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मॉरीशस के हिंदी साहित्य पर सर शिवसागर रामगुलाम का प्रभाव


मॉरीशस के स्वतंत्रता-संग्राम सेनानी सर शिवसागर रामगुलाम हिंद महासागर क्षेत्र के महान नेता एवं राजनीतिज्ञ थे | यह स्वाभाविक ही था कि उनके स्वतंत्रता संघर्ष तथा स्वतंत्रता के पश्चात् मॉरीशस को कल्याणकारी राज्य बनाने के प्रयत्नों का प्रभाव हमारे मॉरीशस के हिंदी साहित्य पर पड़ता | ये प्रभाव प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से साहित्य की सभी विधाओं पर देखा जा सकता है – कविता, कहानी, उपन्यास, नाटक, निबंध आदि | किन्तु इसमें दो मत नहीं कि रामगुलाम के व्यक्तित्व, कृतित्व एवं विचारधारा का सबसे अधिक प्रभाव कविता पर पड़ा | डॉ. ब्रजेन्द्र भगत ‘मधुकर’ ने चाचा रामगुलाम पर सैकड़ों कविताएँ रची हैं | वे चाचा के भक्त एवं आत्मीय थे | स्वतंत्रता आन्दोलन के दिनों में मधुकर रामगुलाम के राजनीतिक जुटावों में उपस्थित होकर अपनी कविताओं को गाकर सुनाते थे | कवी ने उनको निकट से देखा और समझा है | अपनी ‘मधुवाणी’ पुस्तक में ‘स्वीकारो श्रद्धांजलि ‘ अर्पित करते हुए उनके मानवीय गुणों का उदघाटन किया है | यथा –

“मोरीशस का भाग्य विधाता,

विरोधियों को गले लगाता |

निराश्रितों का आश्रयदाता जग,

सारा गौरव गुण गाता ||

स्वतंत्रता की समर भुनी में,

जित लिया संग्राम |

बना दिया इस देश को,

चाचा स्वर्गपुरी सुरधाम ||”

वास्तव में रामगुलाम सच्चे अर्थों में ‘निराश्रितों के आश्रयदाता’ थे और इस देश को ‘स्वर्गपुरी’ बनाने में जीवन पर्यन्त प्रयास करते रहे | यह सर्वविदित है कि चाचा रामगुलाम की सरकार ने वृद्धों, विधवाओं, बीमारों, मछुओं, बेकारों आदि के लिए आर्थिक सहायता की व्यवस्था की थी |

जनार्दन कालीचरण ने अपनी कविता के माध्यम से चाचा के संघर्षमय जीवन पर प्रकाश डाला है | निम्नलिखित पंक्तियाँ द्रष्टव्य हैं –

“दिन-दुखी जनों का दर्द बाँटकर,

उनको साथी बनाया था |

चैन-आराम का महल छोड़कर,

संघर्ष को गले लगाया था ||”

कवियों ने सर शिवसागर रामगुलाम में गीता के ‘भक्त’, ‘स्थितप्रज्ञ’ तथा ‘गुणातीत’ जैसे गुणों को देखा है | इस सन्दर्भ में सोमदत्त बखोरी की ये पंक्तियाँ देखी –

“जो भी है मिलता वे लेते सभी |

फूलों की माला अरु फटकार भी ||

जो देना है, सो दे दो मिट अभी |

न ऐसा मिलेगा फिर कोई कभी ||”

मधुकर ने रामगुलाम को ‘गीता गान सुनाने वाला’ कहा है | इसका तात्पर्य यही है कि चाचा गीत के उपदेशों को जीने वालों में थे | कवी के ही शब्दों में –

“कभी न पीछे हटाने वाला |

सत्य न्याय पर मिटने वाला |

जीवन दान दिलाने वाला,

गीता गान सुनाने वाला ||”

मोरीशस के शीर्षस्थ कथाकार अभिमन्यु अनत ने चाचा रामगुलाम के समय के मोरीशस का चित्रण अपने उपन्यासों तथा कहानियों में किया है | यह शोध का विषय हो सकता है | स्वतंत्रता के पश्चात् वाला मोरीशस आर्थिक, सामाजिक तथा राजनैतिक समस्याओं से जूझने वाला मोरीशस था |

महेश रामजियावन तथा अस्तानंद सदासिंह जैसे नाटककारों ने अपने नाटकों में रामगुलाम के शासनकाल की विसंगतियों पर प्रकाश डाला है |

‘और पसीना बहता रहा’ उपन्यास में अभिमन्यु अनत ने मज़दूर नेता पं. हरिप्रसाद रामनारायण के कार्यों तथा सेवाओं का उल्लेख किया है |

वास्तव में चाचा के उदार दृष्टिकोण के कारण न केवल रामनारायण बल्कि सुखदेव विष्णुदयाल, रज़ाक मुहम्मद, पं. जगदम्बी जैसे नेता भी उनसे प्रभावित हुए बिना न रह सके | इसीलिए जब देश की आज़ादी का प्रश्न उठा तब ये लोग रामगुलाम को अपना सहयोग देने में पीछे न रहे |

स्थानीय लेखकों एवं कवियों ने सर शिवसागर रामगुलाम के व्यक्तित्व के विभिन्न पहलुओं पर प्रकाश डाला है | इसीलिए उनकी रचनाओं में जहाँ सभी संस्कृतियों तथा धर्मों के प्रति आदर भाव रखने वाले रामगुलाम का चित्रण हुआ है, वहां मोरीशस को स्वतंत्रता दिलाने वाले देश भक्त रामगुलाम के भी चित्र प्रस्तुत किए गए हैं | ‘बेलरिव’ की झोंपड़ी से लेकर ‘रेज्वी’ महल तक का रास्ता तय करने वाले राष्ट्रपिता रामगुलाम के महान कार्यों को साहित्यकार भला कैसे भूल सकते हैं ?

अंत में ऍन मिलकर सोमदत्त बखोरी के शब्दों में त्यागमूर्ति सर शिवसागर रामगुलाम को श्रद्धांजलि अर्पित करें –

“ऊँचा किया नाम अपना

और अपने देश का,

ऊँचा किया नाम पूर्वजों का

और उनके देश का |

इतिहास में अंकित होगा

स्वर्णाक्षर में सत्य अनोखा-

पूरी करके लम्बी यात्रा

कुली-पुत्र बना राष्ट्र-पिता |”

साभार – परिक्रमा डॉ. मुनीश्वरलाल चिंतामणि

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