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Posts Tagged ‘अलका सिन्हा’


मोल्डिंग सिस्टम — अलका सिन्हा

Sunday, October 4th, 2015
मोल्डिंग सिस्टम  -- अलका सिन्हा रंजन का फोन आया था। खुशी से चहकते हुए उसने बताया कि वह थाइलैंड गया था और ताइक्वांडो में उसने थाइलैंड को हराकर सिल्वर मेडल जीता था। “गोल्ड क्यों नहीं?” मीठे उलाहने से मैंने पूछा था। “ये तो पहला मौका था भाभी, दिसंबर में चीन के साथ मैच है, तब गोल्ड मारूंगा।” ...

अबकी ऐसे फाग मनाएं – अलका सिन्हा

Monday, March 17th, 2014
अबकी ऐसे फाग मनाएं - अलका सिन्हा अबकी ऐसे फाग मनाएं, दीवारों पर रंग लगाएं।  रंग भरी भीगी दीवारें, महक उठें सोंधी दीवारें, नरम पड़ी गीले रंगों से, जहां-तहां टूटें दीवारें, मृदुल-प्रेम के भाव जगाएं। बरसे अबकी इतना रंग, बह जाएं गलियारे तंग, दीवारों से राह बने, आने का हो आमंत्रण, मिलकर सब जोगीरा गाएं। दीवारें घर के भीतर की, दीवारें मंदिर-मस्जिद की, ऊंची-नीची सब ...

मेरे बारे में सारा जहान जाने, ये कोई जरूरी तो नहीं – राजी सेठ

Saturday, August 17th, 2013
मेरे बारे में सारा जहान जाने, ये कोई जरूरी तो नहीं - राजी सेठ अलका सिन्हा वर्तमान पाकिस्तान के नौशेहरा छावनी नामक स्थान में सन् 1935 में जन्म लेने वाली राजी सेठ ने अंग्रेजी साहित्य से एम.ए. करने के उपरान्त तुलनात्मक धर्म और भारतीय दर्शन में विशेष अध्ययन किया। इनकी कृतियों में ‘निष्कवच’ और ‘तत-सम’ उपन्यास तथा ‘अन्धे मोड़ से आगे’, ‘तीसरी हथेली’, ‘यात्रा मुक्त’, ...

औरत खड़ी बजार में लिए लुकाठी हाथ – अलका सिन्हा

Tuesday, July 2nd, 2013
औरत खड़ी बजार में लिए लुकाठी हाथ - अलका सिन्हा 20 दिसम्बर, 2012; दिल्ली मैं कभी सोच भी नहीं सकती थी कि कोई घटना मेरी चेतना पर इस कदर हावी हो सकती है कि उसकी गिरफ्त से निकल पाना मुश्किल हो जाएगा। बहुत परेशान हूं आजकल, पिछली तीन रातों से सो नहीं पाई हूं, लगातार सिरदर्द बना हुआ है। रह-रह कर ...

खुशबू बनकर लौटेंगे – अलका सिन्हा

Sunday, June 9th, 2013
खुशबू बनकर लौटेंगे - अलका सिन्हा  (हिंदी के वरिष्ठ लेखक, चिंतक, विचारक देवेन्द्र इस्सर का जाना हमारे लिए मह्त्वपूर्ण क्षति थी । वे एक बड़े कद के लेखक थे। इस अर्थ में बड़े नहीं कि उन्हें बहुत पुरस्कार मिले हों या बड़े पदों या संस्थाओ में रहे हों । वे इसलिए बड़े लेखक थे कि उनका ...

रूहानी रात और उसके बाद – अलका सिन्हा

Monday, May 27th, 2013
रूहानी रात और उसके बाद -   अलका सिन्हा   बात चार साल पुरानी है, मगर मन की किताब पर उसका हर्फ-हर्फ ताजा है। ये दिन बेहद व्यस्तताओं से भरे थे। हर रोज जिंदगी की किताब नए किरदारों से रू-ब-रू करा रही थी।  कुछ नाम, कुछ डीटेल्स मैं लगातार अपनी डायरी में लिखती जाती थी क्योंकि हर दिन दर्ज ...

फिर आओगी न – लेखिका अलका सिन्हा

Friday, March 8th, 2013
फिर आओगी न - लेखिका  अलका सिन्हा      अब गाड़ी भीतरी सड़क पर आ गई थी| इसी सड़क की दूसरी तरफ, ठीक वहाँ, वो रहा वो मैदान जहाँ हम खेला करते थे| स्कूल से लौटते ही इस मैदान में आ जमा होते थे| पूरी दोपहर, पूरी शाम बीत जाती थी, पर हमारे खेल खत्म नहीं होते थे| अच्छा, ...

अपूर्णा – अलका सिन्हा

Thursday, January 10th, 2013
अपूर्णा - अलका सिन्हा ''बोलो बिट्टू, तोमार नाम की? बोलो।'' दादी ने पूछा तो बिट्टू ने अपनी बड़ी-बड़ी भोली आँखें दादी के पोपले चेहरे पर टिका दीं। दादी ने उसे पुचकारा, ''बिट्टू बोलो, आमार नाम हिम।'' पर हिम नहीं बोला। दादी के गले में बाँहें डाल हँसता रहा, जैसे अपना नाम बोलने में कोई ...

प्रभाव के प्रसार में थरथरा देती है अलका सिन्हा की कहानी- राजी सेठ

Wednesday, September 5th, 2012
प्रभाव के प्रसार में थरथरा देती है अलका सिन्हा की कहानी- राजी सेठ   राजधानी के हिन्दी भवन में अलका सिन्हा के कहानी - संग्रह ‘मुझसे कैसा नेह’ का लोकार्पण किताबघर प्रकाशन एवं अक्षरम् के संयुक्त तत्वावधान में किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे मूर्धन्य आलोचक प्रभाकर श्रोत्रिय ने भाषा की सघनता को कीमती बताते हुए अलका की ‘चौराहा’ और ‘मोल्डिंग सिस्टम’ ...

चौराहा – अलका सिन्हा

Thursday, August 30th, 2012
चौराहा - अलका सिन्हा ”कैसा हुआ पर्चा?“ ”हुआ तो अच्छा ही ,“ कहते हुए भी कोई उत्साह न था निरंजन में।  वह जानता था, पर्चे तो पहले भी अच्छे हुए थे, पर नौकरी सिर्फ पर्चों के बल पर ही नहीं मिल जाती। बाउजी पैसे देंगे नहीं, देंगे नहीं क्या, दे ही नहीं सकते! हैं ही ...
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