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हतभागिनी नहीं है हमारी हिंदी-श्री शशि शेखर


Hindiवर्तमान परिवेश में  हिंदी भाषा की स्थिति पर श्री शशि शेखर के विचार

पिछले ढाई दशक से दुनिया भर में घूम रहा हूं। हर बार पाता हूं कि हिंदीभाषियों का कारवां पूरी ताकत और इज्जत के साथ आगे बढ़ रहा है। ऐसे में, जब कुछ विघ्नसंतोषी अपने ही देश में कहते हैं कि हिंदी खत्म हो जाएगी, तो मुझे उनकी संकरी सोच पर आश्चर्य होता है।

मैं न्यूयॉर्क के जॉन एफ केनेडी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर उतरा ही था कि आश्चर्यजनक संयोग से पाला पड़ा। एक अधेड़ होती महिला 14-15 साल के बेटे के साथ कन्वेयर बेल्ट के पास खड़ी थीं। उनके चेहरे पर घबराहट के लक्षण थे। सकुचाती हुई मेरे पास आईं और दिल्ली की पंजाबी मिश्रित हिंदी में पूछा कि एअर इंडिया का सामान यहीं मिलता है? मैंने कहा कि आप कन्वेयर बेल्ट के सिरे की ओर देखती रहिए, दूर से ही आपको अपना सामान दिख जाएगा। पास आने पर आसानी से आप उसे उतार सकेंगी। संयोग से हम दोनों को ही देर से ‘लगेज’ प्राप्त हुआ। इस दौरान वह पूछती रहीं कि बाहर बस कहां मिलेगी और अपने गंतव्य तक कैसे पहुंचा जा सकता है? यही नहीं, अपनी बेहद टूटी-फूटी अंग्रेजी में इससे मिलते-जुलते सवाल वहां मौजूद हवाई अड्डा कर्मियों से भी करती रहीं, ताकि कोई चूक न रह जाए।

वह न्यूयॉर्क में किसी मामूली पद पर कार्यरत अपने पति के पास आई थीं और वहीं बस जाने का इरादा था। वजह? उन्हें यकीन था कि यह महादेश उनके बच्चे को अच्छी शिक्षा-दीक्षा और करियर दे सकेगा।

उन्हें शुभकामना देकर बाहर निकला, तो दूसरा आश्चर्य प्रतीक्षा कर रहा था। टैक्सी ड्राइवर हिन्दुस्तानी बोल रहा था। पूछने पर उसने बताया कि वह नई दिल्ली में चांदनी चौक का रहने वाला है। दिमाग खटका। कोई चांदनी चौक वाला कभी यह नहीं कहेगा कि मैं नई दिल्ली का हूं। मैनहट्टन तक पहुंचने में एक घंटा से ज्यादा लगना था, इसलिए उसके बराबर वाली सीट पर बैठा हुआ बातें करता रहा। उसी दौरान पता चला कि उसके पुरखे चांदनी चौक से पाकिस्तान गए थे, पर हिन्दुस्तानियों को देखकर वह अब भी खुद को नई दिल्ली वाला बताता है। क्यों? जवाब था- जी, इससे दोनों को तसल्ली हासिल होती है। मैं दिल्ली के टैक्सी वालों का बहुत सताया हुआ हूं। वे मीठा या तीखा जैसा भी बोलते हैं, आपकी जेब जरूर हल्की हो जाती है। लगा कि यह पाकिस्तानी कुछ ऐसा ही करने जा रहा है। पर नहीं। जब मैं अपने होटल पर उतरा, तो उसने न केवल टिप लेने से इनकार कर दिया, बल्कि दो डॉलर की रियायत भी दी। अमेरिका ऐसा देश है, जहां टैक्सी वाले टिप न मिलने पर असंतोष जाहिर कर देते हैं और रेस्टोरेंट के वेटर तो दरवाजे तक दौड़ाकर आपसे बिल का 15 फीसदी बतौर टिप अधिकारपूर्वक मांगने से नहीं चूकते।

अगले सात दिन न्यूयॉर्क और वाशिंगटन में भारतीय उप महाद्वीप के लोगों से मिलने और हिंदी की ताकत को समझने के थे। वहां सैलानियों को घुमाने वाली बस रही हो या कोई रेस्टोरेंट, व्यस्त बाजार या सुनसान रेलवे स्टेशन, भारतीय उप महाद्वीप का कोई न कोई व्यक्ति जरूर टकराया और उसने अपनी किस्म की हिंदी में जवाब दिया। मैंने गौर किया कि अमेरिका में हिन्दुस्तानी, पाकिस्तानी और बांग्लादेशी अपने क्षेत्रीय विवाद भुलाकर इस भाषा में संवाद करने में कोई हीनता महसूस नहीं करते। यह बात अलग है कि यदि उनकी ‘तरफ’ का कोई व्यक्ति मिल जाता है, तो प्राथमिकताएं बदल जाती हैं। ऐसा नहीं है कि सिर्फ अमेरिका में ही ऐसा हो रहा है। रोम में एक बार मुझे अखबार बेचते कुछ ऐसे लोग मिले, जो चेहरे से हिन्दुस्तानी लग रहे थे। पूछा, तो पता चला कि वे बांग्लादेशी हैं, पर हिंदी के कामचालाऊ शब्द उन्हें भी आते थे। यकीन जानिए कि यह सिलसिला बढ़ता जा रहा है। बताता हूं कैसे?

