मोल्डिंग सिस्टम — अलका सिन्हा बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ नीति आयोग की पहली बैठक 6 फरवरी भारत ने किया पृथ्वी-2 मिसाइल का सफल प्रायोगिक परीक्षण व्यक्ति पूजा को अनुचित नहीं मानता है राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ
दिव्या माथुर की कहानी : अंतिम तीन दिन अमेरिकी कोर्ट ने सोनिया गांधी से पासपोर्ट दिखाने को कहा अमेरिकी न्यायाधीश ने 1984 के दंगों पर आदेश सुरक्षित रखा यमन में डूबा जहाज, 12 भारतीय नाविक हुए लापता पंजाबी गायक शिंदा को लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड

भारत में शिक्षा की दुर्दशा – डॉ. वेदप्रताप वैदिक


  नई दिल्ली , फरवरी ०3 :   जो  देश  शिक्षित  होते हैं,  वे  शक्तिशाली  भी  होते  हैं  और संपन्न भी!   दुनिया का एक भी शक्तिशाली  और संपन्न देश ऐसा नहीं है,  जिसमें प्रायः सभी लोग साक्षर और शिक्षित नहीं हैं। भारत को आजाद हुए 66 साल हो गए लेकिन अभी भी यह गरीब क्यों हैं,   कमजोर क्यों हैं, भ्रष्टाचारमय क्यों है? क्योंकि यहां शिक्षा 50 प्रतिशत भी नहीं है। हमारे देश की आधी से अधिक जनता अशिक्षित है।   सरकार दावा करती है कि 63 प्रतिशत लोग साक्षर हैं। मान लें कि यह आंकड़ा सही है तो भी क्या? साक्षर का मतलब क्या? यही न कि वह व्यक्ति अपने   दस्तखत कर सकता है। उसे अक्षर-ज्ञान है। वह अखबार भी पढ़ सकता है कि नहीं, यह पता नहीं। उसके द्वारा किताबें पढ़ने का तो सवाल ही नहीं उठता।    अर्थात साक्षर होने का मतलब शिक्षित होना नहीं है।
अभी विश्व-शिक्षा की जो ताजा रपट आई है, उसके अनुसार   भारत में लगभग 29   करोड़ लोग निरक्षर हैं।    यदि 29 करोड़ निरक्षर हैं तो    अशिक्षित कितने होंगे? कम से कम 60 करोड़ तो होंगे। दुनिया के सबसे ज्यादा निरक्षर लोग अकेले भारत में रहते हैं। दुनिया में जितने निरक्षर हैं, उनके 37 प्रतिशत लोग अकेले भारत की शोभा बढ़ा रहे हैं। याने भारत दुनिया का सबसे निरक्षर और सबसे अशिक्षित देश है। यह वही भारत है, जिसे हम जगद्गुरु कहते नहीं अघाते। यही कारण है कि इतना प्राचीन और इतना विशाल होते हुए भी भारत आज फिसड्डी देश बना हुआ है।
क्या हमने सोचा कि पिछले 66 साल में हम सारे भारत को साक्षर और शिक्षित क्यों नहीं कर पाए? इसका पहला कारण तो यह है कि हमने शिक्षा को सरकारों और दुकानदारों के भरोसे छोड़ दिया। यदि देश में कोई जन-आंदोलन चला होता, लोग    स्वेच्छा से पढ़ते-पढ़ाते, धार्मिक, सांस्कृतिक संस्थाएं यह बीड़ा उठातीं, राजनीतिक दल अपने कार्यकर्ताओं को प्रेरित करते तो आज भारत में कोई भी   अशिक्षित नहीं होता।    अशिक्षा के फैलाव का दूसरा सबसे बड़ा कारण हमारे देश में अंग्रेजी की अनिवार्य पढ़ाई है। बच्चे सबसे ज्यादा किस विषय में फेल होते हैं? अंग्रेजी में! फेल होने पर उनमें हीनता-ग्रंथि घर कर लेती है। इसीलिए 5वीं कक्षा से बच्चे पाठशालाओं से पलायन करने लगते हैं। यह हीनता जीवन-भर उनका पीछा नहीं छोड़ती। करोड़ों बच्चों का बचपन में ही मनोबल टूट जाता है। इसीलिए हर साल 22 करोड़ बच्चों में से सिर्फ 40 लाख युवक स्नातक बन पाते हैं। अंग्रेजी की अनिवार्यता को खत्म किए बिना सर्व-शिक्षा अभियान सफल ही नहीं हो सकता। तीसरा कारण है, भारत में दो तरह की शिक्षा का जारी रहना। हमारे देश में जब तक हजारों-लाखों रु. शुल्क लेनेवाले अंग्रेजी माध्यम के ‘पब्लिक स्कूलों’ पर प्रतिबंध नहीं लगेगा, शिक्षा का प्रसार हो ही नहीं सकता। सरकारी नौकरियां और सामाजिक प्रतिष्ठा इन्हीं स्कूलों के बच्चों के लिए आरक्षित होती है। ऐसे में ग्रामीणों, गरीबों और वंचितों के बच्चों का   शिक्षा-मात्र से उच्चाटन हो जाता है।    वे सोचते हैं, आगे पढ़कर क्या करेंगे? अभी से कुछ काम पकड़ें ताकि अपना और अपने परिवार का पेट भरें। भारत की इस दुर्दशाग्रस्त शिक्षा को कौन सुधारेगा।
*****

dr.vaidik@gmail.com

242, सेक्टर 55, गुड़गांव-122011, फोन: 0091-0124-405-7295

मो. 98-9171-1947,

हिन्दी में राष्ट्रीय - अंतरराष्ट्रीय समाचार, लेख, भाषा - साहित्य एवं प्रवासी दुनिया से नि:शुल्क जुड़ाव के लिए
अपना ईमेल यहाँ भरें :

Leave a Reply