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दिव्या माथुर की कहानी : अंतिम तीन दिन अमेरिकी कोर्ट ने सोनिया गांधी से पासपोर्ट दिखाने को कहा अमेरिकी न्यायाधीश ने 1984 के दंगों पर आदेश सुरक्षित रखा यमन में डूबा जहाज, 12 भारतीय नाविक हुए लापता पंजाबी गायक शिंदा को लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड

Posts Tagged ‘डॉ. ज़ेबा रशीद’


डॉ. जे़बा रशीद की कविताएँ

Friday, October 2nd, 2015
डॉ. जे़बा रशीद की कविताएँ जवाब मैंने खत भेजा तो  जवाब में सूखा गुलाब आया है हमने आंखों में सजा लिए आंसूं खूब जवाब आया है सकूने दिल की दवा मांगी तो दर्द बेहिसाब आया है। ख्वाहिशें मुस्करा कर कहती है खाली ख्वाब आया है। ***** 2 चाहते जे़बा रषीद चाहतों ने मेरी जिसको तराशा वो पारस हो यह जरूरी तो नहीं! ख्वाब मेरे हैं मगर ध्यान तेरा है मेरी आंखों में तेरी तस्वीर ना हो यह जरूरी तो नहीं! चाहत ...

कहानी – एन्टिक पीस – लेखिका डॉ ज़ेबा रशीद

Friday, February 28th, 2014
कहानी - एन्टिक पीस - लेखिका डॉ ज़ेबा रशीद    सुरैया के लिए ये तीन साल लम्बी अंधेरी सुरंग की तरह थे। वह घोर अंधेरे में धीरे-धीरे आगे बढ़ रही थी। इस छोटी जिंदगी में कितनी परेशानियों में घिर आई। हिम्मत कर परेशानियों के तपते रेगिस्तान में नंगेपांव ठंड़ी जमीन की तलाश में भटकती रही। अचानक उसे एक स्कूल ...

कहानी – बदला लेखिका डॉ जे़बा रशीद

Friday, November 8th, 2013
कहानी – बदला लेखिका डॉ जे़बा रशीद     अचानक गाड़ी रूक गई। ‘‘ क्या हुआ... गाड़ी क्यों रोक दी ? ’’सबाना ने पूछा।  ‘‘ बस आगे जाने का मन नहीं...जिंदगी भी कुछ ऐसी ही है सब्बू। ’’वह स्वयं को नहीं सम्भाल पाई। आंखों में मेघ उमडने लगे। कार पार्क कर चाबी हाथ में घूमाते हुए वीना पार्क ...

खारी झील – डॉ. जे़बा रशीद

Thursday, October 18th, 2012
खारी झील - डॉ. जे़बा रशीद  घोर अंधेरी रात।  वह प्लेटफार्म पर उतरा।  अंधकार में खड़े अपने गांव के वृक्ष व मकान देख मन ही मन प्रसन्न होता घर की ओर बढ़ चला।  आंधी भरी हवा जैसे उससे खेलने लगी। कभी चुप्पी साध कर वृक्षों के पीछे छिप जाती , तो कभी दुगुने वेग से नाचती ...

तपती रेतः डॉ. ज़ेबा रशीद

Thursday, March 15th, 2012
तपती रेतः डॉ. ज़ेबा रशीद क्षितिज तक धूप पसरी हुई थी। दोपहर की लू से चक्कर काटती रेत के बवंडर दौड़ रहे थे। सूरज आकाश में जल रहा था और धरती तप रही थी। अन्नों की छाती भी धरती की तरह जल रही थी।सामने छत की मुंडेर पर सूखने डाले गए कपड़े फरफरा रहे थे। उसे ...

समीक्षाः डॉ. ज़ेबा रशीद (औपन्यासिक नारी जीवन की विवेचना करती कविता)

Tuesday, March 13th, 2012
समीक्षाः डॉ. ज़ेबा रशीद (औपन्यासिक नारी जीवन की विवेचना करती कविता) समीक्षा तेरे लिखे की समीक्षा लिखूं सोच रही हूं मैं ! जिन्दगी का विशालकाय ग्रंथ गर्म-ठंडी बयार और फड़फड़ाती ऋतुओं से है जिसमें असंख्य पन्ने, और परबस हूं मैं जिनकी समीक्षा मेरे बस में नहीं है ! जब मैं सम्पूर्ण पृष्ट पढ़ लूंगी मेरे जीवन ग्रंथ की तब लिखूंगी समीक्षा मैं ! कथ्य और शिल्प में कोई योग नहीं यह क्या रचा है तूने तेरे रचे में बहुत सी ...