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कविता होंठों की नहीं आंखों की जुबान है – गोपालदास नीरज


 वर्तमान  समय  के  सर्वाधिक  लोकप्रिय कवि गोपालदास नीरज ने अपनी मर्मस्पर्शी  काव्यानुभूति तथा सहज  सरल भाषा द्वारा हिन्दी कविता को  एक नया मोड़ दिया।  बच्चन जी के बाद उन्होंने नई पीढ़ी को सर्वाधिक प्रभावित किया।  जनसामान्य की  दृष्टि  में प्रेम के अनन्य गायक संत कवि नीरज राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकरके  कथनानुसार हिन्दी की वीणा हैं। दर्द दिया‘, ‘प्राण गीत‘, ‘आसावरी‘, ‘बादर बरस गयो‘, ‘दोगीत ‘, ‘नदी किनारे‘, ‘नीरज की गीतिकाएं‘, ‘संघर्ष‘, ‘विभावरी‘, ‘नीरज की पाती‘, ‘लहर पुकारे‘, ‘मुक्तकी‘,  ‘गीत भी अगीत भी‘  उनके प्रमुख काव्य संग्रह हैं।  अभी हाल ही में अक्षरम् संगोष्ठी के संपादक नरेश शांडिल्य और सहसंपादक शशिकांत उनसे मिलने उनके  निवास स्थान अलीगढ़ गए। वहां नरेश शांडिल्य  ने उनसे  कई  साहित्यिक बिन्दुओं पर विस्तार से बातचीत की। प्रस्तुत हैं  उस बातचीत के प्रमुख अंश…   ‘गोपालदास नीरजआज हिन्दी जगत का अत्यन्त लोकप्रिय गीतकार है।  देश-विदेश में उसकी चर्चा है, उ सकी ख्याति है, ये सब सुनकर  आपको कैसा लगता है?

नीरज‘मान और अपमान हमें सब दौड़ लगे पागलपन की।’  जो भी कुछ मिलता गया अच्छा भी लगा और नहीं मिला तो बुरा भी नहीं लगा।  दरअसल मेरी तबीयत फकीर जैसी है।  इसलिए मुझे ज्यादा की कभी इच्छा नहीं रही।  पर अनचाहे जो मिल गया ये शायद मेरे पिछले जन्मों का पुण्यफल है।  अच्छा भी लगता है और कोई गाली भी दे जाए तो बुरा भी नहीं लगता।

कहा जाता है कि आपने इस मुकाम पर पहुंचने के लिए बहुत संघर्ष किया है। क्याक्या संघर्ष रहे?

नीरज : मैं ये मानता हूं कि बिना कष्ट उठाए बिना संघर्ष किए कोई भी मंजिल प्राप्त नहीं होती। बचपन में मेरे पिता की मृत्यु हो गई।  तभी से मेरा संघर्ष शुरू हो गया। तभी से दूसरे के घर रहने के लिए चला गया। 10 साल वहां रहा।  सो अकेलापन रहा। तो अन्तर्मुखी हो गया। अन्तर्मुखी होने पर एक दिन अपने आप कविता फूट गई।  कविता लिखना शुरू कर दिया।  मैंने गाते सुना कवि सम्मेलन में रंग जी को तो मुझे लगा कि इनसे अच्छा तो मैं गा लेता हूं। मैंने गाना शुरू कर दिया और लोकप्रिय होने लगा। लोकप्रियता तो मेरे पीछे-पीछे भागती रही। मेरी ज्योतिष में भी रुचि है। मैंने अपना जब होरोस्कोप पढ़ा तो उसमें लिखा था विश्वविख्याता, ऐरावत पर सवारी करे। मुझे लगा कि जो बच्चा गरीब घर में पैदा हुआ है। खाने तक को भी नहीं था। जब विश्वविख्यात की बात पढ़ी तो बड़ा आश्चर्य हुआ कि भई ये कैसे हो सकता है। …मैं 83 में सबसे पहले अमरीका, कनाडा गया था। अमरीका, कनाडा, आस्ट्रेलिया, लंदन, मॉरीशस जहां भी गया मुझे मेरी कविता सुनाने वाले मिले। और मेरा नाम हिन्दुस्तान के बाहर पहुंचाया फिल्मों ने। मैं मानता हूं कि किसी भी व्यक्ति या कवि को विदेश तक पहुंचाने का श्रेय सिर्फ फिल्म के पास है। कारवां गुजर गया गीत मैंने एक बार 1954 में लखनऊ रेडियो से पढ़ा था हिन्दी कवि सम्मेलन में। उस समय पूरे देश में हिन्दी कवि सम्मेलन बड़े प्रेम से सुने जाते थे। टी.वी. था नहीं तो उस समय उर्दू के मुशायरे व  हिन्दी के कवि सम्मेलन बड़े लोकप्रिय हुआ करते थे। मैं ओवर नाइट सारे देश में लोकप्रिय हो गया। क्योंकि पहली बार हिन्दी वालों ने नया फ्रेज सुना था  कि हिन्दी का कोई कवि अपनी कविता में ‘कारवां गुजर गया’ जैसा शब्द बांध दे। बाद में इसकी लोकप्रियता को भुनाने के लिए एक पिक्चर बनी 1960 में  ‘नई उमर की नई फसल।’ वे बोले हमें इसके लिए आपका ये गीत चाहिए। मैंने कहा कि भई मैं फिल्म में लिखता नहीं, आपको चाहिए तो ले लीजिए।

वे बोले कि आप फिल्मों में गीत लिखिए। मैंने कहा कि मैं तो सर्विस में हूं इधर,  सो मैं तो आ नहीं सकता।  आपको मेरी कविता लेनी है तो ले लो।  उन्होंने मेरी कविताएं लेकर  फिल्म बना दी। सौभाग्य से सब गीत हिट हो गए। और कारवां गुजर गया रफी ने जो गा दिया तो विश्व में पहुंच गया। जहां भी मैं गया तो मेरा परिचय कारवां गुजर गया’ के कवि के रूप में दिया गया। अभी भी मुझे न्यूयार्क जाना था पर स्वास्थ्य खराब रहने के कारण मैं नहीं जा सका।  कहने का मतलब ये है कि संघर्ष मैंने खूब किया। पहले 10 साल तक मैं क्लर्क रहा,  3-4 साल रहा स्टेनोग्राफर,  2 साल डिस्ट्रिक्ट इन्पफोरमेशन ऑफीसर रहा,  फिर दो साल बेकार भी रहा।  पेट पालने के लिए अपनी भूख शांत करने के लिए कभी-कभी पान-बीड़ी भी बेचे सड़क पर बैठ कर। गंगा-जमुना में डूब-डूब कर पैसे  भी ढूंढ़े, रिक्शा भी चलाया। क्योंकि मैंने कभी भी श्रम को छोटा नहीं समझा। श्रम का बड़ा मूल्य है। आप अगर पान बीड़ी बेचें तो क्या बुरा करते हैं। आप रिक्शा चलाते हैं पर बेईमानी नहीं करते। टयूशन मैंने की, कोर्ट में बैठकर टाइप किया है। संघर्ष मैंने किया और संघर्ष का फल भी मुझे मिला।  एक समय था जब इस शरीर को लेकर भागते हुए हिमालय पर चढ़ जाने की शक्ति थी। लेकिन जैसे-जैसे सुविधाएं मिलती गईं वैसे-वैसे संघर्ष करने  की क्षमता कम होती गई। संघर्ष ये तुमने दिखला दिया कि पौरुष के आगे / मुश्किल को अपनी ही मुश्किल पड़ पाती है / हिम्मत गर अपनी हारे  नहीं मुसाफिर तो / मंजिल खुद उसको बढ़कर गले लगाती है।

आपने हिन्दी फिल्मों को बेहतरीन गीतों से नवाजा। कारवां गुजर गयागीत इस सदी का मील का पत्थर कहा जा सकता है। शर्मीली के गीत हों या नई उमर की नई फसल के गीत हों, गेम्बलर के गीत हों, एक से एक बेहतर गीत आपने फिल्मों में दिए। आपका कोई बेहद पसंदीदा गीत?

