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मूल प्रसंग :भक्त, भक्ति-योगी और उसका विश्वास-इन्द्रा धीर वडेरा


प्रश्न :सुना है, “भक्त ही निखरी हुई चेतना का मालिक है !” मुझे आज तक समझ नहीं आई कि भक्त कौन है; आप इस विषय में मेरी मदद करेंगी ? भक्त के कुछ ऐसे लक्षण कहिए जिस से भक्त की ठीक-ठीक छवि मेरे हृदय पर अंकित हो ?

–प्रोफ़ेसर बलबीर कौर (भारत)

 उत्तर :बलबीर जी, आप ने ठीक सुना है ! भक्त जागरुक है इस लिए वह निखरी हुई चेतना का मालिक है ! वह अपनत्व का विस्तार करता हुआ, विश्व चेतना संग एक होता चला जाता है ! इससे पहले कि हम भक्त की परिभाषा तक पहुंचें, इसी सन्दर्भ में किया गया एक और प्रश्न ले रही हूँ !

 प्रश्न :भक्ति योगी किस कसौटी पर खरा उतरना चाहिए ? मुझे कर्म-योग और ज्ञान योग के विषय में तो थोड़ी बहुत जानकारी है लेकिन भक्ति योगी के विषय में जानकारी बहुत धुंधली सी है आप मुझे इस विषय में कुछ ऐसा बताएंगी जो मेरे लिए लाभकारी हो ?
–डा. संतोष कुंद्रा (भारत)

 उत्तर :संतोष जी, भक्त को तो निष्ठा की कसौटी पर ही खरा उतरना होता है ! डा. कुंद्रा और प्रोफ़ेसर बलबीर, इससे पहले कि किसी उदाहरण के माध्यम से भक्त का व्यक्तित्व आपके अंतरपट पर उघाड़ने का प्रयत्न करूँ, तीनो योग संक्षेप में जान लेने आवश्यक समझती हूँ !

 स्वामी राम सुख दास जी कहते हैं : अपना उद्धार करने के लिए मनुष्य को तीन प्रकार की शक्तियाँ प्राप्त हैं !

 करने की शक्ति                ( बल )              संकल्प प्रधान

जानने की शक्ति              ( ज्ञान ) मेधा प्रधान

मानने की शक्ति               ( विश्वास )         भावना प्रधान

 करने की शक्ति निःस्वार्थ भाव से संसार की सेवा करने के लिए है, जो कर्म योग है; जानने की शक्ति अपने स्वरूप को जानने के लिए है, जो ज्ञान योग है; और मानने की शक्ति भगवान को अपना तथा अपने को भगवान का मान कर सर्वथा भगवान के समर्पित होने के लिए है, जो भक्ति योग है ! जिसमें करने की रुचि अधिक है, वह कर्म योग का अधिकारी है, यानि ‘कर्म मार्ग अपनाएगा’  ! जिसमें अपने आप को जानने की जिज्ञासा अधिक है, वह ज्ञान-योग का अधिकारी है यानि ‘ज्ञान-मार्ग अपनाएगा ! जिसका भगवान पर श्रद्धा-विश्वास अधिक है, वह भक्ति योग का अधिकारी है यानि ‘भक्ति मार्ग अपनाएगा’ ! यह तीनों ही योग-मार्ग परमात्मप्राप्ति के स्वतन्त्र साधन हैं !

 डा. कुंद्रा और प्रोफ़ेसर बलबीर, आपके मूल प्रश्न भक्त पर है इस लिए अब हम भक्तियोग के विषय में ही बात करते हैं ! विश्वात्मा बावरा जी एक भक्त का वर्णन किया करते थे : भारत में ऋषिकेश से ऊपर नौ मील की दूरी पर एक नीलकंठ महादेव नामक तीर्थ स्थान है ! वहां पर “कालुराम” नाम का एक भक्त रहता है ! वह रास्ता साफ़ करता है ! नीलकंठ महादेव के लिए तीन तरफ से रास्ता आता है ! सवेरे चार बजे उठकर कालुराम भक्त रास्ता साफ़ करने लग जाता है ! प्रातः होते-होते तीनों तरफ वह आधा मील तक रास्ता साफ़ कर देता है ! यही उसका नित्यकर्म है ! नीलकंठ महादेव तीर्थ स्थान में बड़े से बड़े महात्मा भी जब आते हैं तो कालुराम का दर्शन नहीं हुआ तो वह अपनी यात्रा असफल मानते हैं !

