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सुमित्रानंदन पंत व्यक्तित्व और प्रतिनिधि रचनाएं


सुमित्रानंदन पंत (२० मई १९०० – २८ सितंबर १९७७) हिंदी साहित्य में छायावादी युग के चार प्रमुख स्तंभों में से एक हैं। बीसवीं सदी का पूर्वार्द्ध छायावादी कवियों का उत्थान काल था। सुमित्रानंदन पंत उस नये युग के प्रवर्तक के रूप में हिन्दी साहित्य में उदित हुए। इस युग को जयशंकर प्रसाद, महादेवी वर्मा, सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ और रामकुमार वर्मा जैसे छायावादी प्रकृति उपासक-सौन्दर्य पूजक कवियों का युग कहा जाता है। सुमित्रानंदन पंत का प्रकृति चित्रण इन सबमें श्रेष्ठ था। उनका जन्म ही बर्फ़ से आच्छादित पर्वतों की अत्यंत आकर्षक घाटी अल्मोड़ा में हुआ था, जिसका प्राकृतिक सौन्दर्य उनकी आत्मा में आत्मसात हो चुका था। झरना, बर्फ, पुष्प, लता, भंवरा गुंजन, उषा किरण, शीतल पवन, तारों की चुनरी ओढ़े गगन से उतरती संध्या ये सब तो सहज रूप से काव्य का उपादान बने। निसर्ग के उपादानों का प्रतीक व बिम्ब के रूप में प्रयोग उनके काव्य की विशेषता रही। उनका व्यक्तित्व भी आकर्षण का केंद्र बिंदु था, गौर वर्ण, सुंदर सौम्य मुखाकृति, लंबे घुंघराले बाल, उंची नाजुक कवि का प्रतीक समा शारीरिक

जीवन वृत्त

उनका जन्म अल्मोड़ा ज़िले के कौसानी नामक ग्राम में २० मई १९०० को हुआ। जन्म के छह घंटे बाद ही माँ को क्रूर मृत्यु ने छीन लिया। शिशु को उसकी दादी ने पाला पोसा। शिशु का नाम रखा गया गुसाई दत्त। वे सात भाई बहनों में सबसे छोटे थे। गुसाई दत्त की प्रारंभिक शिक्षा-दीक्षा अल्मोड़ा में हुई। १९१८ में वे अपने मँझले भाई के साथ काशी आ गए और क्वींस कॉलेज में पढ़ने लगे। वहाँ से मैट्रिक उत्तीर्ण करने के बाद वे इलाहाबाद चले गए। उन्हें अपना नाम पसंद नहीं था, इसलिए उन्होंने अपना नाम रख लिया – सुमित्रानंदन पंत। यहाँ म्योर कॉलेज में उन्होंने इंटर में प्रवेश लिया। १९२१ में महात्मा गांधी के आह्मवान पर उन्होंने कॉलेज छोड़ दिया और घर पर ही हिन्दी, संस्कृत, बँगला और अंग्रेजी का अध्ययन करने लगे।

इलाहाबाद में कचहरी के पास प्रकृति सौंदर्य से सजे हुए एक सरकारी बंगले में रहकर उन्होंने हिंदी साहित्य की ऐतिहासिक सेवा की। उन्होंने इलाहाबाद आकाशवाणी के शुरुआती दिनों में सलाहकार के रूप में भी कार्य किया। वे मधुमेह के मरीज थे। उनकी मृत्यु २८ सितंबर १९७७ को हुई।