नीरज : एस.डी. बर्मन के साथ मैंने काम किया था,  शंकर जय किशन के साथ भी किया,  रोशन के साथ भी किया, मदन मोहन के साथ भी किया।  पर एस.डी. बर्मन साहब ने जिस तरह मेरे गीत बनाए वैसा किसी और ने किया हो, मुझे लगता नहीं।  क्योंकि वो नए-नए प्रयोग करते थे। और मैंने भी नए-नए प्रयोग किए भाषा के। मुझे अपना सबसे ज्यादा पसंद है गीत फूलों के रंग से दिल की कलम से तुझको लिखी रोज पाती।इसकी विशेषता ये है कि इसमें अंतरा पहले है मुखड़ा बाद में है। ये एक एक्सपेरीमेंटल गीत था। फूलों के रंग से दिल की कलम से तुझको लिखी रोज पाती / कैसे बताऊं किस किस तरह से पल पल मुझे तू सताती / तेरे ही सपने मैं लेकर के सोया तेरी ही यादों में जागा / तेरे खयालों में खोया रहा मैं जैसे कि माला में धागा / बादल बिजली चंदन पानी जैसा अपना प्यार। लेना होगा जनम हमें कई-कई बार / इतना मदिर इतना मधुर तेरा मेरा प्यारयहां से शुरू होता है गीत। ये हुआ मुखड़ा। अब एक प्रयोग उन्होंने किया कि न मुखड़ा न अंतरा है सब नज्म है।  और वो नज्म भी बहुत हिट हुई। दिल आज शायर है गम आज नग्मा है शब ये ग़ज़ल है सनम।‘  पूरा रुपक है इसमें गेंबलर का। दिल आज शायर है गम आज नग्मा है शब ये ग़ज़ल है सनम / गैरों के शेरों को ओ सुनने वाली हो इस तरफ भी करम /  आके जरा देख तो तेरी खातिर हम किस तरह से जिए / आंसू के धागे से सीते रहे हम जो जख्म तूने दिए / चाहत की महफिल में गम तेरा लेकर किस्मत से खेला जुआ / दुनिया से जीते पर खुद से हारे यूं खेल अपना हुआ।तो वो भी हिट हुआ। एस.डी. बर्मन ने जो गीत दिए मैं उनको सबसे बड़ा म्यूजिक डायरेक्टर मानता हूं। वे नए-नए प्रयोग करते थे। इसीलिए उनके एवर ग्रीन सांग्स हैं। वो आज भी लोकप्रिय हैं। शंकर जयकिशन भी बनाते थे धुनें परन्तु वे थोड़े दिनों तक रहते थे जिन्दा। पर उन्होंने साहित्यिक मानदंडों को ग्रहण करते हुए खूब भाषा ली मेरी। ‘सांसों की धड़कन सपनों की गीतांजलि तू।ऐसे शब्द कहां आते थे पहले? इतना मदिर इतना मधुर जैसे शब्द आते थे? उद्गम, संगम कहीं आते थे?  क्या ‘नीरज नैना’ जैसा शब्द चला दिया। कहने का मतलब है कि अगर ऐसे ही नए-नए लोग आते रहते और नए-नए प्रयोग करते तो बड़ा अच्छा रहता। अब तो क्या है कि दो चार गीतकार गुलजार,  जावेद अख्तर व एकाध को छोड़कर कुल सौ पचास शब्द हैं जिनमें फिल्मों के गीत घूमते रहते हैं। नए प्रयोग नहीं करते लोग।

ऐसा कोई फिल्मी गीत जिसे वैसी ख्याति तो नहीं मिली लेकिन आपको लिखकर बहुत संतुष्टि हुई हो?

नीरज : मुझे तो सभी गीतों में संतुष्टि रहती थी।  क्योंकि वो तो टयून पर लिखवाते थे। एस.डी. बर्मन व अन्य सभी पहले टयून देते थे। मेरे सभी गीत टयून पर ही लिखे हुए हैं।  मैंने जो गीत लिख दिया वह उन्हें अच्छा पसंद आया।

आपका हिन्दी फिल्मों से बहुत जल्दी मोहभंग हो गया। आप वापस साहित्य जगत में लौट आए ऐसा क्यों?

नीरज : एक बात याद रखना कि फिल्मी दुनिया में लेखक और म्यूजिक डायरेक्टर का एक मेंटल एडजस्टमेंट हो जाता है।  दोनों एक दूसरे की जरूरत व पसंद को समझने लगते हैं।  अब क्या हुआ… जब मेरी पिक्चर सिल्वर जुबली कर रही थी ‘शर्मीली’ और दूसरी फिल्म ‘ मेरा नाम जोकर’ सुपर फ्लॉप रही। पर उसमें मेरा लिखा गीत ‘ऐ भाई जरा देख के चलो’ सुपर हिट हुआ।  ये मेरी ही बनाई हुई टयून है और मेरा ही कांसेप्ट है।  इसमें राजकपूर का कहीं कुछ नहीं हैं।  वे जानते ही नहीं थे कि जोकर क्या गाएगा।  ये गीत मैंने अपनी पुरानी कविता राजमार्ग के पदयात्री से लिया था। क्योंकि ये ब्लैंक वर्स है। यह आजतक लिखा ही नहीं गया था। फिल्मों में गीत लिखे जाते थे, गजलें, भजन, दोहे, चौपाई सब लिखी जाती थी पर फ्रीवर्स नहीं लिखा गया था। लेकिन मैंने ब्लैंक वर्स लिखा। राजकपूर भी नहीं जानते थे कि ब्लैंक वर्स भी लिखा जा सकता है। फिर मैंने जब गीत बनाकर दिया उसमें सर्कस के माध्यम से जीवन का पूरा दर्शन दिया। ‘दुनिया ये सर्कस है’, ये गीत सुपर हिट हुआ। इसकी टयून भी मैंने बनाई। जब ये गीत लेकर शंकर जयकिशन जी के पास जाया गया तो वे बोले कि ये क्या गीत लिखा है? ‘ऐ भाई जरा देख के चलो, आगे ही नहीं पीछे भी, बाएं भी नहीं दाएं भी’ इसकी क्या टयून बनेगी? तो तब मैंने स्वयं इसकी टयून बनाई। मुझे सबसे ज्यादा किसी गीत को लिखने पर अगर सेटिस्फेक्शन हुआ तो इस गीत पर क्योंकि इसका ओरीजिनल कान्सेप्ट भी मेरा बनाया हुआ था।  यह फिल्म इंडस्ट्री का एक टर्निंग प्वाइंट साबित हुआ।  ऐसा गीत पहले कभी आया ही नहीं था।  ये गीत आज तक बजता है। लेकिन बाद में मेरा मन वहां नहीं रमा और मैं वापस लौट आया। रोज-रोज के एडजस्टमेंट मुझे रास नहीं आए।

आप एक लम्बे समय तक कवि सम्मेलन के राजा रहे और आज भी लोग बड़े आदर सम्मान से बुलाते हैं। मंचों पर गीतों ग़ज़लों की प्रस्तुति का आपका अपना एक अलग ही अंदाज है। एक जादूसा, एक खिंचावसा आपकी आवाज में है। ऐसी प्रस्तुति का क्या राज है?