वह देह पूजनीय है इस लिए बड़े-बड़े संत, विद्वान भी कालुराम को नमस्कार करते हैं !

बावरा जी का कहना है : “लोग उसके पांव छूने को दौड़ते हैं तो वह कहता है, ‘नहीं बाबू, मैं तो हरीजन हूँ, मेरे को नहीं छूना !’ जब वह ऐसा कहता है तो लोग रो देते हैं उसकी सरलता पर ! बड़े-बड़े संत उसे सिद्ध पुरुष मानते हैं ! “

क्यों ? वह झाडू ही तो लगाता है ! क्या विशेषता है उसके झाडू लगाने में ? भगवान के भक्त इस रास्ते से आते हैं, उन्हें किसी प्रकार का कष्ट न हो यह उसकी भावना है ! वह बिना कुछ चाहे पर-हित किए जा रहा है !

 इस संदर्भ में गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं :

 “पर हित सरिस धर्म नहिं भाई, पर पीड़ा सम नहिं अधमाई…” भाव : दूसरों के उपकार के बराबर धर्म नहीं है और दूसरों को कष्ट देने के बराबर नीचता नहीं !

 कालुराम ने जीवन भर उत्तम कर्म किया है ! वह तो समर्पण की भावना से दूसरों की सुख-सुविधा के लिए बिन फल चाहे कर्म किए जा रहा है ! परिपक्व हुई भगवतार्थ भावना का चलता फिरता दृष्टांत “कालुराम” भक्त की स्पष्ट परिभाषा है !

 कालुराम अपनी आत्मा में स्थित है, वह अपने आप में तृप्त है ! लोग भक्त कालुराम को सम्मान की दृष्टि से देखते हैं फिर भी उसे अहं छू नहीं पाता ! यह सारे लक्षण ज्ञान-योगी के हैं ! उसका करने में रुझान है, लेकिन कर्तापन का त्याग है, वह विश्व हित के लिए कर्म किए जा रहा है यह सारे लक्षण कर्म योगी के हैं ! फिर वह भक्त कैसे ?

 डा. कुंद्रा और बलबीर जी, भक्त सरल है, भक्त समर्पित है, भक्त अहम् भाव से दूर है और विशेष बात तो यह है कि भक्त दूसरों के जीवन के लिए उपयोगी भी है !

 भक्त की प्रसन्नताभगवान के साथ रिश्ते के तंतु बुन लेने में है ! समर्पित भावना से भरा हुआ अन्तःकरण, प्रभु के साथ रिश्ते का भाव ही भक्त के अंतःकरण की सुख और शान्ति का साधन है ! 

संक्षेप में एक पौराणिक कथा का वर्णन करना चाहूँगी :

एक सज्जन नें बहुत सी बकरियाँ पाल रखी थीं ! समय ऐसा आया कि उसकी एक एक करके बकरियाँ मरने लगीं ! जब एक बकरी रह गई तो वह चिंतित हुआ कि यदि वह भी मर गई तो वह क्या करेगा ! इस संताप को मिटाने वह एक साधु के पास गया और अपनी समस्या बताई ! साधु नें कहा कि जरा यह एक पौंड़ आटा इस घर में छोड़ आओ फिर समाधान निकालते हैं ! वह सज्जन उस घर पर पहुँचा और उस घर की लक्ष्मी दरवाजे पर आई तो उसने साधु का संदेश देते हुए आटे का छोटा सा झोला आगे कर बताया कि महात्मा जी नें इसे भेजा है ! गृह लक्ष्मी नें कहा ठहरो, और अपने बेटे को आवाज़ लगा कर कहने लगी कि बेटा जरा देखो रसोई में आज के लिए अन्न है ? कुछ क्षण बीते तो बेटे नें आवाज़ देकर कहा, “माँ आज के लिए है !”
गृह लक्ष्मी ने उस सज्जन से विनय की, ” यह आटा कहीं और दे जाओ !”

जरा सोचो, ‘…एक वक्त की रोटी के लिए आटा है, इस लिए आटा कहीं और दे आओ!’ कैसा अटल विश्वास है उस निराकार प्रभु पर’ !

