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मोल्डिंग सिस्टम — अलका सिन्हा


रंजन का फोन आया था। खुशी से चहकते हुए उसने बताया कि वह थाइलैंड गया था और ताइक्वांडो में उसने थाइलैंड को हराकर सिल्वर मेडल जीता था।

“गोल्ड क्यों नहीं?” मीठे उलाहने से मैंने पूछा था।

“ये तो पहला मौका था भाभी, दिसंबर में चीन के साथ मैच है, तब गोल्ड मारूंगा।” उसकी आवाज का आत्मविश्वास मुझे गौरवान्वित कर रहा था।

रंजन मेरी चचेरी सास का बेटा है। ये लोग दिल्ली में रहते हैं। वैसे मेरी ससुराल पटना में है, जहां मेरे ससुर अपने दो अन्य  भाइयों सहित रहते हैं। इन परिवारों में कोई भेदभाव नहीं है। नई-नई ब्याहकर आई तो सबकी प्रिय भाभी बन गई। मुझे भरपूर प्यार मिला।

एक बार रंजन नींबू की चाय बना लाया, “अरे भाभी, इसे पीयेंगी तो सब स्वाद भूल जायेंगी।’’ चाय सचमुच अच्छी बनी थी। मैंने तारीफ क्या की, वह रोज चाय पिलाता रहा, ननदें रोज नए-नए व्यंजन बनाकर मुझे अधिक-से-अधिक खिलाने की होड़ में लगी रहीं। नतीजा यह निकला कि भयंकर गर्मी में लगातार की पावर कट के बावजूद मैंने अपनी छुट्टी एक हफ्ता और आगे बढ़ा दी। हनीमून मनाने भी हम कहीं नहीं गए। इतना सुखद वातावरण छोड़कर कहां जाते।

 चचेरी सास की छोटी बेटी हर वक्त मेरे साथ रहती। जैसे ही बिजली जाती, वह झट पंखा झलने लगती। मैं उसके नन्हें हाथों को चूम लेती, “बस करो, थक जाओगी।” मगर वह नहीं थकती। मैं कभी सोच भी नहीं सकती थी कि संयुक्त परिवार का क्या मतलब होता है। मेरे दफ्तर की सहकर्मियों ने ससुराल का जो चित्र उकेरा था कि मैं ससुराल के नाम से ही भयभीत हो जाती थी। जब मुझे पता चला था कि लड़का दिल्ली में नौकरी करता है, लिहाजा वो वहां अकेला रहेगा तो मुझे बड़ी राहत महसूस हुई थी। मगर जब ब्याह के बाद पहली बार ससुराल में रुकी तो तस्वीरें बिलकुल ही बदल गईं। शुरू में तो लगा, जरूर मेरे खिलाफ कोई साजिश चल रही है। किसी अनजान लड़की को कोई कैसे इतना प्यार दे सकता है। इसमें जरूर इनकी कोई चाल होगी, एकाध रोज में कहेंगे – जाओ अपने मायके से पांच लाख रुपये ले आओ, या फिर, अपने पापा से कहो कि मेरे बेटे को गाड़ी खरीद दें। मगर ऐसा कुछ नहीं हुआ। उनके प्यार में बस प्यार था, बिना किसी मिलावट के।

रंजन ने इस वर्ष बारहवीं की परीक्षा दी थी, मगर उसकी रुचि पढ़ाई से अधिक ताइक्वांडो में थी। वह मार्शल-आर्ट्स में ही कुछ करना चाहता था। उसकी अंतरराष्ट्रीय स्तर की यह विजय उसके सपनों का मार्ग प्रशस्त कर रही थी। मैं उसकी इस प्रतिभा से अभी तक अपरिचित थी। परिवार में सदा उसके न पढ़ने की ही चर्चा होती थी। उसके इस रूप का तो मुझे आज ही पता चला था। मेरे लिए यह इतनी बड़ी खुशी थी कि मैं विश्वास नहीं कर पा रही थी कि हमारे परिवार का भी कोई बच्चा इतनी बड़ी जीत हासिल कर सकता है। मैंने उसे इतवार को घर आने का निमंत्रण दिया ताकि हम इस जीत का जश्न मना सकें।

