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हड़ताल हक की अंतिम लड़ाई होनी चाहिए – डॉ. भरत मिश्र प्राची


  अपनी सुरक्षा के लिये दुनियां का मजदूर मजदूर संगठन की मजबूत छत को तलाशता है, जहां उसे शासक वर्ग के तानाशाही आंधी, तुफानी दौरे से रक्षा हो सके। मजदूर संगठन का होना भी बदलते परिवेश के अनुरुप सही कदम है, जहां शोषकीय प्रवृति के खिलाफ अपनी आवाज बुलंद करनी ही पड़ती है , वरना समाज में पनपती तानाशाही का जोर बढ़ता ही जायेगा। यदि सामाजिक ढांचा सही तरीके से चलता रहता, श्रमिकों के श्रम की कीमत पहचानी जाती तो शायद मजदूर संगठन की आवश्यकता नहीं पड़ती। इस तरह के बदलते हालात के आगे मजदूर मजबूर है संगठन के छांव तले जाने के लिये और यहां का मजदूर संगठन अलग अलग रंगों में रंगा हुआ है। इनमें पनपी स्वयं भू की प्रवृति ने आज इन्हें एक जगह खड़े होने के बजाय अलग अलग खेमों में बांट रखा है। ये कहने को तो अपने आप को स्वतंत्र बताते है पर हर पर राजनीतिक छाया विराजमान है। जब चुनाव आते है तो ये अपने – अपने राजनीतिक दलों के साथ खड़े मिलते है । जब कि सभी के सभी दुनियां के मजदूरों एक हो का नारा बुलंद करते रहतें है। अब सोचने की बात है कि जब ये ही अलग अलग झंडे के तले खड़े है, तो मालिकों से कैसे मजदूरों की रक्षा कर पायेंगे। मजदूर तो इनके पीछे खड़ा है। इनकी एक आवाज पर मजदूर एक जगह खड़ा हो जाता है पर ये अवसर देख चम्पत हो जाते है। मजदूरों की एकता का स्वहित में इन्हें लाभ उठाया देखा जा सकता है जहां इनके आसरे पर खड़े मजदूरों को आशातीत लाभ के वजाय नुकसान उठाना पडा है। इस क्रम में भारत सरकार के सार्वजनिक क्षेत्रो के उद्योंगों में हुए वेतन समझौते को देखा जा सकता है जहां अधिकारी वर्ग को जिनपर मजदूर संगठन की कोई छाया नहीं है, सुविधाएं बेसिक एवं डी.ए. के 40 प्रतिशत मिला वहीं मजदूरों को लेशमात्र का लाभ ही मिल पाया , जब कि पूर्व में इस तरह के लाभ में कर्मचारियों एवं अधिकारियो के परिलाभ में लेशमात्र का अंतर हुआ करता था।पदोन्नति में अधिकारी सबसे आगे रहते है जबकि कर्मचारी की पदोन्नति की गति यहाँ कछुएं की चाल से भी धीमी पाई जा सकती है। इस तरह के अन्तर मजदूर संगठनों के उपरी सतह पर हाइजैक हो जाने के कारण उभर रहे है।

मजदूरों की पेंशन, ग्रेचुटी में सुधार की मांग, रिटेल में विदेशी निवेश एवं महंगाई के खिलाफ देश के सभी श्रमिक संगठनों ने सरकार पर दबाव बनाने हेतु गत वर्ष एक दिन की आम हड़ताल की, हड़ताल शत प्रतिशत सफल भी रही पर सरकार पर कोई फर्क नहीं पड़ा। सरकार ने हड़ताल से हुए नुकसान की भरपाई आम जनता पर टैक्स का भार लाद कर पूरी कर ली । जिसके चलते हड़ताल के तत्काल बाद ही बाजार के भाव बढ़ गये। इस वर्ष फिर से पूर्व मांगों को लेकर देश के समस्त श्रमिक संगठन संभावित 20 – 21 फरवरी को आम हड़ताल करने जा रहे है, जब कि यहां का मजदूर सही मायने में हड़ताल के पक्ष में नहीं है, क्योंकि वह अच्छी तरह जानता है कि इस हड़ताल का सरकार की सोच पर कोई बदलाव आने वाला नहीं है। हड़ताल से हुए नुकसान की भरपाई पूर्व की तरह इस बार भी सरकार आम जन पर टैक्स का भार डालकर पूरी कर लेगी । जिससे पूर्व की भॉति बाजार के भाव फिर से बढ़ जायेंगे।  इस तरह के हड़ताल एवं उससे पड़ने वाले प्रभाव पर मंथन करने की आवश्यकता है जहां आज तक सरकार इसे नजरअंदाज कर हड़ताल से हुए नुकसान की भरपाई आम जनता पर नये – नये टैक्स लगाकर कर लेती रही है । जिससे महंगाई और बढ़ जाती है।