नीरज : (हंसते हुए) कारण क्या है कि एक तो मेरी भाषा जो न  हिन्दी है न उर्दू है वह प्रेम की भाषा है।  अपनी बानी प्रेम की बानी घर समझे न गली समझे /  या इसे नंदलला समझे जी या इसे नंदलली समझे / हिन्दी नहीं ये उर्दू नहीं ये है ये पिया की कसम / इसकी सियाही आंखों का काजल दर्द की इसकी कलम / लागे किसी को मिसरी सी मीठी कोई नमक की डली समझे।सबसे बड़ी चीज तो रही मेरी भाषा। वो भाषा जो हृदय की भाषा है। इसमें बनावट कहीं नहीं है। मेरे जीवन में भी देखो बनावट कहीं नहीं है। आदमी अपने सृजन में नहीं छिप सकता। जैसा होगा वैसा ही सामने आ जाएगा। आप लोग आए तो हम तो जैसे फकीर से पड़े थे वैसे ही पड़े हैं। और इन्टरव्यू देने लगे। अब आप देखिए, मेरा रहन-सहन एक सामान्य सहज से आदमी जैसा है। तो सबसे बड़ी चीज तो ये थी कि सहज और सरल जीवन और वैसी ही सहज और सरल मेरी भाषा। दूसरा मेरी आवाज करुणा मिश्रित है।  यह विशेष रूप से स्त्रियों को बहुत पसंद है। दूसरी चीज मैंने जीवन के शाश्वत मूल्यों पर कविता लिखी है। आज के चलताऊ राजनीतिक विषयों पर रचनाएं नहीं लिखी हैं। कविता का ढंग क्या है? शाश्वत मूल्य जो जीवन के हैं उन्हें अपहोल्ड करना और फिर शिष्टता के साथ अपहोल्ड करना है। अगर राजनीति में भी प्रवेश करते हो, राजनीति पर व्यंग्य करना चाहते हो तब भी शिष्टता को नहीं छोड़ना चाहिए। अब जैसे मैं आज के समाज की स्थिति पर कहता हूं, आजादी के बाद की स्थिति हैµ मौसम का ये हाल कि वासंती ऋतु में कलियां उदास हैं / गुनी गुलाबों की बस्ती में शासक बन बैठे पलाश हैंतो ये है व्यंग्यात्मक भाषा। दूसरी बात क्या है कि आसान से आसान जबान का इस्तेमाल किया। आप देखें कैसे आसान शब्दों में बड़ी बात कही है मैंने जितना कम सामान रहेगा / उतना सफर आसान रहेगा।ये सिद्धांत हर जगह लागू होता है। बस में, ट्रेन में, पर जीवन के सफर में सबसे ज्यादा लागू होता है। इससे ज्यादा आसान भाषा नहीं हो सकती। गजल में भी मैंने प्रयोग किए पर मैंने कभी भी स्लोगन नहीं दिया। अब आजादी के बाद क्या हुआ कि ये देश पतन की तरफ गिरता चला गया। यह इसलिए हुआ कि देश राजनीति के गले में ही सारे पुष्पहार डालता रहा। संत, ज्ञानी, विद्वान, महापुरुष सब पीछे चले गए। ओशो जैसे महापुरुष आए और चले गए। राजनीति देश का शरीर बनाती है। यह पुल बना सकती है, भवन बना सकती है, सड़कें बना सकती है, बिजली दे सकती है, आपको बंद कर सकती है, आपको छोड़ सकती है। सब कुछ शक्ति उसके पास है पर आत्मा का निर्माण नहीं कर सकती। किसी देश की आत्मा का निर्माण तो संत, कवि, कलाकार,  महापुरुष, साहित्यकार किया करते हैं। अब इसको कैसे कहा।  अबके सावन में शरारत ये मेरे साथ हुई / मेरा घर छोड़ के कुल शहर में बरसात हुई।अब ये बात कितनी जगह फिट होगी। कविता जो है वो आंख की जुबान है होंठ की जुबान नहीं है। इसकी जो परिभाषा दी गई है हालांकि वह पुरानी है पर सार्थक है जनानों से बात करने का नाम गजल हैस्त्रियों से तो प्रेम की ही बात होगी और प्रेम की बात लम्बी चौड़ी तो हो नहीं सकती। प्रेम की बात आंखों से ज्यादा होती है होंठों से कम होती है। और बड़ी संक्षेप में बड़ी शिष्टता से होती है। तमीज भी चाहिए, शिष्टता भी चाहिए संक्षिप्तता भी चाहिए और इशारा भी चाहिए। अब इधार क्या है कि लोग हिन्दी में बहुत ग़ज़लें लिख रहे हैं पर अधिकांश स्टेटमेंट लिख रहे हैं। ग़ज़ल कम लिख पा रहे हैं। सपाट बयानी नहीं चाहिए। इसमें अगर आप संकेत में अपनी बात नहीं कह सकते तो कैसे काम चलेगा?

हिन्दी कवि सम्मेलनों की वर्तमान दशा और दिशा पर कोई टिप्पणी करना चाहेंगे? मंचों पर अब कविता कितनी है और कविता से इतर कितना है? यानी मंचों की राजनीति पर मंचों की माफियागिरी पर आप क्या कहना चाहेंगे?

नीरज : सन् 1941 में मैंने पहली बार मुंह खोला था। सोहन लाल द्विवेदी ने अध्यक्षता की थी, श्री नारायण चतुर्वेदी जी आए थे मुझे लेकर। बलवीर सिंह ‘रंग’ जी ने काव्य पाठ किया था। उनको सुनकर मैंने कविता पढ़ी और हिन्दी में मैं लोकप्रिय हो गया। पूरे एरिये में व आसपास के डिस्ट्रिक में। क्योंकि आदमी का यश जो है वह फूल की सुगंध के समान होता है। फूल तो एक स्थान पर रहता है पर उसकी सुगंध चारों ओर फैल जाती है। गला मेरा बहुत ही मधुर था। मैं उन दिनों अपने कालेज में ‘सहगल’ कहा जाता था। 1941 से लेकर 60 या 62 तक जब भारत पर चायना का अटैक हुआ तब तक समझो कवि सम्मेलन का स्तर बहुत ऊंचा था। मैथिलीशरण जी आते थे उसमें अध्यक्षता करने, माखनलाल चतुर्वेदी जी आते थे, निराला जी आते थे, पंत जी आते थे, महादेवी जी आती थीं, डा. राम कुमार वर्मा आते थे, दिनकर जी आते थे, बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’ जी आते थे। ये बड़े-बड़े लोग आते थे और बड़े सम्मान के साथ इनको सुना जाता था। और कविता अच्छी पढ़ी जाती थी। बदतमीजी की कोई बात की तो निकाल बाहर कर दिया जाता था। और उसमें सुनने वाले आते थे। रसिक जन आते थे। जो कविता के प्रेमी थे वो आते थे। भीड़ कम होती थी श्रोता ज्यादा होते थे। और पहले कवि सम्मेलन होते थे विद्यालयों में, महाविद्यालयों में और विश्वविद्यालयों में। मुझे याद है लखनऊ युनिवर्सिटी में पढ़ता था… इतना लोकप्रिय हो गया था कि हर महीने मुझे बुलाते थे। वहां मैं कविता पढ़ता तो लोग प्रेम से कविता सुनते और बाद में पूछने आते कि इसका मतलब क्या है? पहले पढ़े-लिखे लोग आते थे कवि सम्मेलनों को सुनने। इसी प्रकार उर्दू के बड़े से बड़े शायर के साथ मैंने पढ़ा। जोश साहब के साथ मैंने पढ़ा, जिगर साहब के साथ मैंने पढ़ा, एहसान दानिश के साथ मैंने पढ़ा, लम्भूराम जोश मल्सियानी के साथ मैंने पढ़ा, अर्श मल्सियानी के साथ मैंने पढ़ा, हरिचंद अख्तर के साथ मैंने पढ़ा, जगन्नाथ आजाद के साथ मैंने पढ़ा, शाद के साथ, शकील के साथ… कोई नहीं छूटा। उर्दू का बड़े से बड़ा कोई शायर ऐसा नहीं जिसके साथ मैंने न पढ़ा हो।