अपना मेडल, अखबार की कटिंग्स और फोटो वगैरह लिए रंजन तफसील से वहां की कहानी बता रहा था। कितने देशों ने इसमें हिस्सा लिया था, इस खेल में कितना जोखिम है और इसे कैसे खेला जाता है|

“भाभी, इसमें आवाज का बड़ा महत्व होता है। साउंड प्वाइंट के साथ ही हिट करना होता है – योइ…।” हाथ लहराकर वह मुझे उसकी बारीकियां समझा रहा था।

मैं उसकी अदाओं पर मुग्ध हो रही थी, “तुमने हमारे पूरे खानदान का नाम रोशन किया है।” अखबार की कटिंग्स उसे देते हुए मैंने कहा, “मुझे इनकी फोटो कॉपी चाहिए, मैं अपनी फाइल में रखूंगी।” मैं जानती थी कि यह तो शुरुआत है, अब तो अखबारों की ऐसी कितनी ही कटिंग्स होंगी, तो फाइल खोल ही ली जाए।

“तुम्हारे आने-जाने की व्यवस्था तो सरकार ने की होगी?” अब खुशी के साथ जिम्मेदारियों ने भी जगह बना ली थी।

“नहीं भाभी, एक प्राइवेट कंपनी ने स्पांसर किया था”, उसने बताया कि बीस हजार रुपये देकर उसने अपना रजिस्ट्रेशन कराया था, इसी में आना-जाना और खाना-ठहरना सब शामिल था।

“और इनाम के पैसे?”

“मेरे हिस्से में तो ये मेडल आया बस, पैसे तो सब उसी कंपनी को गए।”

“अच्छा, चिंता मत करो, तुम्हें मैं इनाम दूंगी।”

  “अभी नहीं भाभी, दिसंबर में, जब गोल्ड मारूंगा, उसके बाद।”

इसे बढि़या इनाम मिलना चाहिए, कम-से-कम दस हजार रुपये मैं इस पर खर्च करूंगी, मैंने मन ही मन सोचा। नहीं, पंद्रह हजार तो होने ही चाहिए, अन्तरराष्ट्रीय विजय है यह, मन ने पैरवी की। मैं इतनी उत्साहित थी कि उस पर अपनी दुनिया लुटा देना चाहती थी। चाचाजी से पूछना चाहती थी कि यही है न वह लड़का, जिसके न पढ़ने से आप लोग परेशान रहते थे और जिसे नालायक समझते थे। आज इसी की कामयाबी से हम सब का माथा ऊंचा हो गया है।

 इस घटना के बाद से रंजन से मेरी आत्मीयता और भी बढ़ गई। अक्सर ही उसका फोन आता या फिर मैं ही उसका नम्बर मिला लेती, “अपने खाने-पीने पर ध्यान रखा करो रंजन।” मैं उसे स्वास्थ्य संबंधी हिदायतें देती रहती ताकि वह अपनी शक्ति का पूरा इस्तेमाल कर सके।

बारहवीं का रिजल्ट निकल आया था। उसके अड़तालीस प्रतिशत नम्बर आए थे।

“चिन्ता मत करो, खिलाडि़यों के लिए रिजर्वेशन होती है।” मैंने उसका हौसला बढ़ाया। वह आगे पढ़ने में इच्छुक नहीं था, फिर भी, मेरी सलाह पर उसने ओपन यूनिवर्सिटी में नाम लिखवा लिया।

“भाभी, मैंने दिल्ली नगर निगम में अप्लाइ किया है, आप कोई सोर्स लगवाइए न,” रंजन ने एक दिन फोन किया।

“बिना ग्रेजुएशन के, किस पद पर अप्लाइ कर दिया, देवर जी?”

