मोल्डिंग सिस्टम — अलका सिन्हा बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ नीति आयोग की पहली बैठक 6 फरवरी भारत ने किया पृथ्वी-2 मिसाइल का सफल प्रायोगिक परीक्षण व्यक्ति पूजा को अनुचित नहीं मानता है राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ
दिव्या माथुर की कहानी : अंतिम तीन दिन अमेरिकी कोर्ट ने सोनिया गांधी से पासपोर्ट दिखाने को कहा अमेरिकी न्यायाधीश ने 1984 के दंगों पर आदेश सुरक्षित रखा यमन में डूबा जहाज, 12 भारतीय नाविक हुए लापता पंजाबी गायक शिंदा को लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड

आई आई टी में बने ‘थ्री इडियट्स’ लैब्स


IIT 'Three Idiots' Labsमुंबई,अक्टूबर २९ ।। साल 2011 में आईआईटी खड़गपुर के स्टूडेंट सिद्धार्थ कास्तगीर ने ब्रिटेन में होने वाले एक कॉम्पिटिशन में पार्टिसिपेट करने के लिए फॉर्मूला मॉडल की रेसिंग कार बनाने का फैसला किया। इसके लिए उन्हें आईआईटी से 9.5 लाख रुपए का फंड और कार पर काम करने के लिए एक बेकार शेड मिली। कास्तगीर उन दिनों को याद करके कहते हैं, ‘काश मुझे काम करने के लिए प्रॉपर लैब मिली होती।’ वह अभी जर्मनी की ऑटोमोटिव फर्म एफईवी में प्रोजेक्ट इंजीनियर हैं।

यह बात पुरानी हो गई है। आज आईआईटी के खड़गपुर, मुंबई, कानपुर, चेन्नई जैसे सेंटर्स ऐसे टिंकरिंग लैब बन गए हैं या बन रहे हैं। आईआईटी कानपुर में मेकेनिकल इंजीनयरिंग के एसोसिएट प्रोफेसर समीर खांडेकर कहते हैं, ‘टिंकरिंग लैब क्रिएटिव लोगों के लिए ऐसा प्लेटफॉर्म होता है, जिस पर वे अपने दिमाग में चल रही चीजों को मूर्त रूप रूप देकर उसे रियल टाइम इंजीनियरिंग प्रोडक्ट या पेटेंट में तब्दील कर सकते हैं। कास्तगीर कहते हैं, ‘आईआईटी स्टूडेंट थ्योरी में काफी स्ट्रॉन्ग होते हैं और उन्हें प्रैक्टिकल एक्सपीरियंस की जरूरत होती है।’

आईआईटी के लैब कुछ हद तक मेसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी के ‘फैब लैब’ की तर्ज पर बन रहे हैं। एमआईटी ने पहला फैब लैब 2001 में शुरू किया था। अभी वह 34 देशों में 134 ऐसे लैब चला रहा है। आईआईटी कानपुर की लैब दो साल पहले शुरू हुई थी। 1986 की क्लास ने यह प्रोजेक्ट शुरू किया था और 70 लाख रुपए का फंड बनाया था। इतनी ही रकम आईआईटी ने फंड में डाली थी। जनवरी 2013 में 1976 की क्लास ने 50 लाख रुपए का कंट्रीब्यूशन दिया। आईआईटी बॉम्बे और मद्रास भी ऐसे टिंकरिंग लैब बना रहे हैं। ये टेक्निकल और फाइनेंशियल सपोर्ट के लिए पुराने स्टूडेंट्स से कॉन्टैक्ट कर रहे हैं। असल में आईआईटी बॉम्बे ने इस साल मेकेनिकल इंजीनियरिंग डिपार्टमेंट के लिए एक अलग टिंकरिंग लैब शुरू की है। इसके इलेक्ट्रॉनिक्स डिपार्टमेंट के पास पहले से ही ऐसी एक लैब है। आईआईटी बॉम्बे के डायरेक्टर देवांग खाखर कहते हैं, ‘स्टूडेंट्स को डेडिकेटेड फैसिलिटी की जरूरत है, जिसे वे खुद चला सकें, ऐसी नहीं जिन्हें रिसर्च के लिए किसी और स्ट्रीम के साथ शेयर करना पड़े। फंडिंग के लिए पुराने स्टूडेंट्स की मदद ली जा रही है। इसमें कॉलेज भी कंट्रीब्यूट करेगा।’
आईआईटी मद्रास ने टिंकरिंग लैब को सी-फाई नाम दिया है। पांच साल पुरानी इस लैब की टैगलाइन है, ‘वॉक इन विद एन आइडिया, वॉक आउट विद ए प्रोडक्ट।’ आईआईटी मद्रास अपने सी-फाई का इंफ्रास्ट्रक्चर बनाएगा। इसके लिए उसे तीन कंपनियों से फंड मिल रहा है। आईआईटी मद्रास में डिपार्टमेंट ऑफ अप्लायड मेकेनिक्स में एसोसिएट प्रोफेसर महेश पंचंगुला कहते हैं, ‘हाल के दिनों में सी-फाई की कोशिशों को इंडस्ट्री की तरफ से मिलने वाला सपोर्ट बढ़ा है। यह सपोर्ट इंफ्रा डेवलपमेंट के लिए ग्रांट और स्टूडेंट के प्रॉब्लम सॉल्विंग फॉर्मेंट के तहत आ रहा है।’

हिन्दी में राष्ट्रीय - अंतरराष्ट्रीय समाचार, लेख, भाषा - साहित्य एवं प्रवासी दुनिया से नि:शुल्क जुड़ाव के लिए
अपना ईमेल यहाँ भरें :

Leave a Reply