साहित्य सृजन

सात वर्ष की उम्र में, जब वे चौथी कक्षा में ही पढ़ रहे थे, उन्होंने कविता लिखना शुरु कर दिया था। १९२६-२७ में उनकी पहला काव्य संकलन ‘पल्लव’ नाम से प्रकाशित हुआ। कुछ समय पश्चात वे अपने भाई देवीदत्त के साथ अल्मोडा आ गये। इसी दौरान वे मार्क्स व फ्रायड की विचारधारा के प्रभाव में आये। १९३८ में उन्होंने ‘रूपाभ” नामक प्रगतिशील मासिक पत्र निकाला। शमशेर, रघुपति सहाय आदि के साथ वे प्रगतिशील लेखक संघ से भी जुडे रहे। वे १९५५ से १९६२ तक आकाशवाणी से जुडे रहे व मुख्य-निर्माता के पद पर कार्य किया। आपकी विचारधारा योगी अरविन्द से प्रभावित भी हुई जो बाद की आपकी रचनाओं में दृष्टिगोचर होती है। “वीणा” तथा “पल्लव” में संकलित आपके छोटे गीत हमें विराट व्यापक सौंदर्य तथा तप:पूत पवित्रता से साक्षात्कार कराते हैं। “युगांत” की रचनाओं के लेखन तक आप प्रगतिशील विचारधारा से जुडते प्रतीत होते हैं। “युगांत” से “ग्राम्या” तक आपकी काव्ययात्रा निस्संदेह प्रगतिवाद के निश्चित व प्रखरस्वरोंकी उदघोषणा करती है। आपकी साहित्यिक यात्रा के तीन प्रमुखपडाव हैं – प्रथम में आप छायावादी हैं, दूसरे में समाजवादी आदर्शों से चलित प्रगतिवादी तथा तीसरे में अरविन्द दर्शन से प्रभावित अध्यात्मवादी।

१९०७ से १९१८ के काल को स्वयं कवि ने अपने कवि-जीवन का प्रथम चरण माना है। इस काल की कविताएँ वीणा में संकलित हैं। सन् १९२२ में उच्छवास और १९२८ में पल्लव का प्रकाशन हुआ। सुमित्रानंदन पंत की कुछ अन्य काव्य कृतियाँ हैं – ग्रन्थि, गुंजन, ग्राम्या, युगांत, स्वर्णकिरण, स्वर्णधूलि, कला और बूढ़ा चाँद, लोकायतन, चिदंबरा, सत्यकाम आदि। उनके जीवनकाल में उनकी २८ पुस्तकें प्रकाशित हुईं, जिनमें कविताएं, पद्य-नाटक और निबंध शामिल हैं। श्री सुमित्रानंदन पंत अपने विस्तृत वाङमय में एक विचारक, दार्शनिक और मानवतावादी के रूप में सामने आते हैं किंतु उनकी सबसे कलात्मक कविताएं ‘पल्लव’ में संकलित हैं, जो १९१८ से १९२५ तक लिखी गई ३२ कविताओं का संग्रह है।

विचारधारा

उनका संपूर्ण साहित्य ‘सत्यम शिवम सुंदरम’ के आदर्शों से प्रभावित होते हुए भी समय के साथ निरंतर बदलता रहा है। जहां प्रारंभिक कविताओं में प्रकृति और सौंदर्य के रमणीय चित्र मिलते हैं वहीं दूसरे चरण की कविताओं में छायावाद की सूक्ष्म कल्पनाओं व कोमल भावनाओं के और अंतिम चरण की कविताओं में प्रगतिवाद और विचारशीलता के। उनकी सबसे बाद की कविताएं अरविंद दर्शन और मानव कल्याण की भावनाओं सो ओतप्रोत हैं।

पंत परंपरावादी आलोचकों और प्रगतिवादी व प्रयोगवादी आलोचकों के सामने कभी नहीं झुके। उन्होंने अपनी कविताओं में पूर्व मान्यताओं को नकारा नहीं। उन्होंने अपने ऊपर लगने वाले आरोपों को ‘नम्र अवज्ञा’ कविता के माध्यम से खारिज किया। वह कहते थे ‘गा कोकिला संदेश सनातन, मानव का परिचय मानवपन।’

पुरस्कार व सम्मान

हिंदी साहित्य की इस अनवरत सेवा के लिए उन्हें पद्मभूषण(1961), ज्ञानपीठ(1968) [6], साहित्य अकादमी  तथा सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार  जैसे उच्च श्रेणी के सम्मानों से अलंकृत किया गया। सुमित्रानंदन पंत के नाम पर कौशानी में उनके पुराने घर को जिसमें वे बचपन में रहा करते थे, सुमित्रानंदन पंत वीथिका के नाम से एक संग्रहालय के रूप में परिवर्तित कर दिया गया है। इसमें उनके व्यक्तिगत प्रयोग की वस्तुओं जैसे कपड़ों, कविताओं की मूल पांडुलिपियों, छायाचित्रों, पत्रों और पुरस्कारों को प्रदर्शित किया गया है। इसमें एक पुस्तकालय भी है, जिसमें उनकी व्यक्तिगत तथा उनसे संबंधित पुस्तकों का संग्रह है।  उनका देहांत १९७७ में हुआ। आधी शताब्दी से भी अधिक लंबे उनके रचनाकर्म में आधुनिक हिंदी कविता का पूरा एक युग समाया हुआ है।