कैफी आजमी को और मुझे साथ-साथ डी. लिट मिला साथ-साथ पद्मश्री मिली। मेरा सौभाग्य है कि मुझे उर्दू के बड़े से बड़े और छोटे से छोटे शायरों के साथ रहने का उनके साथ पढ़ने का सौभाग्य मिला। इसी प्रकार हिन्दी के बड़े से बड़े कवि के साथ मैंने पढ़ा। अब देखिए पहले सुनने वाले कैसे कमेंट करते थे आपको बताता हूं… खंडवा में एक कवि सम्मेलन हुआ था। शायद 1962 या 63 की बात है ये। मुझे बुलाया खंडवा में तो मैं गया। माखनलाल जी उसकी अध्यक्षता कर रहे थे। उसी समय तेनसिंह ने एवरेस्ट पर विजय प्राप्त की थी। मैंने एक कविता तेन सिंह पर लिखी थी। तेन सिंह की एवरेस्ट विजय पर। जब मैंने वो कविता पढ़ी तो सुनने वालों ने कमेंट क्या किया कि कविता का पहला शब्द जो सोना था कविता समाप्त हुई तो वह पारस बन गया। अब देखिए पहले शब्द की क्या तारीफ है ‘आखिर मुट्ठी भर धूल पहुंच ही गई वहां’। आखिर शब्द में कितनी असफला छिपी है प्रयासों की। संघर्ष करते-करते… करते-करते आखिर मुट्ठी भर धूल पहुंच ही गई वहां। छ: बार असफल हुआ। तो एक शब्द से उसके पीछे छिपी असफला व संघर्ष की कहानी भी आ गई इसमें। आखिर मुट्ठी भर धूल पहुंच ही गई वहां / जा सके न पांव जहां इतिहास पुराणों के / आखिर धरती के बेटे ने गूंथ ही दिए / बर्फीले बाल पहाड़ों के चट्टानों के।‘ ‘पर ठहर गर्व का मुकुट न पहना गौरव को / बस यहीं एक तेरे गिर जाने का भय है / कर सका न प्राप्त विजय यदि तू खुद पर ही तो / तेरी ये विजय ही सबसे बड़ी पराजय है।तो देखिए उस समय के कमेंट करने वालों को कि उन्होंने ‘आखिर’ शब्द को किस तरह से सराहा। पर आज ऐसे कविता को समझने वाले लोग कहां हैं? इसी प्रकार से बंबई में एक कवि सम्मेलन हुआ। 1953 में नेपाली जी भी थे, बालकृष्ण शर्मा नवीन जी उसकी अध्यक्षता कर रहे थे। और विद्यावती ‘कोकिल’ शायद आपलोगों ने नाम नहीं सुना होगा। अपने समय की बहुत लोकप्रिय, शिष्ट व पढ़ी-लिखी कवयित्री थी। और कोकिल जैसा कंठ था। एक गीत उन्होंने पढ़ा ‘रस बरसे मैं भींजू’ आध्यात्मिक गीत था। बालकृष्ण शर्मा की आंखें छलछला आईं और वे विद्यावती के चरणों में झुकने लगे। उसी कवि सम्मेलन में गोपाल सिंह नेपाली ने एक कविता पढ़ी ‘चांद मुझे दो पूनम का तुम सारा नील गगन ले जाओ।’ मैंने भी एक कविता पढ़ी जिसमें ये पंक्तियां थीं ‘रूप सौंदर्य इतना लुटाया कि हर भिक्षु के हाथ पर चन्द्रमा धर दिया’ अब दूसरे दिन अखबारों में कमेंट निकला कि देखिए एक कवि है चांद मुझे दो पूनम का, सुंदरतम चीज तो खुद चाहता है और एक है जो कहता है, ‘हर भिक्षु के हाथ पर चन्द्रमा धर दिया।’ इस प्रकार से कमेंट हुआ करते थे। इस प्रकार से सुनने वाले लोग आते थे। इस प्रकार से लिखने वाले आते थे। धीरे-धीरे करके मंचों पर हास्यरस का प्रवेश हुआ। काका हाथरसी ने मंचों पर प्रवेश किया लाल किले में।

लालकिले पर भीड़ बढ़ने लगी। अब ‘बनियों’ का कवि सम्मेलन वो हो गया था विशेष रूप से। गोपाल प्रसाद व्यास हास्य रस के कवि थे। उन्होंने हास्य रस को बढ़ावा दिया। पहले लाल किले जाना एक गौरव की बात होती थी। लेकिन अब तो हम जाते ही नहीं हैं। मना कर दिया। अब वहां कविता सुनने वाले लोग कहां हैं? अब तो वहां भीड़ आती है। वस्तुत: हम लोग बड़े निम्न स्तर पर जी रहे हैं। आज अर्थ युग है इसीलिए सब अर्थ के पीछे भाग रहे हैं। राजनीति जो जनसेवा का सबसे बड़ा माध्यम थी वो सबसे बड़ा उद्योग हो रही है। धर्म भी उद्योग बन गया, कला भी उद्योग बन गई, साहित्य भी उद्योग बन गया। साहित्यकार भी अर्थ के पीछे भाग रहा है। पहले श्रोता आते थे अब भीड़ आने लगी। भीड़ के पास दिमाग होता नहीं। तो भीड़ का मनोरंजन करने के लिए नीचे उतर जाता है कवि। वो कहता है कि ताली बजाई… ताली बजाई भीड़ ने।

कविता की जगह अब अभिनय होने लगा। कहने का मतलब है कि ये सब कुछ इस युग की बलिहारी है। जिस युग में हम जी रहे हैं इसमें सब कुछ बिक चुका है, राजनीति बिक चुकी, धर्म बिक चुका, कला बिक चुकी, साहित्य बिक चुका, ज्ञान बिक चुका, विज्ञान बिक चुका, शिक्षा बिक चुकी। क्या नहीं बिका है? क्या शेष रहा? बेचे कुर्सी के लिए कितनों ने ईमान / डर है कहीं न बेच दें कल ये हिन्दुस्तान।आप क्या कर सकते हैं लेकिन अभी तो और गिरेगा इंसान, किसी भी चीज में मिलावट करने से नहीं चूकता है, बच्चों का बलात्कार करने से नहीं चूकता। और फिर भी हिन्दुस्तान अपने को ‘धार्मिक’ देश कहता है?

