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मुझसे कैसा नेह – अलका सिन्हा


  गुड्डो का स्कूल …………………….

”बीबी जी, लगता है बिटिया का पेट दुखता है! लाओ, सरसों की बाती बनाकर सेक दें।“ कई बार आंखें मटकाती रामबाण औषधि बताती, ”छाती का दो बूंद दूध बिटिया की नाभि पर टपका दो, बुखार तुरंत उतर जाएगा…।“ और सचमुच ऐसा ही होता। मैंने उसका सारा एहसान पल-भर में उतार दिया था। मेरा मन ग्लानि से भर उठा। मुझे ध्यान है, जब से उसने गुड्डो को नहलाना-धुलाना शुरू किया था, उसे अधिक समय लगने लगा था और इसी चक्कर में उसके एक घर का काम भी छूट गया था। मैंने महीने के अंत में उसे सौ रुपये अधिक दे दिए थे। उसने दोबारा पैसे गिने, फिर पल्लू मुंह में दबाकर हंसने लगी, ”गिनती भूल गई क्या बीबी जी?“

मैंने कितना कहा, ”तुम्हारी मेहनत के पैसे हैं, तुम्हारा काम बढ़ गया है।“ मगर वह नहीं मानी तो नहीं मानी। कहने लगी, ”हम तो बच्ची के साथ जरा हंस-खेल लेते हैं, कोई पइसों के लोभ से थोड़े ही…।“

मेरा मन ख़ुद को धिक्कार रहा था। आज मैंने ठीक नहीं किया। मुझे इतना नहीं कहना चाहिए था।

चांदनी चौक की जबानी

”रोको! रोको!!“ वह अचानक जोर से बोल पड़ी।

मैंने हड़बड़ाकर ब्रेेक पर पैर मारा तो गाड़ी ठक से बंद हो गई।

”विष्णु दिगंबर मंदिर, भाई मतिदास चौक…यहीं तो रुकना है।“

मैं जैसे नींद से जगी, ”तुम्हें कैसे पता?“ मैं आंखें फाड़कर उसकी ओर देख रही थी। उसने ऊपर लगे बोर्ड की ओर इशारा किया। गाड़ी की इस तेज रफ्तार में भी वह रास्ते के सभी बोर्ड पढ़ती आ रही थी।

”यहां पक्षियों का अस्पताल है न?“ उसने पूछा तो मैं अचकचा गई, ”हां, शायद यहीं…।“

”शायद नहीं, पक्का यहीं है,“ वह पूरी तरह आश्वस्त थी, ”आप गाड़ी अंदर की सड़क पर मोड़ लीजिए…ये मंदिर के बराबर में…इधर…।“

सचमुच, वह ठीक बता रही थी। मैं हैरान थी, ”तुम पहली बार आई हो न यहां, चांदनी चौक?“

”हूं…।“ उसने हामी भरी तो मुझे रोमांच हो आयाµकहीं पिछले जन्म में…। मैं कुछ तय नहीं कर पा रही थी, ”तो इतना सब कैसे जानती हो यहां के बारे में?“

आखिर ये विदेशी समझते क्या हैं अपने आप को? कोई भी यहां आता है, भीख मांगते बच्चों की तस्वीरें खींचता है और अपने देश में उसे ‘भारत’ के नाम से कैलेंडर बनाकर बेचता है। दिल्ली के तमाम पॉश इलाके छोड़कर यह चांदनी चौक आई है कि इन दोने-पत्तलों की, लड़ते कुत्तों की और फुटपाथ पर सोते मजदूरों की तस्वीरें खींचकर ले जाए ताकि अपने देश में दिखा सके कि यही है भारत…भूखा-प्यासा…गरीब देश…और तौहीन कर सके मेरे देश की। मैं उसे इस हद तक छूट नहीं दे सकती थी।

हरदम साथ डॉट कॉम

‘‘वह भी तुम्हीं थी। मैंने एक साइट बनाई है, देखना चाहोगी?’’ वह बताने लगा कि किस तरह वह डैड के गुजरने से पहले ही उनकी कमी को महसूस करने लगा था। वह उनका जाना बर्दाश्त नहीं कर सकता था और इसलिए खूब मेहनत से उसने यह साइट तैयार की थीµहरदम साथ डॉट कॉम।

‘‘इस पर जाकर तुम अपने किसी भी प्रिय से लिंक कर सकती हो, वह जीवित भी है या नहीं, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। ये देखो…,’’ वैभव बताता रहा कि किस तरह एक विस्तृत प्रश्नावली के जरिए उसने बहुत मनोवैज्ञानिक ढंग से डैडी की प्रोफाइल तैयार की।