उत्तराखंड में कुमायुं की पहाड़ियों पर बसे कउसानी गांव में, जहाँ उनका बचपन बीता था, वहां का उनका घर आज ‘सुमित्रा नंदन पंत साहित्यिक वीथिका’ नामक संग्रहालय बन चुका है। इस में उनके कपड़े, चश्मा, कलम आदि व्यक्तिगत वस्तुएं सुरक्षित रखी गई हैं। संग्रहालय में उनको मिले ज्ञानपीठ पुरस्कार का प्रशस्तिपत्र, हिंदी साहित्य संस्थान द्वारा मिला साहित्य वाचस्पति का प्रशस्तिपत्र भी मौजूद है। साथ ही उनकी रचनाएं लोकायतन, आस्था, रूपम आदि कविता संग्रह की पांडुलिपियां भी सुरक्षित रखी हैं। कालाकांकर के कुंवर सुरेश सिंह और हरिवंश राय बच्चन से किये गये उनके पत्र व्यवहार की प्रतिलिपियां भी यहां मौजूद हैं।

संग्रहालय में उनकी स्मृति में प्रत्एक वर्ष पंत व्यख्यान माला का आयोजन होता है। यहाँ से ‘सुमित्रानंदन पंत व्यक्तित्व और कृतित्व’ नामक पुस्तक भी प्रकाशित की गई है। उनके नाम पर इलाहाबाद शहर में स्थित हाथी पार्क का नाम सुमित्रा नंदन पंत उद्यान कर दिया गया है।

साभार-विकिपीडिया

भारत माता   ग्रामवासिनी

 

भारत माता

    ग्रामवासिनी।

 

खेतों में फैला है श्यामल

धूल भरा मैला सा आँचल,

गंगा यमुना में आँसू जल,

 मिट्टी कि प्रतिमा

  उदासिनी।

 

 

दैन्य जड़ित अपलक नत चितवन,

अधरों में चिर नीरव रोदन,

युग युग के तम से विषण्ण मन,

 

    वह अपने घर में

    प्रवासिनी।

 

 

तीस कोटि संतान नग्न तन,

अर्ध क्षुधित, शोषित, निरस्त्र जन,

मूढ़, असभ्य, अशिक्षित, निर्धन,

 

    नत मस्तक

    तरु तल निवासिनी!

 

 

स्वर्ण शस्य पर -पदतल लुंठित,

धरती सा सहिष्णु मन कुंठित,

क्रन्दन कंपित अधर मौन स्मित,

 

    राहु ग्रसित

    शरदेन्दु हासिनी।

 

 

चिन्तित भृकुटि क्षितिज तिमिरांकित,

नमित नयन नभ वाष्पाच्छादित,

आनन श्री छाया-शशि उपमित,

 

    ज्ञान मूढ़

    गीता प्रकाशिनी!

 

 

सफल आज उसका तप संयम,

पिला अहिंसा स्तन्य सुधोपम,

हरती जन मन भय, भव तम भ्रम,

 

    जग जननी

    जीवन विकासिनी।

 

 

 

जग-जीवन में जो चिर महान

जग-जीवन में जो चिर महान,

        सौंदर्य-पूर्ण औ सत्‍य-प्राण,

        मैं उसका प्रेमी बनूँ, नाथ!

        जिसमें मानव-हित हो समान!

 

जिससे जीवन में मिले शक्ति,

छूटें भय, संशय, अंध-भक्ति;

मैं वह प्रकाश बन सकूँ, नाथ!

मिज जावें जिसमें अखिल व्‍यक्ति!

 

        दिशि-दिशि में प्रेम-प्रभा प्रसार,

        हर भेद-भाव का अंधकार,

        मैं खोल सकूँ चिर मुँदे, नाथ!

        मानव के उर के स्‍वर्ग-द्वार!

 

पाकर, प्रभु! तुमसे अमर दान

करने मानव का परित्राण,

ला सकूँ विश्‍व में एक बार

फिर से नव जीवन का विहान!

 

 

फैली खेतों में दूर तलक

फैली खेतों में दूर तलक

मख़मल की कोमल हरियाली,

लिपटीं जिससे रवि की किरणें

चाँदी की सी उजली जाली !