“क्लास फोर्थ कर्मचारी के लिए।”

मुझे तो काठ मार गया, मगर किसी तरह संयत होकर उसे समझाया, “ग्रेजुएशन कर लो देवर जी, मैं तुम्हें अफसर के रूप में देखना चाहती हूं।”

एक लम्बे समय तक चुप्पी रही। फिर एक दिन उसने फोन पर बताया कि उसकी नौकरी लग गई है, जनकपुरी में, वह स्कूल के बच्चों को ताइक्वांडो की कोचिंग देगा। मैंने सुना तो उदास हो गई, “ये तुमने कहां फंसा लिया खुद को।”

“……” उधर फोन पर खामोशी थी।

“बच्चों को सिखाना छोड़ो, अपनी प्रैक्टिस पर ध्यान दो।” मैंने आवाज को थोड़ा नरम किया।

“भाभी, आप समझती नहीं…” वह चाहता था कुछ कहे, पर शायद कहने को उसके पास कुछ था नहीं।

“कुल चार महीने भी नहीं बचे हैं तुम्हारे चीन वाले मैच में, उसकी तैयारी करो।”

मेरी बात पर वह खोखली – सी हंसी हंस पड़ा, “मैं नहीं जा रहा चीन-वीन कहीं।”

“नहीं जा रहे का क्या मतलब?” मैं लगभग चीख पड़ी, “तुम्हारी जिंदगी अब सिर्फ तुम्हारी नहीं है, इस देश का भी हक है तुम पर।”

“और मेरी ट्रेनिंग का खर्चा कौन देगा?”

“सरकार देगी।”

“सरकार…?” वह हंस पड़ा, “कौन-सी सरकार…? वह किस दुकान पर मिलती है…?”

फोन रखने के बाद मैं देर तक उसके बारे में सोचती रही। कितना संघर्षशील लड़का है। सबकी झिड़की-ताने सुनकर भी चलता रहा। बिना किसी बाहरी ताकत या ऊपरी खर्चे के, वह यहां तक पहुंचा था। चाचाजी बिहार में लगी सरकारी अस्पताल की नौकरी छोड़कर दिल्ली आ गए थे। यहां आकर उन्होंने अपना क्लीनिक खोला। मगर काम कुछ ठीक-ठाक चल नहीं चल पाया। ये बच्चे अपनी मेहनत से जितना कर सके, उन्होंने किया। बड़े बेटे ने प्राइवेट कंपनी में नौकरी कर ली, घर का खर्च चलने लगा। ब्याह को बेटी तैयार थी, मगर दहेज के अभाव में मन लायक लड़का नहीं मिल रहा था। आखिर जिस लड़की से बेटे की शादी की, उसी के भाई से बेटी को ब्याह दिया। आदर्श विवाह, न दहेज लिया, न दिया। अब रह गया यह छोटा लड़का रंजन। अलग तरह की योग्यता वाला, अलग दुनिया का लड़का। थाइलैंड जाने के लिए बड़ी मुश्किल से चाचीजी ने रजिस्ट्रेशन का पैसा जुटाया था। मेरे पति ने बताया था कि चाचीजी ने अपनी शादी के कंगन और एक चेन बेची, तब कहीं व्यवस्था हो पाई थी। मैं रंजन की पारिवारिक और आर्थिक स्थिति का आकलन करती रही। मैंने महसूस किया कि चीन न जाने के पीछे आर्थिक वजह भी हो सकती है। जब जाने का ही ठिकाना नहीं, तब प्रैक्टिस करने का क्या फायदा।