अपूर्णा

दादी गहरे ख्वाब मंे डूबती जा रही थी। क्या नाम था उसका? कुछ था तो, अच्छा-सा…। हिम उसके पोते का बेटा…यानी चौथी पीढ़ी…वह बेटी से पत्नी, फिर मां, फिर दादी, अब परदादी बनी। वह झुल-झुल बुढ़िया अपने हाथों-पैरों को देखती है तो लगता है कि ये सूखी लकड़ियां अब होम हो जानी चाहिए। पर अपने हाथ में क्या है? आंखों की बरौनियां तक पककर सफेद हो चुकी हैं। यह लंबा सफर उसे ताउम्र भटकाता रहा…छलता रहा…। वह आंखें मूंदकर फिर खोलती है, कुछ खोजने की कोशिश मेंµअपना नाम…अपना परिचय…क्या था भी कभी…?

चौराहा

बाउजी और निरंजन अब दो दोस्त बन गए थे, जिगरी यार। बड़ी गंभीर योजनाएं बनतीं भविष्य की, सबसे महत्त्वपूर्ण मकान की, क्योंकि साल-भर बाद ये सरकारी मकान जो छूटने वाला था। पर तीन महीने मुश्किल से बीते होंगे कि एक रोज निरंजन दोपहर को ही लौट आया। कुछ गुमसुम था, तो मां ने भी बहुत न पूछा। पर जब दो रोज काम पर भी न गया तो माथा ठनका। बाउजी सशंकित-से पूछ बैठे, ”क्या रे, काम पर नहीं जाता, नौकरी छोड़ दी क्या?“

उसे ध्यान हैµउस दिन 13 जनवरी थी। सुबह-सुबह घर से निकल आया। शर्म से बताया नहीं किसी को कि कांस्टेबल के लिए इंटरव्यू देने जा रहा है। फुल पैंट के नीचे हाफ पैंट पहन ली थी। अपनी सब डिग्रियां घर छोड़कर खाली मैट्रिक का सखटफिकेट लिए चला था कैंट मैदान। मन ही मन सोच रहा था कि अगर ये चौकीदारी भी मिल गई तो आज ही अपनी बीॉएस-सीॉ और एमॉएॉ की डिग्रियों को आग लगा दूंगा। वह पढ़ाई किस काम की, जो रोटी न खिला सके?

मुझसे कैसा नेह

गाड़ी पटरी पर चल पड़ी थी। बीते दिनों को गर्म कपड़ों की तरह ट्रंक में दबा दिया था, सुबह-शाम अगरबत्ती की गंध जिस पर अपनी जगह बनाने लगी थी। जिंदगी की परिभाषा नए अर्थ खोजने लगी थी। जीवन ‘घर’ और ‘दफ्तर’ नाम की दो फाइलों में तबदील हो गया था। खुद की जरूरतों, जिम्मेदारियों को फाइलों की तरह निपटाने लगी थी। अब से पहले जो भी किया था, वह सब का सब दूसरों की जरूरत, दूसरों की खुशी और पसंद के नाते किया था। पहली बार अपनी फाइल खोली थी और पहली बार महसूस कर रही थी कि मैं खुद के बारे में कितना कम जानती हूं।

जन्मदिन मुबारक

दुनिया जिसे रंग-बिरंगे फूल कह रही थी, वह तो उसकी अपनी दुनिया थी। जानी-पहचानी दुनिया, गोल-गोल बूटियां, छिद्रों की भाषाµउसकी जिंदगी के ग्रह-नक्षत्रा…उसके हर्ष-विषाद की अभिव्यक्ति, उसकी सोच-समझ, संवाद का जरिया…उसकी जिंदगी में इन डॉट्स के अलावा था भी क्या? तो क्या छिद्रों की ये लिपि खूबसूरत है…? रंगीन है…? मां ने अभी तो कहा कि कितने सुंदर रंगों के फूल काढ़े हैं भव्या ने। तो क्या उसकी जिंदगी खूबसूरत रंगीन फूलों से सजी है…?

