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कहानी – एन्टिक पीस – लेखिका डॉ ज़ेबा रशीद


 डॉ. ज़ेबा रशीद  सुरैया के लिए ये तीन साल लम्बी अंधेरी सुरंग की तरह थे। वह घोर अंधेरे में धीरे-धीरे आगे बढ़ रही थी। इस छोटी जिंदगी में कितनी परेशानियों में घिर आई। हिम्मत कर परेशानियों के तपते रेगिस्तान में नंगेपांव ठंड़ी जमीन की तलाश में भटकती रही। अचानक उसे एक स्कूल में नौकरी मिल गई। घर में मां,ताया ,ताई और दो छोटी बहनें। पुष्तैनी हवेली के कई बार हिस्से होने के बाद इनके हिससे में एक कोना आ गया था। मां व ताई सगी बहने, ताया   अब्बू का बेटा अजीम   के विदेश जाने के बाद बजाय भूखे मरने के ताया-ताई सुरैया के हिस्से में आ गए। दूसरी सन्तान भी तो नहीं ये किस के सहारे जियेंगे।

 दुनिया में आते ही ताई ने   सुरैया का गालियों से स्वागत किया था।  उठते बैठते अम्मी को ताने देती ।

‘‘ हाय पहली ही बेटी पैदा कर दी है। क्या काम आयेगी। मैंने तो पहला ही बेटा पैदा किया। हमारे बुढ़ापे का सहारा बनेगा।’’

‘‘ देखूंगी बेटा क्या काम आयेगा।’’ अम्मी जल कर कहती।

‘‘ घर लूट बेटियां चलती बनती है। तू सर तो हमारे ही पड़ेगी। शुकर है मेरा बेटा  ..’’

  अम्मी अन्दर ही अन्दर टूट जाती बुढ़ापे में कौन होगा हमारा।

      ताया अब्बू ने जाने किन-किन से उधार लेकर अजीम को इंजीनियर की शिक्षा दिलाई। पढ़ाई समाप्त कर मां के गहने बिकवा ,ताई का बेटा इस घर से कई वादों को अपने सामान के साथ बांध कर अमेरिका नौकरी करने चला गया।  तीन साल में कभी माता-पिता या वादे याद नहीं आए। उसके जाने के बाद एक लिफाफा आया ,पहला और आखिरी। एक फोटो पर तीन अक्षर लिखे थे अजीम और एना ।

‘‘ ताई अम्मी अजीम भाई ने शादी कर ली।’’ सुरैया ने डरते हुए उन्हें बताया।

‘‘ ऐ लड़की दिमाग खराब है तेरा। वह बेचारा तो सात समन्दर पार कमाने गया है।’’

     पथराई आंखों से फोटो को देखने लगी। उनकी आंखों से गम की बूंदें टपकने लगी। उसने बेटे की तस्वीर से कहा‘‘ तुम तो कमाने गए थे।  मेरे गहने बनवाने…अपने अब्बा के कंधों का सहारा न बन पाये।  किसी ओर के कंधे का सहारा बन गए।’’  वह चकराती हुई पलंग पर गिर गई।  ताया भी पथराये बैठे थे।  तमन्नाऐं लहू-लूहान हो गई।

वह सड़क के किनारे बस के इन्तजार में खड़ी थी।  अचानक एक कार उसके पास आकर रूकी। कार में अजीम भाई को एक अंग्रेज औरत के साथ देखा।

‘‘ भाई तुम तो लन्दन में थे ना ?’’

‘‘ तुम्हारी भाभी को इण्डिया दिखाने लाया हूं।’’

‘‘ आप कब आए घर में सूचना नहीं दी। घर क्यों नहीं आए?’’  उसने कई प्रश्न  कर दिये।

‘‘ होटल में अच्छा प्रबन्ध है ,घर में वो आराम कहां?’’

