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कश्मीर में शिवरात्रि बनी हिंदू-मुस्लिम एकता का प्रतीक


जम्मू। आतंकवाद से जूझ रहे जम्मू एवं कश्मीर में महाशिवरात्रि का पर्व हिंदू-मुस्लिम एकता का प्रतीक बन कर उभरा है। इस अवसर पर दोनों के मध्य पनपी अविश्वास की खाई को भरने में सहायता मिल रही है।

कश्मीरी पंडितों के लिए महाशिवरात्रि सबसे बड़ा त्यौहार है। इस अवसर पर एक दृश्य जो बार-बार दिखाई दे रहा है वह कि हिंदू बहुल इलाके में मुस्लिम द्वारा अपने हिंदू मित्रों को बधाई देना। यहां तक कि इस अवसर पर अपने मित्रों को बधाई देने के लिए कुछ कश्मीरी मुस्लिम तो सैकड़ों किमी की यात्रा करके बारिश एवं ठंड की परवाह न करते हुए भी जम्मू के बाहरी इलाके में स्थित जगती कस्बे पहुंचे। कुलदीप रैना ने कहा, “मैं अपनी आंखों पर भरोसा नहीं कर सका कि यह मेरे बचपन का मित्र अर्शद है, जो आज इस दिन मुझसे मिलने आया है।” कुलदीप ने संवाददाता से कहा, “भरोसा करिए मैं दुनिया का सबसे खुशनसीब इंसान हूं। ऐसा लगा कि इतने वर्षो में हमारे बीच कुछ नहीं बदला।” अर्शद एवं कुलदीप अनंतनाग जिले के अकूर गांव से सम्बधित हैं। लेकिन आतंकवाद के कारण कुलदीप को जगती शिविर में रहने को मजबूर होना पड़ा। अर्शद ने कहा, “मैं जानता था कि कुलदीप यहां रह रहा है। मैंने सोचा कि कुलदीप से मिलने के लिए इस त्यौहार से बढ़िया कोई दिन नहीं हो सकता।” महाशिवरात्रि के अवसर पर क श्मीरी हिंदू रात भर प्रार्थना करने के बाद घर के पास के मंदिरों में जाते हैं और अगले दिन ‘सलाम’ नाम से अपने मित्रों के लिए भोज का आयोजन करते हैं।

घाटी में 1989 तक आतंकवाद के उभरने तक कश्मीरी पंडित अपने मुस्लिम मित्रों एवं पड़ोसियों के लिए भोज का आयोजन करते थे। लेकिन 1989 के बाद से कश्मीरी पंडितों के पलायन के कारण सब कुछ बदल गया। आतंकवाद एवं उनके प्रति सहानुभूति रखने वाले लोगों को अपने पलायन का जिम्मेदार मानने वाले कश्मीरी पंडितों के अंदर का गुस्सा भी धीरे-धीरे कम हो रहा है। उदाहरण के तौर पर मुश्ताक अहमद हैं। बधाई देने के लिए मुश्ताक अहमद बारिश के बावजूद भगवान शिव को समर्पित रानीश्वर मंदिर के बाहर कश्मीरी पंडित परिवार का इंतजार कर रहे थे। पेशे से सरकारी कर्मचारी मुश्ताक अपने मित्र सुशील कौल के आवास पर गए लेकिन पड़ोसियों के बताने पर वह मंदिर पहुंच गए। जब दोनों मित्र एक दूसरे से गले मिले तो उस वक्त भाव विह्वल दृश्य उत्पन्न हो गया। दोनों की आंखों से आंसू बहने लगे। प्रधानमंत्री के राहत एवं पुनर्वास कार्यक्रम के तहत इस वर्ष कई कश्मीरी पंडित युवक वापस घाटी जाएंगे।

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