मो¯ल्डग सिस्टम

मुझे लगता, जैसे गोल्ड मेडल मेरे एक हाथ की दूरी पर है, मगर चीन का झंडा दिन-प्रतिदिन गोल्ड मेडल के करीब पहुंचता जा रहा है और हमारा तिरंगा धुंधला पड़ता जा रहा है। जो कसक मेरे मन में उठती है, क्या वह खेल प्राधिकरण वालों के मन में नहीं उठती? क्या उनके लिए किसी की स्पॉन्सरशिप तय करने में उनका ‘अपना शेयर’ देश के झंडे पर लटकने वाले मेडल से अधिक अहम होता है? सरकार क्या इन स्वार्थपरक लोगों की भूख शांत करने के लिए काम करती है? मेरी आंखें धुंधलाती जा रही थीं और धुंधलाता जा रहा था सरकार का चरित्रा! ‘सरकार…? कौन-सी सरकार…? वह किस दुकान पर मिलती है…?’ रंजन की बात सही थी, सरकार किसी दुकान पर ही मिल सकती थी। जो जितनी बड़ी बोली लगाएगा, वह सरकार को उतनी जल्दी पाएगा।

मो¯ल्डग सिस्टम

सिल्वर मेडल जीतने के बाद भी उसकी आवाज में ऐसा ही उल्लास था, ‘इसमें साउंड प्वाइंट के साथ ही हिट करना होता है भाभी योइ…।’

कल का वह दृश्य आज पर हावी हो रहा था, मैं खुद को संभालने की कोशिश कर रही थी।

‘‘इसका मोल्डिंग सिस्टम गजब का है भाभी,’’ वह मुझे इसकी बारीकियां समझा रहा था, ‘‘मशीन में फाइबर पाउडर डालो और मिनट-भर में वह कटोरियों की शक्ल में बाहर…।’’

मैं देख रही थी कि रंजन का चेहरा कटोरी की शक्ल में तबदील होता जा रहा था। उसके हाथ-पैर सब कटोरियों में बदलते जा रहे थे।

 चाहत

”डिलेड अबॉर्शन…आई अंडरस्टैंड, अभी आप दोनों यंग हैं…बट डोंट वरी, इससे आपकी मैरिड लाइफ में कोई प्रॉब्लम नहीं आएगी…आप जल्दी से इस फॉर्म को भर दीजिए ताकि ऑपरेशन शुरू किया जा सके।“ डॉक्टर खन्ना ने अमित के हाथ में कागज थमा दिया।

अमित ने देखाµकागज पर खून के थक्के जमा थे, ये सब थक्के जुड़कर नन्ही बच्ची की शक्ल में तबदील हो गए। उसकी पकड़ कमजोर पड़ गई और उसके बेजान हाथ से बच्ची छूटकर गिर पड़ी।

कनी बेतहाशा दौड़ती जा रही थी। दौड़ते हुए उसकी सांस फूलने लगी थी, गला सूखने लगा था…वह कुछ पल रुककर सांस लेना चाहती थी। उसने अपने पैरों को रोकना चाहा तो लगा जैसे वह हवा में तैरने लगी हो…उसके आसपास कितनी भीड़ थी…सफेद-सफेद कपड़ों में कितने मर्द-औरतें उसे घेरे खड़े थे…वह उन्हें पहचानना चाहती थी, पर उन्होंने अपना मंुह ढक रखा था। उसने ध्यान से देखाµदो लड़कियों ने उसकी बांहें पकड़ रखी थीं। वह हैरान थीµक्या हो रहा है उसके साथ…कौन हैं ये लोग…कहां है वह?

 फिर आओगी न

अरे, ये क्या? यहां तो आंगन का द्वार थाµखुला आसमान नीचे झांकता था, कहां गया? मैं व्याकुल हो गई। आंगन के तीन-चौथाई हिस्से में कमरा और एक चौथाई हिस्से में ज्वाइंट टॉयलट-बाथ! मैं चकरा गई। ये तूने क्या कर डाला भइया? मेरा आंगन, मेरे बचपन के साथीµदीप्ति! मंदाकिनी!! वैभव…!!! मैंने ऊपर की ओर देखकर आवाज लगाई। सफेद छत टुकुर-टुकुर मेरी ओर ताक रही थी, ”किसे ढूंढ़ रही हो? हमने तुम्हें पहचाना नहीं।“

कर्ज

फंदा दर फंदा, लगा जैसे कदम दर कदम अपनी ही जिंदगी बुनती गई हो वह, बचपन के उलटे-सीेधे पैरों से बुना बॉर्डर, फिर परवान चढ़ी बुनाई, जवान हुई, घर घटने लगेµखुलकर हंसना नहीं, संभलकर चलना…धीरे-धीरे मां-बाप ने हर तरह से कुशल बनाया, मजबूत बनाया, भरी-पूरी निखर गई तो किसी के गले में पहनाकर जैसे ब्याह दिया स्वेटर

