगा के तहत अनियमितताओं की जांच के दौरान आर्थिक अपराध शाखा के तत्कालीन एडीजी ए.एल. बनर्जी ने मिजार्पुर जिले की जांच रिपोर्ट उच्च न्यायालय को सौंपी। अदालत ने 26 अप्रैल को इस जांच को अपर्याप्त बताया था। अदालत ने अपने निदेर्शो में कहा कि एजेंसी सभी जिलों में समान बिंदुओं पर जांच करें।
उच्च न्यायालय के निर्देश के बाद बड़े अफसरों ने मनरेगा घोटाले की जांच की समीक्षा में पाया कि कई जरूरी बिंदुओं की जांच में पड़ताल ही नहीं हुई है। इसके बाद ईओडब्ल्यू के एडीजी सुब्रत त्रिपाठी ने 40 बिंदुओं पर फिर जांच करने के निर्देश दिए हैं। इसमें मनरेगा क्रियान्यन के दौरान शासन से लेकर जिले स्तर तक के हर अधिकारी द्वारा की गई कार्रवाई, अधिकारियों की जिम्मेदारी और नतीजों की समीक्षा की जा रही है।
सीडीओ दफ्तर से लेकर ग्राम पंचायतों तक कार्रवाई व दिशा-निर्देशों की फाइलें व रजिस्टरों को कब्जे में लेने के आदेश दिए गए हैं। एडीजी ने कहा कि गोपनीय सूचनाओं से पता चला है कि ग्राम प्रधान, ग्राम विकास अधिकारी से लेकर उच्च स्तर तक कमीशनबाजी होती थी। रजिस्टर में दर्ज तथ्य सत्यता से परे होते थे। प्रशिक्षण व रोजगार पाने वालों की दस्तावेजी संख्या हकीकत में कुछ और होती थी।
उच्च न्यायालय ने ईओडब्ल्यू की रिपोर्ट पर सवालिया निशान लगाते हुए पूछा है कि बड़े पैमाने पर धांधली में सिर्फ छोटे अफसरों की जिम्मेदारी तय कर बड़ों को क्यों बचाया गया? बदले हालात में मनरेगा जांच का दायरा तत्कालीन ग्राम्य विकास मंत्री दद्दू प्रसाद और कृषि शिक्षा व कृषि अनुसंधान मंत्री राजपाल त्यागी तक पहुंचने के आसार बन गए हैं। जांच की आंच पूर्व मुख्यमंत्री मायावती तक भी पहुंच सकती है।
इसके अलावा कई जिलों के डीएम, सीडीओ व मनरेगा से जुड़े अन्य आला अफसर भी जांच के दायरे में आ रहे हैं।
महिला मजदूरों के बच्चों के पालनाघर के नाम पर एक करोड़ खिलौने, 1.09 करोड़ के टेंट, 50 लाख की पानी टंकी, दो करोड़ के फावड़े, तसला व गैंती की फर्जी खरीद हुई। ज्यादातर खरीद उप्र उपभोक्ता सहकारी संघ लिमिटेड ने बिना टेंडर के की। प्रदेश सरकार ने स्पष्ट किया कि यह संस्था सरकारी नहीं, निजी है। 2008-09 में लखनऊ की फर्म से 51 लाख रुपये के टेंट खरीदे गए और 50 लाख का भुगतान भी हो गया। इस फर्म को अभी तक खोजा नहीं जा सका है। जांच में टेंट भी नहीं मिले।
अफसरों ने खरीद का ठीकरा 140 ग्राम सभाओं पर मढ़ा है लेकिन इस पर पेंच फंसा है कि सभी ग्राम सभाओं ने इसी फर्म से खरीद का फैसला कैसे कर लिया। मनरेगा फंड से डेढ़ लाख रुपये के कैलेंडर, 80 लाख के टेंट और सात लाख के फस्र्ट-एड बॉक्स खरीद लिए गए। छह लाख की पानी की टंकी खरीदी गई। जांच टीम ने पाया कि यह सामान भी पंचायतों को नहीं मिला।
राज्यस्तरीय क्वालिटी मॉनिटर की जांच में पता चला कि कई पंचायतों ने राजेश नाम के एक व्यक्ति को 50 लाख रुपये तक के चेक बांट दिए। जांच अधिकारी ने मामले की जांच सीबी-सीआईडी या किसी अन्य संस्था से कराने को कहा है ।

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