हिन्दी में जब नई कविता का दौर आया तो विरोधी लोगों ने गीत छंदबद्ध रचनाओं को दोयम दर्जे का साहित्य करार दिया। और उसे हाशिए पर लाकर पटक दिया। साहित्य की मुख्यधारा से गीत को इस तरह से खारिज करना कहां तक उचित है? गीत परंपरा ने ऐसेऐसे कवि दिए जिनमें हरिवंश राय बच्चन, रामावतार त्यागी, बालस्वरूप राही, भारत भूषण, किशन सरोज आप स्वयं इसके एक सार्थक रचनाकार हुए हैं जिन्होंने कविता मंच को विशेष गौरव प्रदान किया। तो एक वाहियात आलोचना का शिकार क्यों होना पड़ा गीत और छंद कविता को?

नीरज : 25 वर्ष तक षडयंत्र चला है गीत के विरुद्ध पर कहीं उल्लेख नहीं है। सारी पत्र-पत्रिकाएं सारे साधन थे मीडिया के। उन लोगों ने संगोष्ठियां कर करके कविता के अपने आलोचक तैयार कर लिए थे। और इस प्रकार वे गीत को लिजलिजी भावुकता कहते थे। एक बार प्रभाकर माचवे मुझे मिले। मैंने कहा कि भाई एक बात बताओ तुम अगर हमारे काम की प्रशंसा नहीं कर सकते तो कम से कम गाली तो दो। तो वे हंसते हुए बोले कि गाली देने से और प्रचारित हो जाओगे तुम। यानी गाली भी नहीं देना चाहते। आलोचना भी नहीं करना चाहते। अज्ञेय जी से एक बार मैंने पूछा कि आप छंद में क्यों नहीं लिखते तो उनके मुंह से अचानक निकल गया कि छंद में बड़ी मेहनत करनी पड़ती है। लेकिन क्या किया इस नई कविता के आंदोलन ने जो चला 25 वर्षों तक? उससे कविता किताबों में चली गई, लाइब्रेरियों में चली गई। बड़े-बड़े पुरस्कार जीते गए। लेकिन समाज के द्वारा स्वीकृत नहीं हो पाए। क्यों? बड़ी सुन्दर बात कही है इलियट ने “Poetry is although creation of individual minds but it is given to the national mind.” नेशनल माइन्ड क्या है? नेशनल माइंड हमारे संस्कार हैं। और संस्कार एक दिन में नहीं बनते। आप हिन्दू हैं आपके चेहरे पर तो नहीं लिखा। गौ की हम पूजा करते हैं गंगा को अपनी मां मानते हैं, तुलसी की पूजा करते हैं। कविता को यद्यपि व्यक्ति लिखता है पर वह देश के सामूहिक मन को दी जाती है। संस्कार को यह स्पर्श करती है। अब जैसे मैं एक बात कहूं ‘मेरे आंगन के उन शैतान चिरागों के हाथों से चाय का प्याला छिनने वाला है।’ तो आपको हंसी आएगी चाय के प्याले पर। हालांकि चाय पीते हैं आप। लेकिन अगर मैं ये कहूं कि ‘मेरे आंगन के उन शैतान चिरागों के हाथों से दूध-कटोरा छिनने वाला है।’
तो दूध कटोरा हमारे संस्कार हैं। कविता का संबंध संस्कारों से है।

अब इन्होंने चलाया इमेजिस्ट मूवमेंट। “To create an original image is better than the writing of the whole life.” एक नया बिंब दे देना जीवन भर के लेखन से अच्छा है। ये उक्ति थी थेलिस जे लेविंस की। लेकिन ये भूल गए कि बिंब से पहले बिंब का विधान जरूरी है। आपको एक तस्वीर तो मैंने दे दी बढ़िया लेकिन आपको लगानी नहीं आए तो? तस्वीर ही केवल काफी नहीं है, तस्वीर को लगाने की कला भी आनी चाहिए आपको। कहां कोई तस्वीर फिट होगी, कौन सी फिट नहीं होगी, ये भूल गए इसलिए इनके बिंब ऐसे हैं जो हम ग्रहण नहीं कर पाए। हम जो कहेंगे वो हमारे बिंब आप ग्रहण करेंगेµ अपने घर का वो छोटा तुलसी का बिरवा जिस पर घर की हर चूड़ी अर्ध्य चढ़ाती है।‘चूड़ी, अर्ध्य और बिरवा’ के प्रतीक को आम आदमी भी आसानी से ग्रहण कर लेता है। क्या है कविता का काम? संस्कारों को स्पर्श करना, उनका उन्नयन करना है। लेकिन ये सब भूल गए। इसका फल ये हुआ कि इन लोगों ने कविता को अलोकप्रिय कर दिया। लोगों ने कविता की किताब खरीदना बंद कर दिया। प्रकाशक छापते ही कहां हैं आज कविता की किताब? इन्हें कहा गया कि पैसे दे दो और छपवा लो। सो ये लोग पैसे दे आते थे और किताबें छपवा लेते थे। इनको कोई नहीं छापता, लेकिन नीरज 1943 से छप रहा है। 1943 में पहली किताब आई। 1946 में दूसरी किताब आई। 1949 में तीसरी किताब, 1951 में चौथी किताब। 1956 से लगातार अब चार प्रकाशक हो गए हैं। एक तो आत्माराम एंड संस मेरे पुराने प्रकाशक हैं। डायमंड पाकेट बुक्स, हिन्द पाकेट बुक्स, पेंगुइन पाकेट बुक्स और जुड़ गए। हमने कविता को कहां तक पहुंचाया। आप जाइए उर्दू भाषी क्षेत्रों में, हमने कविता को पाकिस्तान में पहुंचाया और लोकप्रिय बना दिया है। 1983 में अमरीका में जाके सबसे पहले दरवाजा खोला कविता के लिए। लेकिन ये कविता को अलोकप्रिय करके आए। इन्होंने कविता के प्रति लोगों में अरुचि उत्पन्न की। पहले प्रभाकर श्रोत्रिय जी कलकत्ते से निकालते थे एक पत्रिका, पर उनमें गीत-वीत नहीं छापते थे। मेरी उनसे इस विषय पर बहुत देर बात हुई तब उन्होंने गीत छापना शुरू किया।

मैंने उनसे कहा कि आप गीतों को न छापकर बहुत गलत काम कर रहे हो। क्योंकि इस देश में हर चीज गाई गई है। लय के बिना यह देश चल नहीं सकता। यहां वेद गाए गए, गीता गाई गई, आयुर्वेद गाया गया, ज्योतिष गाई गई, क्यों? क्योंकि इस देश में नदियां गाती हैं, पहाड़ गाते हैं, झरने गाते हैं, पक्षी गाते हैं, मौसम गाते हैं, फसलें गाती हैं। और सृष्टि का मूल तत्व क्या है? हर चीज यहां लय में चल रही है। लय के बिना सृष्टि की गति नहीं है। हमारी सांसें भी लय में चलती हैं। लय टूटने का अर्थ है जीवन टूट जाना। असंतुलन से संतुलन की ओर गमन ही जीवन है और असंतुलन की ओर जाना मरण है। क्योंकि लय का तालमेल आपके शरीर से है। खून लय में चल रहा है, हृदय लय में धड़क रहा है, आप लय में चल रहे हैं, लय में बोल रहे हैं इसलिए लय के बिना कविता नहीं लिखी जा सकती।

हिन्दी में नव गीत की परंपरा जो शुरू हुई है उसने गीतों की परंपरा का कितना अहित किया है?