    मगर मैं आसानी से हार मानने वाली नहीं थी। आजकल कितने तरह के रिअलिटी शोज़ की भरमार लगी रहती है। गली-कूचों से खोज-खोजकर गायकों और डांसर्स को लाइम लाइट में लाया जाता है। दरजी का बेटा सीधे कविता कृष्णमूर्ति और बप्पी दा की नज़र में आता है तो, घरों में साफ़-सफाई करनेवाले का बेटा फरहा खान के संपर्क में आता है। ऐसे कई उदहारण हैं जो बेहद मामूली परिवारों से निकल कर कला की दुनिया में अपना नाम कमा रहे हैं, फिर रंजन क्यों नहीं? क्या एक होनहार खिलाड़ी, महज़ एक इंस्ट्रक्टर बन कर रह जायेगा और शौकिया खेलनेवालों पर अपनी ताकत लगाकर चुक जाएगा? क्या यह देश ऐसी प्रतिभाओं को उड़ान भरने के लिए एक टुकड़ा आकाश मुहैया नहीं कराएगा? क्या उनकी काबिलियत कुछ प्राइवेट स्पॉन्सर्स के भरोसे दम तोड़ देगी? बाहर के देशों में तो सरकार अपने खिलाड़ियों पर कितना खर्चा करती है, हमारी सरकार में भी ज़रूर कुछ व्यवस्था होगी।

मैंने टेलीफोन डायरेक्टरी से देखकर ‘भारतीय खेल प्राधिकरण’ को नंबर मिलाया, “एक खिलाड़ी है… ताइक्वांडो का… उसने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सिल्वर मेडल जीता है| उसे दिसंबर में चीन के साथ खेलना है| क्या उसके प्रशिक्षण और चीन भेजने की कोई सरकारी व्यवस्था की जा सकती है…?”

 जवाब में मिले बड़े ऊलजलूल सवाल, “क्रिकेट-विकेट की जानकारी तो दे सकता हूँ मैडम, मगर यह तो मार्शल-आर्ट्स का विषय है… जो साहब इस काम को देखते हैं वो फॉरेन टूर पर गए हुए हैं। इसके बारे में आपको ऊपर बात करनी पड़ेगी। वैसे इसने अपनी बेसिक ट्रेनिंग कहाँ से ली? हम लोग तो किसी खिलाड़ी को फर्स्ट स्टेज से ही अपनी कोचिंग देते हैं… उसे थाईलैंड किसने भेजा था, आप उसी से संपर्क क्यों नहीं करते…?”

  सरकार कोई व्यवस्था करती है या नहीं, या उसकी कैसे सहायता कर सकती है, इन सवालों में उनकी कोई दिलचस्पी नहीं थी। मेरे भीतर एक बेचैनी घर बनाती जा रही थी। मुझे लगता जैसे गोल्ड मेडल मेरे एक हाथ की दूरी पर है, मगर चीन का झंडा दिन-प्रति-दिन गोल्ड मेडल के करीब पहुँचता जा रहा है और हमारा तिरंगा धुंधला पड़ता जा रहा है। जो कसक मेरे मन में उठती है, क्या वह खेल प्राधिकरण वालों के मन में नहीं उठती? क्या उनके लिए किसी की स्पांसरशिप तय करने में उनका ‘अपना शेयर’ देश के झंडे पर लटकने वाले मेडल से अधिक अहम होता है? सरकार क्या इन स्वार्थपरक लोगों की भूख शांत करने के लिए काम करती है? मेरी आँखें धुंधलाती जा रही थीं और धुंधलाता जा रहा था सरकार का चरित्र! “सरकार…? कौन-सी सरकार…? वह किस दुकान पर मिलती है…?” रंजन की बात सही थी, सरकार किसी दुकान पर ही मिल सकती थी| जो जितनी बड़ी बोली लगाएगा, वह सरकार को उतनी जल्दी पाएगा। खैर, सरकार को गोली मारो, मैं खुद ही उसे चीन भेजने की व्यवस्था करुँगी, गोल्ड मेडल हमारे ही हिस्से आएगा। मैंने तय किया और पूरे उत्साह के साथ उसे फोन किया, “सुनो, तुम चीन जरूर जाओगे और तुम्हारे टिकट की व्यवस्था मैं करूंगी।” बिना कुछ सोचे-समझे ही कह दिया मैंने। ख्याल ही नहीं किया कि मेरी इस बात से उसकी खुद्दारी को ठेस लगेगी।