 

तिनकों के हरे हरे तन पर

हिल हरित रुधिर है रहा झलक,

श्यामल भू तल पर झुका हुआ

नभ का चिर निर्मल नील फलक।

 

 

रोमांचित-सी लगती वसुधा

 

आयी जौ गेहूँ में बाली,

 

अरहर सनई की सोने की

 

किंकिणियाँ हैं शोभाशाली।

 

उड़ती भीनी तैलाक्त गन्ध,

 

फूली सरसों पीली-पीली,

 

लो, हरित धरा से झाँक रही

 

नीलम की कलि, तीसी नीली।

 

 

रँग रँग के फूलों में रिलमिल

 

हँस रही संखिया मटर खड़ी।

 

मख़मली पेटियों सी लटकीं

 

छीमियाँ, छिपाए बीज लड़ी।

 

फिरती हैं रँग रँग की तितली

 

रंग रंग के फूलों पर सुन्दर,

 

फूले फिरते हों फूल स्वयं

 

उड़ उड़ वृंतों से वृंतों पर।

 

 

अब रजत-स्वर्ण मंजरियों से

 

लद गईं आम्र तरु की डाली।

 

झर रहे ढाँक, पीपल के दल,

 

हो उठी कोकिला मतवाली।

 

महके कटहल, मुकुलित जामुन,

 

जंगल में झरबेरी झूली।

 

फूले आड़ू, नीबू, दाड़िम,

आलू, गोभी, बैंगन, मूली।

पीले मीठे अमरूदों में

अब लाल लाल चित्तियाँ पड़ीं,

पक गये सुनहले मधुर बेर,

अँवली से तरु की डाल जड़ीं।

लहलह पालक, महमह धनिया,

लौकी औ’ सेम फली, फैलीं,

मख़मली टमाटर हुए लाल,

मिरचों की बड़ी हरी थैली।

गंजी को मार गया पाला,

अरहर के फूलों को झुलसा,

हाँका करती दिन भर बन्दर

अब मालिन की लड़की तुलसा।

 

बालाएँ गजरा काट-काट,

कुछ कह गुपचुप हँसतीं किन किन,

चाँदी की सी घंटियाँ तरल

बजती रहतीं रह रह खिन खिन।

 

 

छायातप के हिलकोरों में

चौड़ी हरीतिमा लहराती,

ईखों के खेतों पर सुफ़ेद

काँसों की झंड़ी फहराती।

 

ऊँची अरहर में लुका-छिपी

खेलतीं युवतियाँ मदमाती,

चुंबन पा प्रेमी युवकों के

 

श्रम से श्लथ जीवन बहलातीं।

 

 

बगिया के छोटे पेड़ों पर

सुन्दर लगते छोटे छाजन,

सुंदर, गेहूँ की बालों पर

मोती के दानों-से हिमकन।

 

प्रात: ओझल हो जाता जग,

भू पर आता ज्यों उतर गगन,

सुंदर लगते फिर कुहरे से

उठते-से खेत, बाग़, गृह, वन।

 

बालू के साँपों से अंकित

गंगा की सतरंगी रेती

सुंदर लगती सरपत छाई

तट पर तरबूज़ों की खेती।

 

अँगुली की कंघी से बगुले

कलँगी सँवारते हैं कोई,

 

तिरते जल में सुरख़ाब, पुलिन पर

मगरौठी रहती सोई।

 

डुबकियाँ लगाते सामुद्रिक,

धोतीं पीली चोंचें धोबिन,

उड़ अबालील, टिटहरी, बया,

चारा चुगते कर्दम, कृमि, तृन।

 

नीले नभ में पीलों के दल

आतप में धीरे मँडराते,

रह रह काले, भूरे, सुफ़ेद

पंखों में रँग आते जाते।

 

लटके तरुओं पर विहग नीड़

वनचर लड़कों को हुए ज्ञात,

रेखा-छवि विरल टहनियों की

ठूँठे तरुओं के नग्न गात।

 

आँगन में दौड़ रहे पत्ते,

घूमती भँवर सी शिशिर वात।

बदली छँटने पर लगती प्रिय

ऋतुमती धरित्री सद्य स्नात।

 

 

हँसमुख हरियाली हिम-आतप

सुख से अलसाए-से सोये,

भीगी अँधियाली में निशि की

तारक स्वप्नों में-से-खोये,–

 

मरकत डिब्बे सा खुला ग्राम–

जिस पर नीलम नभ आच्छादन,–

निरुपम हिमान्त में स्निग्ध शांत

निज शोभा से हरता जन मन!