नीरज : अहित तो खैर ये क्या करेंगे? साहित्य में भी राजनीति की तरह अपने लाभ के लिए नए-नए स्लोगन लेकर खड़े हो जाते हैं लोग। अंतर क्या है, नवगीत वाले बताएं तो? गीतांतर कह सकते हैं उसे और कुछ नहीं कह सकते। नवगीत नाम गलत है। नवगीत में क्या नया लाए। नया क्या लाए, गीत को और अलोकप्रिय कर दिया। आप लेकर आए आंचलिक भाषा जिसे बम्बई में कोई जानता नहीं, कलकत्ते में कोई जानता नहीं। आप तो प्रयोग कर रहे हो ग्रामीण भाषा का, आंचलिक भाषा का जो कि चल नहीं सकती। इस देश में हिन्दी और हिन्दी में लिखे गीत ही चलेंगे। तो नवगीत भी एक आंदोलन है अपनी तरह का। नवगीत और गीत में कोई खास अंतर नहीं। थोड़े-थोड़े आंचलिक शब्द और थोड़े नए बिंब ले आए बस।

अभी हाल ही में हिन्दी के एक बहुत बड़े आलोचक ने सुमित्रानंदन पंत की एक चौथाई कविताओं को कूड़ा कह दिया। महादेवी वर्मा के किसी कार्यक्रम में उनकी कविताओं पर बोलते हुए उन्होंने यह सब कहा और इसकी अनेक पत्रापत्रिकाओं में चर्चा भी हुई। इस टिप्पणी पर आपके क्या विचार हैं?

नीरज : मैं मानता हूं कि पंत की अगर एक कविता भी संसार की सर्वश्रेष्ठ कविता के समकक्ष रखी जा सकती है तो पंत महान हैं। बच्चन जी ने कितने गीत लिखे हैं पर उनमें से कितने गीत सफल हुए। लेकिन अगर आपने एक भी ऐसी कविता लिख दी या गीत लिख लिया जो संसार पर भारी पड़ जाए तो आप तो रहोगे ही। जब आदमी इतना लिखेगा तो उसमें कुछ तो कूड़ा-करकट होगा। वर्ड्सवर्थ ने भी कितना अधिक लिखा था। बाद में वो भी कूड़ा-कर्कट लिखने लगे थे। पंत की ‘परिवर्तन’ की टक्कर की कोई कविता है क्या? उन्होंने इस कविता में जो सांग रुपक बांधे हैं, कोई नहीं बांध सकता। सर्प का पूरा रूपक है ये।

समय क्या है सहस्र फनों वाला नाग है। सहस्र जगह चल रहा है। लक्ष्य अलक्ष्य न दिखाई देने वाले तुम्हारे चिन्ह। सांप के पैर नहीं दिखाई देते लेकिन सांप दिखाई देता है। इस प्रकार का सांग रुपक बांधना आसान बात नहीं है। जीवन में अगर आपने सौ कविताएं लिखी हैं और दो कविताएं सारे संसार पर भारी पड़ गई तो आप सफल कवि हैं। उन्होंने हजारों कविताएं लिखी हैं तो एक चौथाई बेकार भी हो सकती हैं। कोई बात नहीं। लेकिन वे श्रेष्ठ हैं। एक होता है आदमी नेगेटिव एटीटयूट लेता है, एक आदमी होता है जो पॉजिटिव एटीटयूट लेता है। आपने चौथाई कह दिया पर शेष तीन चौथाई पर क्यों नहीं काम किया?

पंत में जो कुछ अच्छा है उस पर क्यों नहीं बात करते आप? आपने एक चौथाई को कैन्सल कर दिया लेकिन बाकी का थ्री फोर्थ कहां गया? और तुमने जो लिखा है उसमें कितना कैन्सल करने योग्य है? तुमने भी तो कुछ लिखा है? क्या वो सब श्रेष्ठतम है? हर आदमी लिखता है। मैंने भी जो कुछ लिखा है अगर मैं ये कहूं की हर कविता श्रेष्ठतम है तो गलत है। श्रेष्ठ भी होंगी, अच्छी भी होंगी, दोयम दर्जे की भी होंगी, कैंसल करने योग्य भी होंगी। ‘स्वर्ण किरण’ पंत की कविता अरविन्द के दर्शन पर है। जिसको समझना बहुत मुश्किल है। अरविन्द से बड़ा कोई योगी नहीं हुआ इस शताब्दी में। उनका एक महाकाव्य है सावित्री। उसके कुछ बंद मैंने ट्रांसलेट किए हिन्दी में। उनकी चिट्ठी आई मेरे पास यू हैव ट्रांसलेटेड माई सावित्री, तो मैं डर गया। मैंने लिखा कि मैं बी.ए. का स्टूडेंट हूं।

आपने गलत समझ लिया। ये तो आपकी प्रेरणा थी कि मैंने कुछ बंद ट्रांसलेट कर दिए। मैं तो ऐसी भाषा जानता नहीं था और मैं तो सावित्री को ट्रांसलेट करने की हिम्मत नहीं कर सकता। क्या ट्रांसलेशन थे, ”नभ नीलम पर कुंकुम सम अंकित दिव्य सुमन” ये भाषा थी मेरी ट्रांसलेशन की तो वो समझे कि कोई बड़ा भारी विद्वान है। सावित्री मृत्यु विजय की कहानी है। इस मृत्यु के लोक तक पहुंचने के लिए सावित्री को कितने स्तर पार करने पड़ेंगे। तो ये वो कथा है जिसको वे कभी नहीं समझ सकते जिन्दगी में। कौन? आपके आलोचक महोदय। एक बंद का ट्रांसलेशन हैµ ”मधुमय छंदाकृति में बदलो यह मृत्य देह। भूस्वर्ग एक हो काल विजित संतति अजेय।” तो ये अरविन्द को क्या समझेंगे? ये तो कम्यूनिस्ट लोग हैं। इनको तो हिन्दुस्तान की हर चीज बुरी लगती है।

ग़ज़ल उर्दू की विधा है इसे हिन्दी रूप देने के लिए आपने इसे गीतिका नाम दिया?

नीरज : नहीं हिन्दी रूप देने के लिए नहीं बल्कि हिन्दी के पास भी ग़ज़ल का कोई हिन्दी नाम हो। अब यह प्रचलित नहीं हुआ न हो। मैंने एक नाम दिया था कि हिन्दी में ग़ज़ल का यह भी एक नाम हो सकता है। गीतिका भी हो सकता है। इसका ‘मतला’ आरंभिका भी हो सकता है। मैंने नाम दे दिए अब कोई स्वीकारे या न स्वीकारे। लेकिन ग़ज़ल बहुत आसान है लिखना। सबसे कठिन लिखना है गीत। ग़ज़ल में दो-दो पंक्तियां लिखी जाती हैं। लेकिन गीत में शुरु से लेकर अंत तक एक ही भाव का निर्वाह करना होता है।

हिन्दी ग़ज़ल हिन्दी साहित्य में अपना स्थान पाने के लिए जूझ रही है। दुष्यंत कुमार की ग़ज़लों ने हिन्दी साहित्य के हलकों में कुछ हलचल मचाई थी लेकिन आज तक हिन्दी ग़ज़ल को हिन्दी साहित्य की विधा के रूप में मान्यता नहीं मिल रही है जबकि ग़ज़लें खूब लिखी जा रही हैं?