“उसकी बात नहीं है भाभी,” उसने तीखी आवाज में कहा तो मुझे अपनी भूल का अहसास हुआ।

“ये तुम्हारी पिछली जीत का इनाम है,” मैंने बात संभालने की गरज से कहा, “और सुनो, गोल्ड जीतने के बाद सिल्क की साड़ी भी लूंगी तुमसे, फोकट में नहीं छूटोगे इस बार।”

“आपकी बात पूरी कर सकता तो जरूर करता भाभी, पर मैं नहीं जा रहा खेलने, तय कर चुका हूं।” आवाज में पूरी दृढ़ता थी, बहस की कोई गुंजाइश नहीं थी।

मैं याद कर रही थी कि एक फिल्म में दिखाया गया था कि एक खिलाड़ी को खेल न खेलने के लिए लालच दिया गया। जब वह नहीं माना तब उसे खेल में हार जाने के लिए उससे भी बड़ा लालच दिया गया। मगर वह खेला भी और जीता भी। यह इंटरवल तक की कहानी थी। इंटरवल के बाद दिखाया गया था कि उसके इस दुस्साहस के लिए उसे महंगी कीमत अदा करनी पड़ी। उसके घर के सामने ही उसे किसी गाड़ी ने टक्कर मार दी। फिल्म में तो उसे बचाकर हैप्पी एंडिंग दिखाई गई थी, मगर मैं देख रही थी कि रंजन फिर कभी स्वस्थ न हो सका, वही जीत उसकी अंतिम जीत होकर रह गई। मेरा हौसला टूटने लगा। वही तो अपने घर का चिराग है। कहीं किसी ने उसके हाथ-पैर तोड़ दिए तो बेचारे चाचाजी का सहारा कौन है?

   सारा उत्साह थम गया। बीच में एकाध बार रंजन का फोन आया था। कुछ खास खबर नहीं, रोजमर्रा की बातें–ताइक्वांडो की प्रैक्टिस कराने जनकपुरी आता है, उसे दूर पड़ता है, इसलिए उसने एक बाइक खरीद ली है…। मैंने कहा था, “अब तो बाइक वाले हो, कभी यहां भी आ जाओ, क्लास के बाद।”

   मगर वह नहीं आया। मेरे बुलाने में भी वह उत्साह नहीं था और उसके पास भी समय कहां था।

दिन बीतने लगे। धीरे-धीरे मन संयत होने लगा। भूलने लगी कि मेरे परिवार में कोई अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी भी था। मेरी दुनिया ने उसे सलामत हाथ-पैर सहित खेल के मैदान से बाहर कर दिया था। अब वह सुरक्षित था, जिंदा था, अपने और अपने परिवार के लिए। ठीक भी था, आखिर रंजन से बड़ा तो उसका खिलाड़ी नहीं था, या कहो, रंजन था तब तो खिलाड़ी था। मगर, अगर ऐसा ही था तो फिर मन में कचोट क्यों थी?

मौसम बदल गया था। कड़ाके की ठंड पड़ रही थी। आज तबियत कुछ ठीक नहीं थी। ऑफिस नहीं गई, रजाई में दुबकी पड़ी रही। अचानक मोबाइल बजने लगा, मगर जब तक मैं रजाई से निकलती और फोन उठाती, तब तक फोन कट चुका था। चश्मा लगाकर देखा तो रंजन की मिस्ड कॉल थी।

“हैलो रंजन, फोन किया था?” मैंने रंजन को फोन मिलाया।

“भाभी, एक खुशखबरी देनी है, आपको किस दिन समय है, बताइए,” उसने उल्लसित आवाज में कहा तो निगाह अचानक ही कैलेण्डर पर चली गई – 22 दिसंबर। यही वह महीना था जिसमें रंजन का चीन के साथ मैच था, यही वह महीना था जिसकी मैं कभी बेसब्री से प्रतीक्षा करती थी। जरूर यह चीन से लौटा होगा, खेल में जीत कर। “भाभी, अबकी बार गोल्ड मारूंगा…” मेरे कानों में उसके शब्द गूंजने लगे। मैं जानती थी, ये मेरी बात नहीं टाल सकता।

“जब भी कहो, मैं छुट्टी ले लूंगी।”

“तो शुक्रवार रख लूं?”