   सुरैया अन्दर ही अन्दर खोल गई। मन का व्यवहारिक कोना ढीठ हो गया। कुछ भी तो नहीं कहा सुरैया ने। बस मन ही मन दुख व क्रोध से भर गईं फिर भी सयंत होते हुए बोली।

‘‘ आप घर आयेंगे तो बहुत खुशी होगी। सबको कितना इन्तजार है।’’

‘‘ अच्छा दो दिन बाद समय निकाल कर आऊंगा। अभी एना को घूमना है। ’’

‘‘ ताया अब्बू- अम्मी के लिए आपके पास समय नहीं है ?’’  उसके तन-बदन में आग लग गई। उसने सख्त स्वर में कहा।‘’  उन्होंने कितनी मेहनत करके आपको इस काबिल बनाया है ’’

‘‘ यह तो सभी मां-बाप करते है। उनका कर्त्तव्य है।’’

‘‘ और आपका कर्त्तव्य ?  खैर आपको घर आना चाहिए। ’’ वह बात बिगड़ने के डर से कुछ न बोली। बेबस सी सुरैया ने बात टालते हुए कहा।

‘‘ उस तंग बदबूदार गली में इसे कैसे लाऊंगा। जहां बकरे-बकरी बंधते है। ’

‘‘ क्या उस बदबूदार गली और बकरा-बकरी बंधनेवाले घर के रहने वाले आप नहीं हैं? आप अपने माता-पिता से मिलने कल शाम जरूर आना ’’वह चल दी। उसकी आंखों में क्षोभ के आंसू थे। वह अपनी कमजोरी बताना नहीं चाहती थी। वह सोच रही थी अजीम भाई ने एकबार भी नहीं पूछा ताया-ताई कैसे है?  घर आकर मां को सब कुछ बताना चाहती थी। उनके दिल टूटने के ख्याल से चुप रह झूठ बोलना ही उचित समझा ।

‘‘ ताई अम्मी अजीम भाई कल शाम आयेंगे।’’

‘‘ क्या कहा तूने?  मेरा बेटा कल आ रहा है। ’’ बेकरारी से पूछा।  सब भाग कर दालान में इक्ठे हो गए।

‘‘क्या फोन आया था?  बहू भी आ रही है? ’’ अजीम के आने का सुनने के बाद अम्मी व किसी का मन बांधे से न बंध रहा था।

‘‘हां भाभी साथ आयेंगी।’’  उसके दिल में दुख उबल रहा था।   उन सबसे बचने के लिए वह जल्दी से कमरे में अन्दर चली गई। सुरैया की चुप्पी देख ताई खीज गई।  पीछे आती बोली ‘‘ जरा इसके नखरे तो देखो, हमें दो रोटियां क्या डालती है ढ़ंग से बात भी नहीं कर रही। मेरे बेटे के आने से इसकी कदर जो कम हो जायेगी। देखो इतने समय बाद मेरा बेटा आ रहा है और इसे जरा भी खुशी नहीं हो रही है। ’’ ताई उसकी चुप्पी देख बेचैनी व क्रोध से सुरैया पर बरस पड़ी।

    शालीन व बुद्धि की धनी सुरैया भाई की बातें छिपाने   की कोशिश कर रही थी। जब से अजीम के आने का सुना सब बड़े खुश थे। सबके अपने-अपने सपने थे।

‘‘ वाह अब तो ऐश हो जायेंगे। भाई कलर टी.वी. तो लायेंगे ही।’’ अनीका खुशी से चहकी।

‘‘ मैं तो कहुंगी भाई पहले फ्रिज दिला दो। पूरी गर्मियों में मुझे सामने वाली आंटी से बर्फ मांगने जाना पड़ता है।’’सब अपने-अपने अंदाज में उससे तोहफा पाने का सपना देख रहे थे।

‘‘ तीन साल में मेरे बेटे ने कितने रुपये कमा लिए होंगे।’’ ताया अब्बू सोच रहे थे।

    सुरैया यह सब सुन अपने को कितना मजबूर पा रही थी। इतनी मेहनत कर दो जून रोटी ही जुटा पाती हूं।

‘‘ अब सुरैया की शादी कर देंगे।’’अम्मी मुंह में पान रखते हुए बोली।

‘‘ मैं तो भाई से पैसे लेकर किसी मशहूर   दूकान से चार-पांच सूट खरीद लूंगी।   मेरा कालेज का इकलौता सूट-रोज रात को धोओ, सुबह प्रेस करो फिर पहन कर जाओ।’’  अनीका खुद अपने कपड़ो की हंसी उड़ा रही थी।

‘‘ अजीम भाई ढ़ेर सारे कपड़े,जूते ,सेन्डिल लायेंगे। मैं तो स्कूल वो ही पहन कर जाऊंगी’’   सीमा बोली।