नीरज : मान्यता किसी के कहने या लिखने से नहीं मिलती। अगर कोई विधा समाज में लोगों के बीच लोकप्रिय हो गई तो आपके ये साहित्यकार क्या कर लेंगे? किताबें क्या कर लेंगी? आगे याद रखना, भविष्य में किताबें पढ़ने वाला कोई नहीं मिलेगा आपको। कंप्यूटर एज आ रही है। सिर्फ वो व्यक्ति जीवित होगा जो होंठों पर होगा। अगर किसी की एक पंक्ति भी लोगों के ओठों पर है तो समाज में वही व्यक्ति जीवित रहेगा। किताब पढ़ने की फुर्सत किसके पास है? तुम्हारी इतनी बड़ी-बड़ी किताबें कौन पढ़ेगा आलोचना की? लाइब्रेरियां बंद हो जाएंगी। आपकी अगर दो पंक्तियां भी जबान पर बैठ गईं तो आप जीवित रहेंगे। न कोई किताब पढ़ने वाला मिलेगा न कोई लाइब्रेरी जाने वाला मिलेगा। क्योंकि अब तो लोग शार्टकट से चल रहे हैं। संसार इतनी तेजी से भाग रहा है, इसमें इतने मोटे-मोटे ग्रंथ कौन पढ़ेगा?

आखिर साहित्य के सरोकार क्या हैं?

नीरज : समाज कल्याण, लोक कल्याण इसका सबसे बड़ा सरोकार है। लेकिन लोक कल्याण के लिए गाली नहीं चाहिए, डंडा नहीं चाहिए। कांता सम्मति उपदेश। घर की प्रिया जिस प्रकार अपने बिगड़े हुए पति को अपनी बातों से, कटाक्षों से, मुस्कराहटों से उसे समझाती है। उसी प्रकार से कवि बिगड़े हुए समाज को समझाता है। मुस्कराहट के साथ, संकेत के साथ, प्रतीकों के साथ, समझाता है। लेकिन गाली से नहीं। कारण लोक कल्याण ही उसका सबसे बड़ा उद्देश्य है। अर्थ की देवी है वो। अर्थ भी इससे प्राप्त होता है। लेकिन शिव यानी लोककल्याण की रक्षा करना उसका सबसे बड़ा धर्म है। और कांता सम्मति उपदेश उसका रास्ता है। ये आजकल जो भाषा चल रही है डंडे वाली, गाली-गलौज वाली, नारेबाजी वाली, ये करो वो करो, ये कविता की भाषा नहीं है।

आपकी रचनाओं में जहांतहां आध्यात्मिक पुट दिखाई देता है। कहा भी जाता है कि साहित्य जितना आध्यात्मिकता की ओर बढ़ेगा उतना ही श्रेष्ठ से श्रेष्ठतर होता जाएगा। आपकी रचनाओं में ये पुट शुरू से ही रहा। कुछ लोग बड़ी आयु के बाद शुरू करते हैं। क्या इसका आयु से भी कुछ लेना देना है?

नीरज : देखिए, क्योंकि मैं बचपन से ही अकेला रहा हूं, अन्तर्मुखी रहा। दस साल की आयु से परिवार से दूर रहा। पिफर मेरी मां से भी मुझे अध्यात्म की प्रेरणा मिली। इसका उम्र से कोई सम्बंध नहीं है। बचपन से ही मेरी आध्यात्मिक रुचि रही और मेरे ऊपर संतों का प्रभाव रहा है। अरविन्द का प्रभाव रहा मेरे ऊपर, रजनीश का प्रभाव रहा मेरे ऊपर, मेहर बाबा का प्रभाव रहा। बड़े-बड़े संतों ने मुझे कहा कि आप मेरे पास आओ। रजनीश जी ने बहुत कहा कि यहां मेरे पास आकर रहो। मुक्तानंद जी, ब्रजेश्वर जी उन्होंने काफी कहा कि आप यहां आकर रहें।

बचपन से मेरी अध्यात्म में रुचि रही और आप देखें कि मेरी कविताओं में अध्यात्मिक संकेत हर जगह मिलेगा। जैसे बस पर मैं लिख रहा हूं बच्चों के लिए चलती जाए मोटरगाड़ी बढ़ते जाएं हम / कभी चले ये तेज कदम तो कभी चले थम-थम / मनुवा तेरा ड्राइवर इसका सुख-दुख इसके पहिए / ऊंची नीची सड़क जिन्दगी खूब संभलकर चलिए / एक्सीडेंट भी हो जाते हैं कर स्पीड नरम / …कोई आगे कोई पीछे छूटेंगे सब साथी / पल दो पल के संगी हैं ये दूल्हे और बाराती / खुशियों के संग-संग चलते हैं यहां हजारों गम / …इसमें साहूकार भी चलते पाकेटमार भी चलते / गफलत थोड़ी हुई जेब के पैसे यहां निकलते / बड़ा कठिन है सफर जिन्दगी चौकस रह हर दम /…चौसर पे देखिए एक गीत है – ”साधो हम चौसर की गोटी।” क्योंकि साधो से संबोधन किया है तो वही भाषा चलेगी गीत में। गीत का मतलब क्या है। गीत का मतलब है यूनिटी ऑफ दी थ्री। तीन तत्वों की अन्विति – भाव, भाषा और वातावरण। अब वातावरण तो साधु से बात करने का है तो भाव भी वैसा ही होना चाहिए और भाषा भी वैसी ही होनी चाहिए। तीनों चीजें चाहिएं तब गीत गीत होगाµ साधो हम चौसर की गोटी / कोई गोरी कोई काली कोई बड़ी कोई छोटी / कोई पिटकर कोई बचकर / कोई रोकर कोई हंसकर / सब ही खेलें निठुर खेल ये चाहे मिले न रोटी / साधो हम चौसर की गोटी / इस खाने से उस खाने तक / चमराने से ठुकराने तक / खेले काल खिलाड़ी सबकी गहे हाथ में चोटी / साधो हम चौसर की गोटी / कभी पट्ट हर कौड़ी आवै / कभी अचानक पौ पड़ जावै / मीर मनाए एक चाल तो दूजी हरे लंगोटी / साधो हम चौसर की गोटी / इक-इक दांव कि इक-इक फंदा / इक-इक घर है गौरखधंधा / हर तकदीर यहां है जैसे कूकर के मुंह रोटी / साधो हम चौसर की गोटी / जब तक जमी बिसात बिछा फड़ / तब तक ही सारी ये भगदड़ / फिर तो एक खलीता सब की बांधो गठरी मोटी / साधो हम चौसर की गोटी।तो इस गीत में पूरा रुपक है चौसर का। इस प्रकार से भाव, भाषा व वातावरण की अन्विति जो है वह सुन्दर गीत बनाती है।

दिनकर जी ने आपको हिन्दी की वीणा कहा। कुछ लोग आपको संत कवि मानते हैं। कुछ आलोचक आपको निराशावादी या मृत्युवादी कवि भी मानते हैं। आप खुद को क्या मानते हैं?

नीरज : मैं तो अपने को जीवन का कवि मानता हूं। क्योंकि जन्म भी है मृत्यु भी है। दोनों चीजें हैं। अगर जीवन का समग्र रूप दिखाना चाहते हो तो जीवन और मृत्यु दोनों को लेना पड़ेगा। संसार में सुख भी है दुख भी है, जय भी है पराजय भी है, अंधकार-प्रकाश, गरमी-सर्दी इसी प्रकार जन्म मृत्यु। आदमी जिस दिन जन्म लेता है उसी दिन से वह मरना शुरू होता है। अगर पुराना नहीं मरेगा तो नया कहां से पैदा होगा? प्रतिक्षण नूतन जन्म यहां पर / प्रतिक्षण नूतन मृत्यु है / देख आंख मलते-मलते ही बदल गया सब दांव है।हम जिस शांडिल्य जी से बात कर रहे थे, अब ये वो नहीं हैं। ये अब दूसरे हैं। कल दूसरे होंगे। You can not live twice. हुआ क्या कि एक बार कलकत्ते में मेरा एकल पाठ था। मैं सेकेंड क्लास में था दिनकर जी फस्ट क्लास में थे। दिनकर जी का पता चला तो मैं दिनकर जी के पास जाकर बैठ गया। अब कविता के संबंध में मैंने उनसे बातचीत शुरू की। तीन घंटे तक वो मुझे सुनते रहे। तो वे बोले – नीरज मैं तो तुझे गवैया समझता था लेकिन आज मुझे ये पता चला कि तू कविता का कितना बड़ा ज्ञानी है। आज आयोजकों से कह देना कि मैं तुम्हारे कार्यक्रम की अध्यक्षता करूंगा और स्वयं कविता नहीं पढ़ूंगा। मैंने आयोजकों से कहा कि दिनकर जी ने ये कहा है तो वे फौरन बोले कि इसमें क्या मुश्किल है। बाद में दिनकर जी उस कार्यक्रम में आए, उसकी अध्यक्षता की। वहीं उन्होंने कहा था कि नीरज हमारे देश की वीणा है।