“रख लो भई, मगर खुशखबरी तो सुनाओ।” मैं व्यग्र हो रही थी। आंखें देख रही थीं कि समूचे ग्लोब के ऊपर, रंजन गले में गोल्ड मेडल पहने खड़ा है और दुनिया समवेत स्वर में पुकार रही है – रंजन…इंडिया…रंजन…इंडिया…।

“भाभी, मैंने अपना काम शुरू किया है, क्रॉकरी का…।”

“क्या…?”

“मैंने वो नौकरी छोड़ दी, मैं किसी के अंडर काम नहीं कर सकता,” वह बता रहा था, “अपनी बाइक बेचकर मैंने एक मोल्डिंग मशीन खरीदी है, उससे बर्तन बनेंगे…मुहूर्त पर आपका आना जरूरी है भाभी…।” उसके स्वर में उल्लास था, “पांच हजार कटोरियों का ऑर्डर मिला है, मशीन का खर्चा तो इसी में निकल जाएगा।”

सिल्वर मेडल जीतने के बाद भी उसकी आवाज में ऐसा ही उल्लास था, “इसमें साउंड प्वाइंट के साथ ही हिट करना होता है भाभी -योइ …।”

   कल का वह दृश्य आज पर हावी हो रहा था, मैं खुद को संभालने की कोशिश कर रही थी।

“इसका मोल्डिंग सिस्टम गजब का है भाभी,” वह मुझे इसकी बारीकियां समझा रहा था, “मशीन में फाइबर पाउडर डालो और मिनट भर में वह कटोरियों की शक्ल में बाहर…।”

मैं देख रही थी कि रंजन का चेहरा कटोरी की शक्ल में तब्दील होता जा रहा था। उसके हाथ-पैर सब कटोरियों में बदलते जा रहे थे।

“तो शुक्रवार सुबह दस बजे ठीक रहेगा न भाभी?” वह पूछ रहा था।

योइ…योइ…योइ… मोल्डिंग मशीन बड़ी तेजी से चल रही थी, मुझे कुछ सुनाई नहीं दे रहा था।

*****

– अलका सिन्हा

  371, गुरु अपार्टमेंट्स

  प्लॉट नं. 2

  सेक्टर 6

  द्वारका

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  मोबाइल नं. 9868424477

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2 Comments

  • डॉ. राजीव कुमारा रावत says:

    वाह वाह क्या बात है
    आज ही आपसे और भाईसाहब से बात हुई
    और आज ही आपकी कहानी भी पढ़ने को मिल गई

    आशा है आपकी यह साहित्यिक सलिला सतत् प्रवाहित होती रहेगी और हमें
    शीतलता देती रहैगी ।
    शुभकामनाओं सहित,

    सादर-

    डॉ राजीव कुमार रावत
    हिंदी अधिकारी
    भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान खड़गपुर 721302
    9641049944

  • अलका सिन्हा की एक बेहतरीन कहानी ! यह हमारी सामाजिक व्यवस्था और तंत्र ही ऐसा क्यूँ है कि जीवन के किसी क्षेत्र विशेष की प्रतिभाएं आर्थिक तंगियों के चलते यूँ ख़त्म हो जाती हैं। उन्हें अपने क्षेत्र में कुछ कर दिखाने के समुचित अवसर नहीं मिल पाते क्योंकि वे आर्थिक मोर्चों पर कमजोर होते हैं… हमारे समाज का एक कड़वा सच हमारे सामने रखती है यह कहानी !

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