 कबीर जी कहते हैं :
“सांई इतना दीजिए, जामें कुटुंब समाय !

मैं भी भूखा न रहूं, साधु न भूखा जाय !!

हरिजन गांठि न बाधहीं उदार समाना लेय !

आगे पीछे हरि खड़े, जो मांगै सो देय !!”

 कबीर जी स्पष्ट शब्दों में कहते हैं : भक्त प्रभु से उतना ही मांगता है जितने से उसके परिवार का निर्वाह हो सके और वह घर पर आए साधु को भी भोजन करवा सके ! जिसके हृदय में विश्वास का बसेरा है, जिसे प्रभु की सत्ता का अनुभव है उसे ज्यादा लेने से भी क्या प्रयोजन ? उसके तो हृदय में द्वंद की ही कमी है !

 प्रोफ़ेसर बलबीर, आप ने भक्त के लक्षण मांगे हैं : आज के लिए शुक्र गुज़ार तो हो लूं, कल नहीं मिलेगा तो उसकी मर्जी !—हर-पल, कदम-कदम पर प्रभु का धन्यवाद करते हुए, उस पर एक अटूट विश्वास कायम रखना  भक्त का लक्षण है ! जब जरूरत होगी प्रभु देंगे, यह विश्वास भक्त की जागीर है ! देखा जाए तो यह प्रमाण क्या कम है कि प्रभु हमारे खाने पीने का प्रबंध पहले करते हैं, और फिर हमें जन्म देते हैं !

 प्रोफ़ेसर बलबीर और डा. कुंद्रा जी, जहां तक मानने की शक्ति की बात आती है, इस विषय में श्री अरविंदो कहा करते थे कि जीवन में बार-बार हमें प्रभु की सत्ता की झलक मिलती है और कई बार हमारी समझ हमें यह भी बताती है कि यह बात प्रभु के किए बिना हो ही नहीं सकती थी लेकिन इंसान उसकी सत्ता मानने को तैयार ही नहीं; वह तो जान कर भी उसे मानने तो तैयार नहीं, इस लिए वह फिर से उसी प्रश्न को ले बैठता है “भगवान है भी या नहीं ?”

 कहने का अभिप्राय यह है कि ना मानने की हठ है तो जान कर भी शंका करने से कोई रोक नहीं सकता और इस के लिए भगवान नें ही हमें पूरी छूट दे रखी है !

 आइंस्टाइन का कथन है कि मानव ब्रह्मांड का एक हिस्सा है, मानव के विचार और उसकी भावनाएं ही उसे यथार्थ-चित्रण से ग़लत दृष्टिकोण की और ले जाती हैं और माया से भ्रमित वह अपने आप को सब से अलग-थलग मान कर चलने लगता है ! यह विचारों और भावनाओं द्वारा बुना हुआ भ्रमित जाल ही उसे अपने आप में कैदी बना छोड़ता है ! हमारा कर्तव्य विश्व के प्रति संवेदन-शील हो, अपने आप को इस माया-संबंधी भ्रम जाल से मुक्त करवाना है !

आइंस्टाइन का कथन उद्धरित करने से मेरा अभिप्राय भक्ति योगी की ओर संकेत करने से है, भक्ति योगी कहो या भक्त, वह दूसरों को गले लगाते हुए, दूसरों की जरूरत को अपनी जरूरत मान, अपनत्व का दायरा विकसित करते हुए, वह अपने आप को माया के भ्रम-जाल से मुक्त करता चला जाता है !

 अंत में मैं तो यही कहना चाहूंगी कि शांत-चित्त, आत्म-स्थित हो विश्वास से जीना एक उच्च दृष्टिकोण रख कर जीवन बसर करना है ! मैंने जीवन जीया है और लम्बे जीवन का अनुभव एक बात स्पष्ट कर गया है कि उस पर विश्वास एक अटूट भरोसा तो है ही, विश्वास एक स्वस्थ दृष्टिकोण भी है ! लेकिन, उस निराकार प्रभु पर ऐसा अटल विश्वास बनाए नहीं बनाता, ऐसी पावन सोच, ऐसा स्वस्थ दृष्टिकोण, ऐसा उच्च कोटी का समर्पण उसकी कृपा बरसे तभी होता है यह मेरी अपनी मान्यता है !!!

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