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उर्दु की लोकप्रिय शायरी – गालिब


 

 


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रुबाइयां

 

 

आतिशबाज़ी है जैसे शग़्ले-अतफ़ाल

है सोज़े-ज़िगर का भी इसी तौर का हाल
था मूजीदे-इश्क़ भी क़यामत कोई
लड़कों के लिए गया है क्या खेल निकाल

 

दिल था की जो जाने दर्द तम्हीद सही
बेताबी-रश्क व हसरते-दीद सही
हम और फ़सुर्दन, ऐ तज़ल्ली! अफ़सोस
तकरार रवा नहीं तो तजदीद सही

 

है ख़ल्क़ हसद क़माश लड़ने के लिए
वहशत-कदा-ए-तलाश लड़ने के लिए
यानी हर बार सूरते-क़ागज़े-बाद
मिलते हैं ये बदमाश लड़ने के लिए

 

दिल सख़्त निज़न्द हो गया है गोया
उससे गिलामन्द हो गया है गोया
पर यार के आगे बोल सकते ही नहीं
ग़ालिबमुंह बंद हो गया है गोया

 

दुःख जी के पसंद हो गया हैग़ालिब
दिल रुककर बंद हो गया हैग़ालिब
वल्लाह कि शब को नींद आती ही नहीं
सोना सौगन्द हो गया हैग़ालिब

 

मुश्किल है ज़बस कलाम मेरा ऐ दिल!
सुन-सुन के उसे सुख़नवराने-कामिल
आसान कहने की करते हैं फ़रमाइश
गोयम मुश्किल वगरना गोयम मुश्किल

 

कहते हैं कि अब वो मर्दम-आज़ार नहीं
उश्शाक़ की पुरसिश से उसे आ़र नहीं
जो हाथ कि ज़ुल्म से उठाया होगा
क्योंकर मानूं कि उसमें तलवार नहीं

 

हम गरचे बने सलाम करने वाले
कहते हैं दिरंग काम करने वाले
कहते हैं कहें खुदा से, अल्लाह अल्लाह
वो आप हैं सुबह शाम करने वाले

 

समाने-ख़ुरो-ख़्वाब कहाँ से लाऊं?
आराम के असबाब कहाँ से लाऊं?
रोज़ा मेरा ईमान हैग़ालिबलेकिन
ख़स-ख़ाना-ओ-बर्फ़ाब कहाँ से लाऊं


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दिल-ए-नादाँ तुझे हुआ क्या है

 

 

दिल-ए-नादाँ तुझे हुआ क्या है

आख़िर इस दर्द की दवा क्या है

हम हैं मुश्ताक़ और वो बेज़ार

या इलाही ये माजरा क्या है

 

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मैं भी मुँह में ज़बान रखता हूँ
काश पूछो कि मुद्दआ क्या है

जब कि तुझ बिन नहीं कोई मौजूद
फिर ये हंगामा, ऐ ख़ुदा क्या है

*

 

ये परी चेहरा लोग कैसे हैं
ग़म्ज़ा-ओ-इश्वा-ओ-अदा क्या है

शिकन-ए-ज़ुल्फ़-ए-अम्बरी क्यों है
निगह-ए-चश्म-ए-सुरमा क्या है

*

 

सब्ज़ा-ओ-गुल कहाँ से आये हैं
अब्र क्या चीज़ है हवा क्या है

हमको उनसे वफ़ा की है उम्मीद
जो नहीं जानते वफ़ा क्या है

*

 

हाँ भला कर तेरा भला होगा
और दरवेश की सदा क्या है

जान तुम पर निसार करता हूँ
मैं नहीं जानता दुआ क्या है

*

 

मैंने माना कि कुछ नहींग़ालिब
मुफ़्त हाथ आये तो बुरा क्या है

 

कहूँ जो हाल, तो कहते हो


 

कहूं जो हाल तो कहते हो, ‘मुद्द`आ कहिये

तुम्हीं कहो कि जो तुम यूं कहो तो क्या कहिये

न कहियो त` से फिर तुम, कि हम सितम गर

मुझे तो ख़ू है कि जो कुछ कहो, बजा कहिये

*

 

वह नश्तर सही, पर दिल में जब उतर जावे
निगाह-ए-नाज़ को फिर क्यूं न आशना कहिये

नहीं ज़रीहाए-राहत जराहत-ए-पैकां
वह ज़ख़्म-ए-तेग़ है जिस को कि दिल-कुशा

कहिये

*

जो मुद्द बने, उस के न मुद्दई बनिये
जो ना-सज़ा कहे उस को न ना-सज़ा कहिये

कहीं हक़ीक़त-ए-जां-काही-ए-मरज़ लिखिये
कहीं मुसीबत-ए-ना-साज़ी-ए-दवा कहिये

*

 

कभी शिकायत-ए रंज-ए गिरां-निशीं कीजे
कभी हिकायत-ए सब्र-ए गुरेज़-पा कहिये

रहे न जान, तो क़ातिल को ख़ूं-बहा दीजे
कटे ज़बान तो ख़ंजर को मरहबा कहिये

*

 

नहीं निगार को उल्फ़त न हो निगार तो है
रवानी-ए-रविश-ओ-मस्ती-ए-अदा कहिये

नहीं बहार को फ़ुरसत, न हो बहार तो है
तरावत-ए-चमन-ओ-ख़ूबी-ए-हवा कहिये

*


सफ़ीना जब कि किनारे पे आ लगा ग़ालिब
ख़ुदा से क्या सितम-ओ-जोर-ए-ना-ख़ुदा कहिये

 

 

साभार:- कविता कोश

 

 

 


 

 

 


 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 


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