‘‘पहले आने तो दो। क्या गुल खिलाते हैं। तीन सालों में तो कभी कुछ भेजा नहीं अब क्या लायेंगे।’’ अचानक सुरेया के मुंह से शब्द निकले।

‘‘ ओह बाजी ऐसा क्यों कहती हो ? वहां जिंदगी कितनी बिजी होती है भला इतनी बिजी लाइफ में खत  लिखने का किसके पास टाइम है। ’’अजरा नाराज हो कर बोली।

‘‘ अजीम भाई ने कभी याद किया क्या ?  वो अपने थे ही कब ? ’’ वह मन ही मन बोली।

‘‘ मैं तो भाभी की पेन्सिल हिल   के सेन्डिलों पर कब्जा कर लूंगी।   खट-खट करती एडियां बजाती कालेज जाऊंगी।’’ मटक-मटक कर नकल करते हुए चलने लगी। उसे देखकर सबको हंसी आने लगी। उनकी हंसी देख सुरेया के होंटों पर एक दर्दीली सी मुस्कान आ गई।   उसे चुप देख कर अजरा ने कहा‘‘ भाभी के स्कर्ट ब्लाउज और जीन्स सुरैया को पहनायेंगे।   ’’खुशी से सबके चमकते चेहरे देख कर सुरेया का दिल रो रहाथा।

‘‘कैसे समझाऊं कि अजीम भाई एक सपना है। टूटा हुआ वो आइना है जो काम तो आ नहीं सकेगा…चुभेगा जरूर।’’

   ताई ने कहीं से चादर, कहीं से टी सेट और कहीं से डिनर सेट पड़ोसियों से मंगवा लिया गया।   सुरेया को उलझन हो रही थी। यह सब करने को कैसे रोके।

   ताई चाह रही थी अंग्रेज बहू का स्वागत खूब अच्छा हो।   जर्दा-पुलाव, बिरयानी और कबाब बनने चाहिए। दूसरे दिन अपनी सहेली से कुछ रुपये उधार लिए।   घर आते हुए सोच रही थी कोई अप्रिय घटना न घट जाय मैं ताई को घर जाते ही सच्चाई बता दूंगी। घर आकर इतनी तैयारी देखी तो वह मन ही मन नाराज हुई।

‘‘ ताई अम्मी इतना सब करने की क्या जरूरत है?’’

‘‘ अरे बेटी अंग्रेज बहू आ रही है….फिर मेरा बेटा भी तो बड़ा आदमी हो गया है।’’   ताई के इस तरह कहने पर उसे अपनी गरीबी की हंसी उड़ती लगी।

‘‘ बड़ा आदमी । उसके लिए हम , और यह आंगन भी तो छोटा हो गया। ’’

‘‘ अच्छा-अच्छा अब जल कर  मुझे   सबक मत सिखा   मेरा बेटा आ गया है ,अब आंगन भी बड़ा कर लेगा-तुझे फिकर करने की जरूरत नहीं।’’ ताई ने गर्व से कहा।

   गली के आगे कार टैक्सी रूकी।   अजीम एना का हाथ पकडे हवेली की ओर बढ़ने लगा।    विदेशी परफयूम की महक हवा में घूल गई।   गली में खड़े सर से सर भिड़ाये मकानों के दरवाजों   और खिड़कियों से औरतें बच्चे उन्हें आश्चार्य से देख रहे थे।    ताई अम्मी ने अजीम की बलाऐं ली। ताया ने बेटे को गले लगाना चाहा , बेटे का साहिबी रोबदाब देख बीच में ही रूक गए।   ताई अम्मी ठगी सी एना को देखती रह गई। न ससुर का लिहाज न सलाम।   अगर हिन्दूस्तरनी बहू होती तो सास वाला रंग दिखा पाती…पर।

‘‘ आपका सामान कहां है ?’’ अजरा ने बेताबी से पूछा।

‘‘ हम होटल में ठहरे हैं।’’

’’ हमने यहां…’’ ताई के शब्द गले में ही अटक गए।

‘‘ बेटा अब तो तुमने खूब पैसा कमा लिया होगा ?’’   बैठने के कुद देर बाद ताया की बेचैनी हदें पार करने लगी। उन्होंने पूछा।