 जब तक किसी भी सरकार को किसी संगठन की एकता से , आंदोलन से सत्ता तक को खतरा नहीं पहुंचता तब तक उसकी आवाज सुनी नहीं जाती। इस परिप्रेक्ष्य में इस तरह के यहां अनेक उदाहरण देखने को मिल सकते है। जिस संगठन के आंदोलन से सत्ता जाने व आने का परिवेश उजागर होता रहा है, उसकी आवाज सहज ढंग से सभी राजनीतिक दल सुन लेते है। यहां के विभिन्न दलों में विभक्त राजनीतिक दलों की छत्र छाया में पल रहे श्रमिक संगठनों के किसी भी आंदोलन का सरकार पर कोई प्रभाव पड़ता दिखाई नहीं दे रहा है। जब तक अलग – अलग रंग, अलग – अलग ढंग एवं राजनीतिक परिवेश का त्याग कर यहां के विभिन्न मंच बनाये श्रमिक संगठन एक मंच पर खड़े होकर आवाज बुलंन्द नहीं करते। तब तक उनकी कोई भी आवाज यहां सुनी नहीं जायेगी, ऐसे परिवेश में आम हड़ताल का क्या औचित्य बनता है। इस पर मंथन करने की मही आवश्यकता है।

अपनी बात को मनवाने, हक पाने, विरोध प्रकट करने के क्रम में धरना, घेराव, प्रर्दशन, अनशन आदि करने की प्रक्रिया सकरात्मक कदम है। हड़ताल भी इस दिशा में उठाये जाने वाला कठोर कदम है, जिसका प्रभाव आम जनजीवन पर पड़ता है। इसे अंतिम लड़ाई के रुप में प्रयोग किया जाना चाहिए। इससे पूर्व अलग – अलग खेमें में बंटे श्रमिक संगठनों को स्वयंभू की भावना से ऊपर उठकर एक मंच पर खड़ा होना पड़ेगा एवं उन्हें जताना होगा कि यहां का श्रमिक एक जगह ही खड़ा है, समय आने पर वह सरकार बनाने एवं गिराने की ताकत रखता है तभी उसकी आवाज सही मायने में सुनी जायेगी। तभी उनके किसी आंदोलन का प्रभाव सकरात्मक हो सकेगा। इस तरह के हालात में ही श्रमिक संगठन श्रमिकों के हित की रक्षा सही मायने में कर सकेंगे। 20 – 21 फरवरी को देश में मजदूर फेडरेशन तले होने जा रही हड़ताल का सरकार की सोच पर क्या प्रभाव पड़ेगा ? क्या यह हड़ताल गत वर्ष की तरह प्रभावहीन बनकर रह तो नहीं जायेगी। विचारणीय मुद्दा है। हड़ताल हक की अंतिम लड़ाई होनी चाहिए । बार – बार हड़ताल करने प्रवृृति का त्याग कर हडताल को अंतिम हथियार के रूप में अपनाना चाहिए। हड़ताल के वजाय अपनी ताकत के बल सत्ता पक्ष पर दबाव बनाने के अन्य उपाय पर विचार करना चाहिए जिससे इस देश एवं आमजन को आर्थिक नुकसान न हो।

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