कड़ी

सोनी रोज ऋचा की स्कर्ट और जींस पहन लेती है और ऋचा सोनी की घेरदार फ्रॉक। दोनों को पहचानना मुश्किल है। अब तो सोनी भी ऋचा से मैं-तू की बोली बोलने लगी है। अभी सोनी ऋचा को भील नृत्य सिखा रही हैµ”गिंग-गैंग-गूली, गूली-गूली…गूली-गूली…गूली-माशा।“ ऋचा बुरी तरह हंस रही है इस नृत्य पर। सोनी को बुरा लग गया, वह रूठ गई है, ”जा, मैं नहीं सिखाती तुझे अब कुछ भी!“

तुम्हारे लिए चॉकलेट, बेबी

उड़ान में भी सत्या की निगाहें उस बच्ची के साथ खुद को जोड़ती रहीं। कभी वह अजनबी आंखों में आता तो कभी उसकी वेदना-भरी आवाज कानों में सुनाई देती। आज उसकी बच्ची का जन्मदिन है और वह उसके पास नहीं है। सत्या के खयालों में एक नन्ही, उदास बच्ची का चेहरा घूम गया जो अपनी मां का आंचल पकड़े ठुनक रही है, ”मम्मा, पापा कब तक आएंगे?“ फिर सत्या ने देखा कि वह वृद्धा उस बच्ची को उसके पापा का भेजा तोहफा थमा रही है और वह बच्ची खुशी से गोल-गोल घूमने लगी है…।

 पाल स्पीकिंग

”मैं कौन था? वह शरीर या तुम?“ मैंने लपककर उस चेहरे को देखना चाहा, मगर देख नहीं सका। उसका कोई रूप था ही नहीं, उसकी कोई लंबाई-चौड़ाई थी ही नहीं। मगर वह था, उसका होना उतना ही निस्संदेह था जितना कि बिस्तर पर मेरे पार्थिव शरीर का पड़े होना। हैरत की बात यह थी कि मैं दोनों को समान रूप से महसूस कर रहा था…और कि इसके लिए मैं किसी भी इंद्रिय की जरूरत महसूस नहीं कर रहा था। बिना देखे, बिना सुने, बिना छुए मैं खुद को देख रहा था, सुन रहा था, महसूस कर रहा था…

 फादर ऑन हायर

 ”लेबोरियस स्टूडेंट, बट सम प्रॉब्लम मिस्टर पांडे,“ टीचर बातचीत करना चाहती थी, मगर पांडे साहब वचन से बंधे थे। सरकारी दफ्तर के हिंदी अधिकारी का बच्चा अंग्रेजी गमले में लगा दिया था, परेशानी तो थी। मस्तिष्क में फ्लैश बैक-सा चल रहा था, जब ड्रॉ में बच्चे का नाम पुकारा गया था, वे खुशी से भर उठे थेµअपने बेटे को अंग्रेजी स्कूल में पढ़ाऊंगा।

 एका

उस रोज आधी रात के करीब नींद खुल गई। बाहर बरामदे में फोल्डिंग चारपाई पर बाबा सो रहे थे। हलकी-सी ठंड पड़ने लगी थी। मैंने बाहर आकर उनके पैरों पर चादर ओढ़ा दी। मैंने महसूस किया कि उनके चेहरे पर मेरी अम्मी जैसा भाव थाµममता से भरा। चादर की गर्माइश मिलते ही उन्होंने पैरों को सीधा कर लिया और ठीक से सो गए। मैंने पाया, हमारे बीच का अपरिचय खामोशी की जबान में ही दूर होता जा रहा था…

गहरे तालाब की विरासत

न मालूम कब आंख लग गई। सपने में देखा कि भोर का समय है, पूरी तरह उजाला भी नहीं हुआ। गांव की पगडंडियों से होकर मैं एक ऐसी जगह पहुंची हूं जहां झिलमिलाते पानी का एक तालाब है…मैं रुककर देख रही हूं…तालाब की सतह पर चांदी का वर्क लगा पानी…पता नहीं कैसे, मगर मुझे पता है कि इसमें स्नान कर, व्यक्ति हर तरह के दुःख-तकलीफ से बरी हो जाता है, वह शुद्ध हो जाता है, चांदी की तरह स्वच्छ और शीतल…मैं देख रही हूं, वहां दूर, उस पार एक आदमी तालाब में उतर रहा है, धीरे-धीरे वह उसमें समाता जा रहा है, चांदी बनता जा रहा है उसका शरीर…तालाब की सतह पर अब बस एक सफेद चादर है जिस पर बिखरे हुए हैं गेंदे के कुछ पीले फूल…

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