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मेरे बच्चे – चार शब्द चित्र


अभी तो

तैरना सीखा है

तुमने मेरे बच्चे

तुम्हे क्या मालूम !

क्या होती है नदी की गहराई

लहरों की चढ़ती उतरती  धार

क्या होती है भवंरों की दिशा

इसमें डूबने की रफ़्तार

छलांग के जोखिम

होश में  कम होते हैं

जोश में नहीं

मेरे बच्चे .

अभी तो चलना सीखा है

मेरे बच्चे

क्या तुमने देखा है

काँटों भरे

उबड़ खाबड़ रास्ते

देखा है उन राहों को

जिन पर

मंजिल नहीं हुआ करती

देखा है कभी

भूल-भुलय्या की ओर जाते

शार्ट कट छोटे रास्तों को

चलना जमीं देख कर

दिशा जानकर

खोलकर आँखे

मानव सा,

मेरे बच्चे

कदाचित दुनिया में

इस प्राणी को

चलना सीखना पड़ता है

अभी तो बहुत कोमल हैं

तुम्हारे पंख मेरे बच्चे

 आकाश है असीमित

यह है बहेलियों की बस्ती

तरकस के

जहर बुझे तीरों के आगे

पखेरुओं की जान है सस्ती

तलाशो अपने कटघरे,

ताकि

उड़ने के पहले

कोई पंख न कतरे

बिंदास उडान का

खतरनाक है चयन

पहचानो इनकी नीयत

 और  नियति में कर लो

एक पिंजरा

अपना भी मेरे बच्चे

जहाँ समेट लो

अपने सिर्फ अपने गगन

2

स्वानुशाषित आजादी  और

 बिंदास उन्मुक्तता का

भेद समझो मेरे बच्चे

एक पतंग है

डोर से बंधी

एक है

डोर से कटी  पतंग

 किनके हाँथ पड़ेगी

किसकी छत गिरेगी

कहाँ जा कर उलझेगी

क्या पता

कटी पतंग का हश्र  !

मूल्यों को

 अधकचरे ज्ञान की

घट डाल

मत मथो मेरे बच्चे

 मूल्य है ज्ञान जनित

अनुभव का

परम परिणाम

मानवता का दर्शन

 मूल्यों में हैं

असल में

 ज्ञान में हैं मूल्यों को

स्थापित करने की कुशलता

ज्ञान तर्क से नहीं

बल्कि विशिष्टता

से पहचान बनता है

अधकचरा ज्ञान

 अज्ञानता से

ज्यादा खतरनाक है

 मेरे बच्चे

ज्ञान को मूल्यों

और मान्यता के

पलड़े पर तौल कर

 सहेजो मेरे बच्चे

3

 सोंच को शब्दों में बदलना

उतना ही कठिन है

जितना इश्वर की इच्छा

जान सकना  मेरे बच्चे

हर सोंच साकार के

काबिल नहीं होती

हर कल्पना

आकार के उपयुक्त नहीं

हर अनुभूति को

शब्दों की सीढ़ी मत दो

कई प्रयासों की

धार भोथरी होना ही

अच्छा होता है मेरे बच्चे

सोंच को वहां तक

साकार करने का प्रयास करो

जहाँ तक

इश्वर की मर्जी की अनुभूति हो

या इश्वर को

मानने वालों की मान्यता हो

सोंच की सीमा

पार करना

आत्म घाती है

मेरे बच्चे

यदि उद्देश्य में

जन कल्याण नहीं होता

4

वह प्रेममय नहीं

जो  आसक्ति -आकर्षण

के सीखचों में कैद है ..

वह प्रेम नहीं पहचान सकता

जो आंधी और

बयार में अंतर न कर सके

प्रेम वो भी नहीं

जहाँ वह अनुरोध शर्तों

अनुबंधों की

 बेड़ियों में कसा हो . .

क्रतिमता की

सीमा तक सजावटी

मन भरमाने वाला भाव ….

अचानक बिना तर्क

कुछ अच्छा

 लग जाने वाला ताव …

प्रेम नहीं है मेरे बच्चे

प्रेम तो अंतर्मुखी

शब्दों को बौना करने वाला

आत्मकेंद्रित नैसर्गिक

सहज सात्विक

 त्याग समर्पण से परिपूर्ण

कोमलता से भी कोमल

अध्यात्मिक चेतना है

यह परममित्रता के धागों से

पल पल बुना मन का

अजर अमर लिबास है

मेरे बच्चे !

अवधेश  सिंह

apcskp@hotmail.com

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