जो हिन्दुस्तानी और पाकिस्तानी रोजी-रोटी की तलाश में परदेश जा बसे, उन्होंने सच्चे अर्थों में हमारे सांस्कृतिक राजदूत की भूमिका निभाई। अरब देशों में तो हिंदी की फिल्में और गाने इतने लोकप्रिय हैं कि पूछिए ही मत। 1998 में मिस्र गया था। एक पत्रकार साथी के साथ काहिरा की गलियों में घूमने लगा। अपने पुराने शहरों जैसी संकरी गलियां। अधनंगे बच्चे, चिकों की दुकानों पर लटके हुए बछड़े या बकरे, छोटी दुकानें, बड़ी खिड़कियों वाले पुराने मकान और बुर्के में ढकी हुई महिलाएं। बचपन में इलाहाबाद, बनारस, अलीगढ़ और मिर्जापुर की कुछ गलियों में ऐसा ही समां दिखाई पड़ता था। सड़कों पर खेलते बच्चे कुछ क्षण को ठिठकते और फिर कुछ पूछते। अरबी से अनजान होने की वजह से हम उसे समझ पाने में असमर्थ थे। बाद में किसी ने बताया कि वे पूछ नहीं, बल्कि कह रहे हैं- ‘अमिताभ बच्चन।’ यही नहीं, एक दुकान पर तो बाकायदा मिथुन चक्रवर्ती का फोटो लगा हुआ था। उस समय लगा था कि भारत और अरब देशों में कुछ सूत्र साझा हैं। पिछले 15 सालों में इनमें यकीनन इजाफा हुआ है।

पिछले ढाई दशक से दुनिया भर में घूम रहा हूं। हर बार पाता हूं कि हिंदीभाषियों का कारवां पूरी ताकत और इज्जत के साथ आगे बढ़ रहा है। ऐसे में, जब कुछ विघ्नसंतोषी अपने ही देश में कहते हैं कि हिंदी खत्म हो जाएगी, तो मुझे उनकी संकरी सोच पर आश्चर्य होता है। यह ठीक है कि कंप्यूटर और मोबाइल फोन की ईजाद ने हिंदी की शुद्धता को आघात पहुंचाया है, पर यह भी तय है कि इन आविष्कारों ने हमें नए शब्द दिए हैं, हमारी भाषा का विस्तार किया है। इंग्लैंड और भारत के रिश्ते भले ही कभी मालिक और गुलाम के रहे हों, पर दोनों राष्ट्रों के बीच सदियों पुराना नाता है। पहले लंदन में लोगों को बताना पड़ता था कि हमारी राष्ट्रभाषा क्या है? आज वहां हिंदी और हिंदी वालों के बारे में बताने की किसी को जरूरत नहीं रह गई है।

2001 की जनगणना के मुताबिक, भारत में 41 फीसदी लोग हिंदी बोलते थे। इसके बरक्स बांग्ला, तेलुगू, मराठी और तमिलभाषी मिलकर भी 28.2 फीसदी का आंकड़ा पार नहीं करते। एक अनुमान के मुताबिक, 121 करोड़ की आबादी वाले हमारे देश में 50 करोड़ से अधिक लोग हिंदी बोल लेते हैं। लंदन, न्यूयॉर्क और वाशिंगटन को छोड़िए, तीन दशक पहले पंजाब के गांवों में हिंदी समझने वालों की संख्या बहुत सीमित थी। जब मैं आतंकवाद ‘कवर’ करने जाता था, तो हिंदी में जवाब देने वाले बहुत कम मिलते थे। आज बिहार और उत्तर प्रदेश के बच्चे वहां की माध्यमिक शिक्षा परिषदों के इम्तिहानों में टॉप करते हैं। माझा हो या दोआबा, जहां जाता हूं, हिंदी और हिंदीभाषी पाता हूं। इन दिनों पंजाब में पंजाबी के अखबारों से कहीं ज्यादा प्रसार हिंदी के अखबारों का है। गुजरात और बंगाल में तो पहले ही दिक्कत कम होती थी, पर अब कर्नाटक या तमिलनाडु के विकसित होते क्षेत्रों में हिंदी जानने-बोलने वाले मिल जाते हैं। हिन्दुस्तान के बाहर भी करोड़ों लोग हिंदी समझते हैं।

इसीलिए हिंदी वालों से एक आग्रह है। इस 14 सितंबर को हिंदी दिवस हीन-भावना से नहीं, बल्कि सिर ऊंचा कर मनाएं। साथ ही यह संकल्प भी लिया जाए कि ‘हिंदी हैं हम वतन है हिन्दोस्तां हमारा’ के कारवां को आगे बढ़ाने में हम अपनी तरफ से योगदान करेंगे। एक बात और। ‘हिंदी हैं हम वतन हैं’ को संदेह की दृष्टि से नहीं देखें। यह ठीक है कि इन पंक्तियों को पाकिस्तान के वास्तुकार इकबाल ने रचा, पर कालजयी रचनाओं पर किसी का एकाधिकार नहीं होता। उन्हें उसके सही संदर्भों और प्रसंगों में ही देखा जाना चाहिए, अपनी राष्ट्रभाषा की तरह।

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साभार शशि शेखर ब्लॉग

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