 

 

आ: धरती कितना देती है

मैने छुटपन मे छिपकर पैसे बोये थे

सोचा था पैसों के प्यारे पेड़ उगेंगे ,

रुपयों की कलदार मधुर फसलें खनकेंगी ,

और, फूल फलकर मै मोटा सेठ बनूगा !

पर बन्जर धरती में एक न अंकुर फूटा ,

बन्ध्या मिट्टी ने एक भी पैसा उगला ।

सपने जाने कहां मिटे , कब धूल हो गये ।

 

मै हताश हो , बाट जोहता रहा दिनो तक ,

बाल कल्पना के अपलक पांवड़े बिछाकर ।

मै अबोध था, मैने गलत बीज बोये थे ,

ममता को रोपा था , तृष्णा को सींचा था ।

 

अर्धशती हहराती निकल गयी है तबसे ।

कितने ही मधु पतझर बीत गये अनजाने

ग्रीष्म तपे , वर्षा झूलीं , शरदें मुसकाई

सी-सी कर हेमन्त कँपे, तरु झरे ,खिले वन ।

 

औ’ जब फिर से गाढी ऊदी लालसा लिये

गहरे कजरारे बादल बरसे धरती पर

मैने कौतूहलवश आँगन के कोने की

गीली तह को यों ही उँगली से सहलाकर

बीज सेम के दबा दिए मिट्टी के नीचे ।

भू के अन्चल मे मणि माणिक बाँध दिए हों ।

 

मै फिर भूल गया था छोटी से घटना को

और बात भी क्या थी याद जिसे रखता मन ।

किन्तु एक दिन , जब मै सन्ध्या को आँगन मे

टहल रहा था- तब सह्सा मैने जो देखा ,

उससे हर्ष विमूढ़ हो उठा मै विस्मय से ।

 

देखा आँगन के कोने मे कई नवागत

छोटी छोटी छाता ताने खडे हुए है ।

छाता कहूँ कि विजय पताकाएँ जीवन की;

या हथेलियाँ खोले थे वे नन्हीं ,प्यारी -

जो भी हो , वे हरे हरे उल्लास से भरे

पंख मारकर उडने को उत्सुक लगते थे

डिम्ब तोडकर निकले चिडियों के बच्चे से ।

 

निर्निमेष , क्षण भर मै उनको रहा देखता-

सहसा मुझे स्मरण हो आया कुछ दिन पहले ,

बीज सेम के रोपे थे मैने आँगन मे

और उन्ही से बौने पौधौं की यह पलटन

मेरी आँखो के सम्मुख अब खडी गर्व से ,

नन्हे नाटे पैर पटक , बढ़ती जाती है ।

 

तबसे उनको रहा देखता धीरे धीरे

अनगिनती पत्तो से लद भर गयी झाडियाँ

हरे भरे टँग गये कई मखमली चन्दोवे

बेलें फैल गई बल खा , आँगन मे लहरा

और सहारा लेकर बाड़े की टट्टी का

हरे हरे सौ झरने फूट ऊपर को

मै अवाक रह गया वंश कैसे बढता है

 

यह धरती कितना देती है । धरती माता

कितना देती है अपने प्यारे पुत्रो को

नहीं समझ पाया था मै उसके महत्व को

बचपन मे , छि: स्वार्थ लोभवश पैसे बोकर

 

रत्न प्रसविनि है वसुधा , अब समझ सका हूँ ।

इसमे सच्ची समता के दाने बोने है

इसमे जन की क्षमता के दाने बोने है

इसमे मानव ममता के दाने बोने है

जिससे उगल सके फिर धूल सुनहली फसले

मानवता की – जीवन क्ष्रम से हँसे दिशाएं

हम जैसा बोएँगे वैसा ही पाएँगे ।

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One Comment

  • जब भी आत्मा को खुराक चाहिए होती है तो प्रवासी दुनियाँ के माध्यम से मिल ही जाती है ! Sumitra Nandan Pant engaged my spirit and nurtured my soul today! यह साधन जुटाने के लिए धन्यवाद देना है बस !
    इन्द्रा धीर वडेरा

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