‘‘ वहां वेतन तो क्या,खर्चा बहुत   अधिक हो जाता है।’’  वह नजरें नीची कर झूठ बोलने में कामयाब हो गया। वह पिता का मतलब समझ गया था।   सुरैया ने देखा ताया के पास अब बेटे के झूठ,अंग्रेज बहू और रोबदाब के सामने कुछ पूछने या कहने की हिम्मत नहीं है।

   एना घूम-घूम कर खिड़कियों से   मोहल्ला देख रही थी।   प्लास्टर उखड़ी उंची-उंची दीवारों में उसे आर्ट नज़र आ रहा था। सुरैया को सबके चेहरों की चमक फिकी पड़ती देखी। उनके अन्दर   ही अन्दर टूटते सपनों की आवाज उसके दिल तक पहुंची। दोनों बहनों की चंचलता गायब थी।

‘‘ अरे भाई अजीम देखे   क्या-क्या   तोहफे लाए हो…हमारे दोस्त के लिए?’’  ताया  के   साथ लेथ मशीन पर काम करने वाले रमजान चाचा ने अन्दर आते हुए पूछा।

‘‘ असल में चाचा घूमने आए है इसलिए फालतू सामान नहीं लाया हूं।   साथ में सामान अधिक हो तो परेशानी होती है ना।’’

सुरैया ने वातावरण को सहज बनाते हुए कहा‘‘  चलिए भाई खाना खा लेते है।’’

  खाना खाने के बाद ताई अम्मी पान बनाने बैठी।  सुन्दर नक्कासी  हुए  पानदान  को देख एना ने अजीम को कहा ‘‘ दिस एन्टीक पीस इज वैरी ब्यूटीफूल ’’ वह पानदान की मांग कर बैठी।

‘‘ अम्मा यह पानदान तुम्हारी बहू ले जाना चाहती है। इसे यह तौहफा दे दो।’’अजीम बोला।

   सुरैया जानती थी घर में केवल यह एक ही कीमती वस्तु बची है। यह पानदान ताई की मां की निशानी उन्हें अपनी जान से प्यारा है।

‘‘ ओह अजीम भाई तुम्हारी खुदगर्जी का कोई अन्त नहीं । हद कर दी तुमने। प्लीज अब इनके अरमानों से मत खेलो, क्यों चले आए इनके सपने तोड़ने। एक भ्रम के सहारे जिन्दा तो थे ये लोग।’’ उसने मन ही मन कहा। उसका क्रोध व दुख अपार था।

‘‘ लो ये एन्टिक पीस ….तुम्हें ये रात दिन याद दिलाता रहेगा कि तुम इस हवेली में गमों से जर्जर दो एन्टिक पीस छोड़ गए हो।’’  उसने एन्टिक पीस अजीम के हाथ में रखते हुए बड़ी मुश्किल से चले जाने को कहा। वह रवाना हो गया। सब उन्हें खाली-खाली नज़रों से जाता देख रहे थे।

‘‘ हूं एन्टिक पीस…’’सुरैया का दिल उनको खरी-खोटी सुनाना चाह रहा था। उसके दिल ने चाहा अजीम को पकड़ कर उसके माता-पिता के चेहरे पर लिखी इबारत पढ़ने को मजबूर कर दे।    लेकिन ताई का पीला पड़ता चेहरा देख वह चुप रही।

   गूंगे बने ताया के पास जमीन पर बैठ कर उनके हाथ अपने हाथों में ले सहलाने लगी। वह अनुभव कर रही थी कि बेटा ताया अब्बू के अरमानों की आंधियां उड़ा गया है।

‘‘ धन्य है तू बेटी। ऐसे बेटे से तो बेटी ही भली। लोग क्यों बेटों का अरमान करते हैं।’’ सदमे से उभरे तो ताया के मुंह से शब्द निकले।

   बेटे की ओर से आहत होकर ताई अपना सर सुरैया की गोद में रख कर फफक पड़ी।

‘‘ जब भी साजिदा बेटी को जन्म देती तू इसे कितने घमन्ड से ताने देती। आज ज्ञात हुआ बेटियां क्या होती है, बेटियां मां बाप का दर्द जानती है। आबिदा तूने भी बेटे की जगह सुरैया जैसी बेटी मांगी होती। ’’

‘‘ हां बेटियां अजीम होती है।’’

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