ऐसा कोई व्यक्ति, ऐसी कोई घटना, ऐसा कोई प्रसंग जिसने आपको अत्यन्त प्रभावित किया हो। प्रेरित किया हो। जिसे इस समय आप हमारे साथ बांटना चाहते हों?

नीरज : मेरे साथ एक घटना घटी थी। मैं छठी क्लास में था। हाफ ईयरली में, तब नेचर स्टडी का एक पेपर होता था। मेरी फीस थी पूरी माफ। मुझे जो टीचर प्यार करते थे, क्लास में बैठकर मुझसे भजन सुना करते थे, उन्होंने मुझे एक नंबर कम दिया और मुझे फेल कर दिया। मैं गया उनके पास, मैंने कहा कि मास्टर साहब आपने ये क्या किया और उनसे कहा कि साहब मेरा एक नंबर बढ़ा दें नहीं तो मेरी फीस पूरी कर दी जाएगी। तो पहले तो उन्होंने मुझे डांटा कि गोपाल प्रसाद, तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई मुझसे नम्बर बढ़वाने की। आज अगर मैं तुम्हारा नम्बर बढ़ा दूंगा तो जिन्दगी भर नम्बर बढ़वा कर पास होते रहोगे। याद रखना जिन्दगी में इस तरह काम नहीं चलेगा। उन्होंने कहा कि जीवन में जो कुछ बनना फस्ट क्लास बनना। तुम गरीब के बेटे हो। तुम्हें सहायता देने वाला कोई नहीं मिलेगा। तुम्हारे लिए प्रथम श्रेणी से नीचे कहीं स्थान नहीं है। चोर बनना, डाकू बनना, पिक-पाकेटर बनना, कवि बनना, डाक्टर बनना, पर फस्ट कलास बनना सेकेन्ड क्लास कभी मत बनना। फीस मैं तुम्हारी दे दूंगा पर तुम्हें नम्बर नहीं दे सकता। और साहब वो दिन मुझे याद है, मैं कभी सेकेंड डिवीजन से पास नहीं हुआ। यहां पर जब वो प्रिंसीपल बन कर आए तो बूढ़े हो चुके थे।

एक बार मैं अपने लड़के को वहां दाखिल कराने ले गया। वो सामने से चले आ रहे थे। उन्होंने तो पहचाना नहीं। मैंने ही पैर छुए उनके जाकर। अरे ये क्या कर रहे हो? तो मैंने कहा गोपाल प्रसाद हूं। आपने उस समय मेरा एक नम्बर नहीं बढ़ाया था। अब मैं अपने लड़के को आपके पास लाया हूं इसका भी कभी नंबर नहीं बढ़ाना। तो ये सुनकर उन्होंने कहा कि आज मुझे अपने अध्यापक होने पर गर्व है। ये पुरस्कार मिल गया मुझे उसका। एक अध्यापक का कितना बड़ा रोल है कि वह किसी का जीवन बना भी सकता है और बिगाड़ भी सकता है।

अक्सर कहा जाता है कि हर सफल पुरुष के पीछे एक नारी का हाथ होता है?

नीरज : नहीं, मेरे पीछे केवल जीवन का हाथ है। मैं त्रिमुखी पीड़ा का कवि हूं। शरीर की पीड़ा रोगी रहने के कारण मैंने भोगी। ”तन रोगी मन भोगी मेरी आत्मा योगी रे।” तन रोगी रहा बचपन से। जब भूख लगती थी तो खाने के लिए पैसा नहीं था और जब पैसा हुआ तो भूख खत्म हो गई। प्रेम की पीड़ा भोगी। जो चाहा वो मिला नहीं जिससे प्रेम किया वो मिला नहीं, वो मिले जिनसे प्रेम नहीं हो सका। तीसरे अकेलेपन के कारण अपने भीतर प्रवेश किया तो आत्मा की एकान्तता का पता चला। इसलिए मैंने कहा- ‘तन रोगी, मन भोगी मेरी आत्मा योगी रे।’ यानी त्रिमुखी पीड़ा शरीर की पीड़ा, मानसिक पीड़ा व आत्मा की पीड़ा का कवि कहो। मेरे पीछे कोई नारी नहीं है।

कवि होना ईश्वर प्रदत्त गुण है। क्या कोई घटना या दुर्घटना भी किसी को कवि बना सकती है?

नीरज : बना देती है कभी-कभी लेकिन क्या है कि पिछले जन्म का पुण्य फल बहुत कार्य करता है। कवि को तो कविता का ब्रह्मा कहा गया है। तो क्या ऐसे ही ब्रह्मा बन जाएगा आदमी? कुछ न कुछ तो पीछे का पुण्य फल होगा। आत्मा के सौन्दर्य का शब्द रूप है काव्य। मानव होना भाग्य है कवि होना सौभाग्य।

आपने इतनी ख्याति अर्जित की। जीवन के इस मोड़ पर कोई मलाल? कोई गिला शिकवा?

नीरज : बस गिला शिकवा इतना ही है कि हिन्दी के जितने भी बड़े आलोचक थे उन्होंने मुझे गवैया मान लिया। मंचों का कवि मान लिया। जबकि मैं आध्यात्मिक कवि हूं। मैं अहंकार की बात नहीं कहता, मेरी पीढ़ी में मुझसे ज्यादा श्रेष्ठ लिखने वाला कोई पैदा नहीं हुआ। जितने प्रकार की भाषा, जितने प्रकार की छंदावली, जितने प्रकार की शैलियों में मैंने कविता लिखकर दिखा दी दूसरा कोई नहीं लिख सका। और फिर मैं गाता ही नहीं तहत में भी पढ़ लेता हूं। लेकिन मेरी लोकप्रियता मेरे मूल्यांकन में बाधक है। मेरे साथ लोगों ने सुरा-सुन्दरी का नाम जोड़ दिया। लेकिन मैं कहता हूं कि मूल्यांकन नहीं हुआ तो न हो।

अंत में, आज के ग्लोबलाइजेशनके बारे में क्या कहना चाहेंगे?

नीरज : यह ग्लोबलाइजेशन का युग है। कविता का भी ग्लोबलाइजेशन हो रहा है। ये अर्थ युग भी है। अर्थ भी जरूरी है। पर यह जीवन का माध्यम है, उद्देश्य नहीं हो सकता। हमारे चार पुरुषार्थ हैं- अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष। और इन चारों को प्राप्त करने पर ही जीवन सफल है। अर्थ जरूरी है पर अर्थ के पीछे पागल होकर दौड़ना मूर्खता है। अर्थ को जीवन का उद्देश्य नहीं बनाया जा सकता।

 साभार  – अक्षरम्

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